अपने प्रिय कवियों में से एक, मंगलेशजी की बातों से मेरी लगभग पूरी सहमति है लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि वह ब्लॉग की मूल प्रकृति को समझ पाने में असफल रहे हैं. दूसरी बात जो मुझे उनकी नवभारत टाइम्स वाली टिप्पणी पढते हुई महसूस हुई कि उन्होंने अपनी राय मुख्यत: मोहल्ला तथा एक दो और ब्लॉगों को ही ध्यान में रखते हुए बनाई है. (..हालांकि कुछ अन्य अच्छे ब्लॉग भी हैं जिनपर कतिपय बेहतर सामग्री होती है. मसलन, कस्बा, हाशिया या आपका ब्लाग ..हाशिया पर तो रेयाज ने शायद एमानुल ओर्तीज की कविता दी भी थी, जिसके न ब्लॉग पर न मिलने पर मंगलेशजी को खेद हुआ.) बहरहाल, मंगलेशजी की टिप्पणी एक बार फिर देखें - http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2734203.cms
इस टिप्पणी में वह कहते हैं ''उनमे (ब्लॉगों में)ज्यादातर गपशप का माहौल है या गंभीरता के नाम पर छोटी छोटी पॉलिमिक्स बहसें हैं, जिनमें भडास या कुंठाएं निकाली जाती हैं या कोई सनसनीदार साहित्यिक चीज पेश की जाती है ''. ( यद्यपि मोहल्ला पर दो तीन अच्छी , गंभीर कही जाने लायक चीजें भी आईं हैं. और अब कम्युनिटी ब्लॉग बनने के बाद कुछ विवेकवान लोग उससे जुड रहे हैं . सो हिंदी के इस सर्वाधिक चर्चित ब्लॉग के सार्थक भी हो सकने की उम्मीद तो की ही जा सकती है. लेकिन अब तक कुल मिलाकर जो इस ब्लॉग की स्थिति रही है, उसके आधार पर मंगलेश जी की बातों से सहमति बनती है.
किंतु इसके अलावा मंगलेशजी कहते हैं कि '' कुछ लेखकों के ब्लॉग शायद अनजाने में ही आत्म विज्ञापन का साधन बने हुए दिखते हैं, जिनमें उनकी रचनाओं के साथ उनकी आगामी पुस्तकों के चित्र भी चिपके होते है '' . ऐसा लगता है उन्होंने शब्दों में यह बात हिंदी एक समर्थ कवि-(जो न सिर्फ अभिव्यक्ति के नए माध्यम के रूप में ब्लॅग का क्षमता पहचाने वाला पहला वरिष्ठ साहित्यक है बल्कि जिसकी उपस्थित ने ब्लॉग जगत को गरिमा प्रदान की है और कई पढने-लिखने वालों को इस ओर आने के लिए प्रेरित किया है)-के ब्लाग के संदर्भ में कही है . और यहीं मंगलेशजी चूक कर गए हैं ... और एक ऐसी चूक है जिस पर 'गंभीरता' से ध्यान दिया जाना चाहिए. चुंकि यह एक बडे कवि की चूक है इसलिए यह कुछ ' बडे दिग्भ्रम' भी पैदा कर सकती है. इसी चूक के कारण मंगलेश जी अपनी टिप्पणी में ब्लॉग की वास्तविक निजता , उसकी मूल प्रकृति के ही विरोध में जा खडे हुए हैं. वह मूल प्रकृति है उसका ' वयक्तिगत' होना. ब्लॉग का बेहद खूबसूरत हिंदी अनुवाद है 'चिट्ठा'----कच्चा पक्का जैसा भी ! जिस वैकल्पिक कथ्य की अपेक्षा वह रख रहे हैं, उसे टलॉगों संदर्भ में 'कच्चा चिट्ठा' कहा जाना बहुत गलत न होगा .
अमेरिका के ब्लॉगों 'सांस्कृतिक शक्ति' बन जाने के संदर्भ में मुझे तथ्यों का ठीक-ठीक पता नहीं है, लेकिन एक बात याद दिला देना समीचीन होगा कि दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण समकालीन लेखकों, कवियों, दार्शनिकों, फिल्मकारो, इतिहासकारों, समाजशास्त्रीयों की अपनी वेब्साइटें (वह भी शायद पेड,सशुल्क) हैं , जिनपर उनकी प्रकाश्य पुस्तकों समेत अन्य संबंधित जानकारिकयां रहती हैं.
इसे लिखते हुए यह भी ध्यान में आ रहा है कि कई लेखक अचानक इधर 2-3 सालों से खूब अमेरिका-अमेरिका करने लगे हैं, जैसे पहले रूस-रूस कहते थे. क्या साम्यवाद का स्वप्न भी मर गया? या वह सीधा-सीधा हित-लाभ का मामला था? जब रूस से पुरस्कार, विदेश यात्राओं का सुख और कुछ दूसरे लाभ मिलत थे वह; और अब विश्व बैंक द्वारा फंडेड एनजीओ से मिलने लगा है तो - अमेरिका! या सचमुच इन दिनों अमेरिका में महान साहित्य लिखा जाने लगा है? मैं इसकी संभावना को सिरे से नकार नहीं रहा हूं ; हालांकि स्वयं मंगलेशजी ने 'एक बार अयोबा'(1996) में लिखा है - '' इतना बडा देश है यह (अमेरिका) . पाब्लो नेरूदा के शब्दों में 'भैंस के चमडे की तरह फैला हुआ'. पर यहां एक भी महान कवि, महान कलाकार, महान संगीतकार क्यों नहीं है? अमेरिका शायद बडी रचनात्मक प्रतिभा पैदा नहीं कर सकता. साहित्य में ज्यादतर लोग अपने से ही 'ऑब्सेस्ड' हैं या फिर सेक्स दूसरा 'ऑब्सेशन' है ''.
खैर ... यह सदि्च्छा तो अच्छी है कि '' ब्लॉगों को मुख्य मीडिया से ज्यादा जिम्मेदार होना होगा ताकि वे 'ब्लॉग-ब्लॉग' खेलने तक सीमित न रह जाएं '' लेकिन क्या ऐसी ही अपेक्षा हमने लघु पत्रिकाओं से भी न की थी कि वे बडी पत्रिकाओं, बडे पूंजी वाले प्रिंट मीडिया के बरक्स वैकल्पिक विचार दें ? लेकिन क्या यह सच नहीं है कि हिंदी में जो सैकेडों लघुपत्रिकाएं छपतीं हैं, उनमें से 98/99 प्रतिशत 'पत्रिका- पत्रिका' ही खेलती रही हैं. हमने उनमें से सार्थक काम करने वाली पत्रिकाओं को चुना है. यही काम ब्लॉगों के संदर्भ में भी करना होगा.
हिंदी चिट्ठों जो अगंभीरता अभी दिख रही है उसका एक कारण तो यह है ( जैसा कि मंगलेशजी ने भी उचित ही स्वीकार किया है ) कि अभी बहुत कम लोग इस दिशा में सक्रिय हैं. संख्या बढने पर स्वभावत: इनमें विविधता भी बढेगी . इसके अलावा क्या यह विचारणीय नही है कि स्वयं 'हिंदी' की वैचारिकता का ही क्या हाल रहा है?
क्या यह सच नहीं है कि स्वयं हिंदी का लेखन अपनी तमाम '' नेकनीयती के बावजूद अभी तक अराजनैतिक, व्यक्तिगत, रूमानी, भावुक और अगंभीर है''. ( बल्कि मंगलेशजी के इस वाक्य में मैं 'वर्णवादी' और ' पुनरूत्थानवादी' भी जोडना चाहूंगा. )
जाहिर है चिंताएं और भी हैं तथा इन दिनों और गंभीर होती जा रही हैं. 'हंस' जैसी प्रखर पत्रिका में तेज गिरावट देखी जा रही है ; गंभीर कही जाने 'पहल' में 'हल्कापन' आया है. तो दूसरी ओर किंचित चटपटे 'नया ज्ञानोदय' को पसंद करने वालों की संख्या बढी है. ऐसे में ब्लॉगों से ही कुछ बहुत खास कर गुजरने की उम्मीद तो नहीं ही की जा सकती . हां, इतना जरूर है कहूंगा कि यह मूलत: अस्थापितों का अख्यान है. इसकी निजता इसका 'व्यक्तिगत' होना है.
