24 April, 2009
है कितने अनजाने लोग
वरूण गांधी के भाषण पर किशनगंज में लालू प्रसाद की टिप्पणी व उस पर हंगामा पिछले दो दिनों से पढ-सुन रहा हूं। पता हुआ है कि इसके लिए लालू प्रसाद पर मुकदमा दर्ज हुआ है और किसी अफसर ने गिरफतारी के आदेश भी दिये हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित पूरी भाजपा और देश का सवर्ण मीडिया एक बार फिर अपने तेवर में दिख रहे हैं। सबके साथ मैंने भी इस टिप्पणी पर विचार किया है और अपने तईं मुझे लगा कि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए हंगामा बरपा दिया जाए। मैंने कई बार लालू प्रसाद की टिप्पणी पर ध्यान दिया। उन्होंने कहा है कि 'मैं अगर ग़हमंत्री होता तो वरूण की छाती पर रोलर चलवा देता'। नीतीश कुमार हमारे मित्र हैं और मैं उन्हें गंभीर आदमी समझता हूं। मेरी गलतफहमी थी कि वे भाषा की बारीकियों को जानते हैं। वे भाजपा के साथ होते हुए भी उससे कुछ अलग हैं और उनका दिल-दिमाग ग्रामीण उर्जा से खचित है। उनकी बोली और शैली में मगही माटी के बेल-बूटे होते हैं, जो उनके भाषण को खूबसूरत बनाते हैं। सवर्ण मीडिया और भाजपा यदि लालू प्रसाद के मिजाज को नहीं समझ पाती तो कोई बात नहीं। वे दोनों साफ तौर पर अलग-अलग हैं। लेकिन नीतीश कुमार भी इस मानसिकता में शामिल हो गये, यह हैरान करने वाली बात है। भाषा के साथ मुहावरे होते हैं। मुहावरों के अपने अर्थ होते हैं, अपने तेवर होते हैं। छाती पर मूंग दलने के मुहावरे से जो अपरिचित हैं, वे छाती पर रोलर चलवाने के मुहावरे को भी नहीं समझ पाएंगे। जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे तब एक बार उन्होंने गुस्से में कहा था कि 'भ्रष्ट अधिकारियों को टेलीफोन के खंभों से हैंग करवा दूंगा'। यह भाषण किसी बातचीत या जनसभा में नहीं, उन्होंने संसद में दिया था। लेकिन तब उनपर न कोई मुकदमा हुआ, न उनकी गिरफतारी के आदेश दिये गये । न किसी काबिल चीप मिनिस्टर ने उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। नेहरू को इसके लिए व्यापक समर्थन मिला था। वरूण गांधी की टिप्पणी पर यदि लालू प्रसाद कहते हैं कि मैं ग़हमंत्री होता तो छाती पर रोलर चलवा देता, तो यह भाषण में मुहावरे का प्रयोग है। भाषा में नित नये प्रयोग होते रहते हैं, नये मुहावरे गढे जाते हैं, नये प्रतीक गढे जाते हैं। कभी छाती पर मूंग दली जाती थी, अब छाती पर रोलर भी चलेंगे। जो लोग छाती चौडी होने के मुहावरे को जानेंगे, जो छाती पर सांप लोटने के मुहावरे को जानेंगे, वे छाती पर रोलर चलने के मुहावरे को भी समझेंगे। अब कोई जानबूझ कर न समझना चाहे और अर्न्तमन में वरूण के बयान के लिए प्यार पाले तो बात कुछ और है। फिराक ने लिखा है-'जान के सब कुछ कुछ भी न जाने, हैं कितने अनजाने लोग'।
28 March, 2009
विभा का थोडा प्रणाम
इस आपबीती के सामने आने के बाद इन्होंने 'आर विभा' का असली नाम पता लगा लिया है। उस सुंदर छरहरी लंबी लडकी को किसने कब किस-किस प्रेस कांफ्रेंस में देखा था इसकी चर्चाएं हैं। लेकिन इन सूअरों से पूछिए कि बलात्कारी कौन हैं तो सबकुछ जानते हुए चुप्पी साध लेंगे या कहेंगे कि इस तरह की घटनाएं तो होती ही रहती हैं। लडकियों को इस क्षेत्र में आना ही नहीं चाहिए। अपराधियों, दलालों, चापलूसों और गलीज जातिवादियों से पटी बिहार की पत्रकारिता से इससे इतर किसी बात की उम्मीद करना भी मूर्खता है।
'पत्रकारिता के पापी' महज एक आपबीती नहीं है। इसे लिखकर वह अनाम लडकी लेखन के पैमानों पर भी उंचे पायदान का हकदार बन जाती है। न सिर्फ अच्छे लेखन के लिए जरूरी ईमानदारी को वह लगातार बरतती है बल्कि प्रगतिशीलता की नैसर्गिक कसौटियों को भी स्थापित करती है। पटना स्टेशन पर उतरने के बाद सुनाई पडी तुलसीदास की पंक्तियों का उसे याद रह जाना अनायास नहीं है, न ही यह लिखना कि 'सर झुका कर थोडा प्रणाम'। अदभुत पद है-'थोडा प्रणाम'। हिंदी साहित्य में तो अतुलनीय। गांव से निकल कर शहर पहुंची इस लडकी की नैसर्गिक प्रगतिशीलता, उसका द्वंद्व हमारे स्त्री विमर्श के लिए भी अनजाना रहा है। इस पद ने हमारे साहित्य को समद्ध किया है। इस आपबीती से गुजरते हुए सम्मान जगाने वाले बेहद सुघड लेखन को आसानी से महसूस किया जा सकता है।
इस आपबीती में उसने जो संकेत छोडे हैं, उनसे कथित 'प्रदेश न्यूज' की पहचान बहुत मुश्किल नहीं है। आर ब्लॉक, होटल चाणक्य, होटल पाटलिपुत्र और आयकर गोलंबर होते हुए वह लडकी जिस पॉश कॉलोनी में पहुंचती है उसे पटना के किदवईपुरी के रूप में आसानी से चिन्हित किया जा सकता है। 'प्रदेश न्यूज चैनल' में सिर्फ 'प्रदेश' के नाम को साइलेंट रखा गया है। पटना के पत्रकार ही नहीं, चैनलों के दर्शक भी अगर ध्यान देखें तो इस चैनल को आर विभा द्वारा बताए गये 'सफेद मूठ' वाले लोगों (चैनल का आइडी जिसमें माइक्र लगा होता है) से पहचान सकते हैं। बलात्कार में इस चैनल के बॉस के साथ जो दो पत्रकार और शामिल हैं, उनका नाम भले ही न बताया गया हो पर पटना से प्रकाशित होने वाला 'भारत का तथाकथित बडा सर्कुलेशन' वाला अखबार कौन है, यह तो जाना ही जा सकता है।
26 March, 2009
मुफ्त में दारू-लड़की मिल जाए, यही इनका संपादकीय
देरी के लिए माफी। वादे के अनुसार, 'पत्रकारिता के पापी' शीर्षक से एक महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए संस्मरण को यहां हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें कई जगह गालियां हैं और कुछ एडल्ट कंटेंट भी। इसे संपादित नहीं किया गया है ताकि आप इस महिला पत्रकार की भावना, पीड़ा, मजबूरी, दुख, हालात को संपूर्णता के साथ समझ सकें। उन्होंने अपना नाम आर. बिभा प्रकाशित करने को कहा है। मेल आईडी देने से मना किया है। संस्मरण के आगे का पार्ट लेखिका ने अभी भेजा नहीं है। -संपादक http://bhadas4media.com/
पत्रकारिताकेपापी
कहां से कैसे शुरू करुं, समझ में नहीं आ रहा लेकिन अब मुझे बर्दाश्त भी नहीं हो रहा। मैं वो सब कहना चाहती हूं, जो मेरे साथ हुआ और जो औरों के साथ हो रहा है। मुझे नहीं पता, इसके छपने के बाद या किसी के पढ़ने के बाद क्या होगा। पहले मैं इस तथाकथित चतुर्थ स्तंभ यानि पत्रकारिता के लिए वर्तमान की योग्यता की कुछ चर्चा करना चाहूंगी, मेरी जैसी लड़की के लिए- जो सुंदर हो, बेवक्त भी, स्ट्रिंगर को छोड़कर हमेशा सबको आमंत्रण देने वाली मुस्कराहट से भरपूर हो। कंप्रोमाइज करने का प्रमाणपत्र हाव-भाव में शामिल हो। किसी ऐरे-गैरे पत्रकार की पैरवी हो- जिसे पूर्व में वह खुद को वक्त-बेवक्त छूने-दबाने का मौका दे चुकी हो। और भी बहुत सारी योग्ताएं हैं, जिसकी बाद में चर्चा करूगीं (यह योग्यता छोटे-मझोले शहरों में पत्रकारिता में कैरियर बनाने वाली मुझ जैसी के लिए है, न कि आईआईएमसी, एसीजे और सिम्बाएसिस से पढ़ने वाली के लिए- खैर उनकी बात वे जानें)। हां तो मेरे हिसाब से थोड़ी सी चर्चा पुरूषों या युवाओं की योग्यता पर भी कर लें। लड़के के लिए- असफल पत्रकारों द्वारा खोले गए स्कूल से पत्रकारिता का प्रमाण पत्र। मनोभाव- भंगिमा के रूप में डिप्लोमा इन पितांबरी यानि चापलूसी। यह एक्स्ट्रा में होनी चाहिए। उसके बाद सेटिंग, गेटिंग। फील्ड या पत्रकारिता में आने की इच्छुक लड़की को बास के बिस्तर तक पहुंचाने में जीवन की सारी ऊर्जा झोंक देने का माद्दा हो। साथ ही पत्रकारिता की प्राचीन काल सभ्यता- सब्जी पहुंचाना, दूध लाना सब्सिडियरी है। आदि-आदि।
राजधानी पटना। मेरी जैसी लड़की के लिए एक अच्छा अनुभव। स्टेशन पर उतरते ही हनुमान मंदिर में बज रहे सुंदरकांड की पंक्ति मधुर आवाज में पहुंची। ढ़ोल गंवार शुद्र पशु नारी..... सकल ताड़न। सर झुका के थोड़ा प्रणाम। बाहर आते ही निगाहें पटना की उस सहेली को ढूंढ़ने लगी जो हाल में राजधनी के एक पाश कालोनी से शुरू हुए प्रदेश न्यूज चैनल में एंकरिंग करने लगी थी। उसने पत्र देकर मुझे पटना बुलाया था क्योंकि मुझे भी राजेन्द्र मोहन पाठक के सस्ते उपन्यास के पत्रकार किरदार सुनील से बड़ा प्यार था। मैं भी बरखा दत्त बनना चाहती थी। टीवी पर दिखने और समाज को बदल देने का जज्बा था। इसलिए मैं पूरी तैयारी के साथ पहुंची थी। एंकर बनना था। आगे के बाल थोड़े कटवाए। पार्लर से आइब्रो बनवाकर पहुंची थी। आखिर पूरे पटना के लोग मुझे टी.वी. पर देखने वाले थे।
खैर मेरी सहेली स्टेशन के बाहर एक मुछमुंडे लड़के के साथ स्कूटर लिए खड़ी थी। जाते ही गले मिली और बिभा कहकर लिपट गई और सीधे कान में कहा- एक्स्ट्रा स्मार्ट लग रही है तू। मैं भी चौंक गई क्योंकि मेरी सहेली मुझसे ज्यादा सुंदर थी लेकिन ध्यान से जब मैंने उसका चेहरा देखा तो मुझे आश्चर्य हुआ।
खैर, थोड़ी बातचीत के बाद मुछमुंडे के स्कूटर पर हम दोनो बैठ गए। वहां से आर ब्लाक, फिर गोलंबर चौराहा। इस बीच वह मुझे बता चुकी थी कि शहर के बड़े होटल- जो रास्ते में चाणक्या और पाटलीपुत्रा के रूप में शान से खड़े थे- यहां हम लोग सप्ताह में तीन दिन जरूर आते हैं, पीसी में (प्रेस कांफ्रेस में), कॉफी गिक्ट, चाय फ्री। बातें करते-करते हम बिहार के उस इकलौते इलेक्ट्रानिक चैनल के दफ्तर में आ गए। यह टी.वी. पर जैसा दिखता है वैसा नहीं। रिसेप्सन पर बैठा एक आदमी। बातचीत में पता चला कि वह चैनल का पावरफुल टीटू है। उसके माथे के ठीक ऊपर लगी थीं दर्जन भर लड़के-लड़कियों की तस्वीरें जो इस चैनल में काम कर दूसरे बड़े चैनलों में जा चुके थे।
छोटे से आफिस में छोटी सी औपचारिकता पूरी करने के बाद मैं सहली के साथ उसके डेरे पर चली आई। इस बार भी मुछमुंडे ने घर तक छोड़ा। जाते वक्त वह मेरी सहेली के हाथ में कुछ प्लास्टिक का टुकड़ा-सा दे गया जिसके बाद मैने देखा, मेरी सहेली मुस्कुरा दी। उसके बाद हम रूम में चले गए। फ्रेश हुए। मैं गांव से लाई पूड़ी और आलू की भुजिया लेकर बैठ गई। दोनों ने खाया और फिर सो गए। सुबह मैं सबसे पहले सोकर उठी। देखा, बिस्तर पर गुटखे के दो पाऊच पड़े हुए हैं। नाम है तलब। मेरा माथा ठनका। ये खाती है। खैर- कुछ देर बाद मेरी सहेली भी उठी। जब मैनें उसका चेहरा देखा तो मुझे तो जैसे लकवा मार गया। यह क्या? अंदर तक धंसी आंखें, आखों के बाहर काला घेरा, बाल उलझे। चेहरे पर जहां भर की थकान। मात्र तीन साल की एकंरिग में यह हाल। मुझे वह सहेली याद आई जिसका गदराया बदन और सुंदर-सलोना चेहरा हुआ करता था। चपड़-चपड़ बात करते उसके होंठ। अब ये सभी काले पड़ गए हैं। तब तक उसने मुझे जैसे गहरे कुंए से निकाला। क्या देख रही हो बिभा। अरे यार, बहुत काम करने पड़ते हैं। मैं बोली- लेकिन यार, तू बताती है कि टी.वी. पर तो तू पूरी हीरोइन दिखती है। वह बोली- अरे, वह सब मेकअप रहता है।
दूसरे दिन हम लोग उस दड़बे में पहुंचे। यानि आफिस। चारों तरफ से कुछ पुर्जे आए थे, स्थानीय कार्यक्रम के। सभी लोग अपना कैमरा और सफेद मुठ वाला लोगो यानि चैनल का आईडी लेकर फील्ड में जा रहे थे। रिर्पोटिंग करने। मेरे से झूठ-मूठ का बायोडाटा-फोटो रखाने के बाद मुझे भी एक मुछमुंडे के साथ बिठा दिया गया। और मैं चली रिर्पोटिंग करने। लग रहा था जैसे मेरे सामने सभी बौने हैं। मैं तो रिपोटर्र हूं। और मुछमुंडा मेरा कैमरामैन। हम लोग फ्रेजर रोड के एक राजस्थानी होटल में पहुंचे जहां पहले से शहर के कुछ नामी गिरामी राष्ट्रीय और हैदराबाद की एक कंपनी के क्षेत्रीय चैनल के संवाददाता मौजूद थे। उस भीड़ में मात्र दो लड़कियां थी। एक पावरविजन चैनल जो पटना में केबल वालों के रहमोकरम पर चलता था। दूसरी मैं, जो एकमात्र सिटी हर्ट कहे जाने वाले प्रदेश न्यूज की रिपोर्टर। मैं भी कुर्सी पर बैठ गई। मेरे साथ आया मुछमुंडा मुझे डंडा पकड़ा कर अपने बैग से सोनी का कैमरा निकालकर रिकार्डिंग शुरू कर चुका था। लेकिन मेरे पीछे मुझे लेकर फुसफुसहाट हो रही थी। नई छोटी। बची नहीं होगी। खा चुका होगा। ऐसे थोड़े ही। बहुत घाघ है। बिना उसके एंकरिंग रिपोर्टिंग संभव नहीं। अरे यार बता रहा था। बड़े अच्छे से करता है वो। एक बार जिसे बीठा लगाकर कर दे तो वह उसकी मुरीद हो जाए। बीठा मतलब तबले के नीचे रखा जाने वाला कपड़े से बना शून्य। वहां कुछ नहीं हुआ। किसी मत्सय संघ की पीसी थी। इसलिए सभी को कुछ समोसे और एक प्लास्टिक की थैली से सबर करना पड़ा। उसे लेने के लिए मारा-मारी मची थी। भीड़ से अलग एक लड़का भी दिखा जो बिना खाए-पिए सिर्फ प्रेस रिलीज लेकर चलता बना। उसके जाते ही किसी के मुंह से निकला- साला बाहन चो... उदयन शर्मा और अरूण शौरी की औलाद।
हमलोग दो घंटे बाद आफिस पहुंचे। तब तक वहां का माहौल अलग था। सभी अपने हाथ में कैमरा लिए उसमें से टेप निकाल रहे थे। बाद में मुझे भी मुछमुंडे ने टेप दिया और डंप करा लाने को कहा। एक कोने में पड़े कंप्यूटर और वीटीआर के पास मै गई। वहां डंप किया गया। उसके बाद हम लोगों को एक-एक कप चाय मिला। तब मेरी सहेली मुझे दिखी। हाय, ये चेहरा क्या बना रखा है। लगता है किसी ने फेयर एंड लवली की पूरी ट्यूब चेहरे पर पोत दी हो। मैने उससे पूछा। वह बोली- बिभा, मैं एंकरिंग करने जा रही हूं। वह भी प्राइम टाइम की। उसके थोड़ी देर बाद टी.वी. पर मेरी सहेली मुख्य समाचार पढ़ रही थी। मंदिरी इलाके में भीषण डकैती। दो गिरफ्तार। मैं भी तो एंकर बनने आई थी। ये कहां मुझे दौड़ा रहे हैं। मैं बाहर आफिस में बैठी थी। सहेली को काम खत्म करते-करते रात के नौ बज गए। तब तक आफिस से मेरी सहेली का मुछमुंडा छोड़कर सभी जा चुके थे। मेरी सहेली और हम निकलने वाले थे। तब तक तथाकथित बास, पावरफुल टीटू आ गया। और उसने मुझे आते ही कहा- वेरी वैलडन बिभा, आज तुमने अच्छी रिपोर्टिंग की। मैं मन ही मन अचंभित। आज तो मैंने कुछ किया ही नहीं।
रात के 9:30 बजते ही दफ्तर में कुछ और चेहरे आने लगे। एक-दो को मैने दिन में देखा था और बाकी सभी थोड़े उम्रदराज और थोड़े नौवजवान थे। बाद में पता चला सभी यहां पहले थोड़ा बहुत काम करते थे। बाकी एक या दो दैनिक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक जैसे कुछ हैं। मैंने सहेली से कहा- अब चलो। लेकिन वह सबसे घुल-मिलकर बातें कर रही थी। भारत के तथाकथित बड़े सरकुलेशन वाले एक अखबार के अधिकारी से सहेली काफी घुल-मिल रही थी। मुझे बातचीत में सिर्फ 'श्योर' और 'जरूर-जरूर' शब्द ही सुनाई दिए। उसके बाद मेरी सहेली मेरे पास आई और साथ में मुछमुंडा। उसने मुझे हाथ में एक चाबी थमाई और कहा- तू डेरा पर चली जा, मैं देर से आउंगी। मैं चुपचाप चली गई। लेकिन लग रहा था कुछ आंखें नशे में मेरे शरीर को नाप रही थी। जैसे कोई कमर, कुल्हा, नितंब, ब्रा साइज और गले का कटाव देख रहा था। धत्, मैं क्या सोच रही हूं। कितने महान और अच्छे काम करने वालों को लेकर इतना गंदा विचार, छी!
घर में आते ही मैं सो गई। दिनभर की थकान और स्कूटर के पीछे बिना उससे सटे हुए अकड़कर बैठना। थक गई थी मैं। लेकिन 'नमस्कार' और 'मुख्य समाचार' जैसे शब्द थकान का अनुभव नहीं होने दे रहे थे। सुबह मैं देखती हूं मुझसे कुछ दूरी पर मेरी सहेली सोई पड़ी है, बेसुध। मैंने जगाना उचित नहीं समझा। पास के कमरों में कंपटीशन की तैयारी कर रही लड़कियों को ध्यान से देखने लगी जो पढ़ाई पूरी मेहनत से कर रही थी। लेकिन क्या होगा बैंक पीओ बनकर। ये लोग टी.वी. पर थोड़े ही आ सकती हैं। सपनों में दो घंटे कैसे बीते, मैं नहीं जानती। फिर मैंने अपनी सहेली को जगाया। उसने कहा- बिभा, तुम चली जाओ, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं। तुम चली जाओ। कोई पूछेगा तो मेरे बारे में बता देना। मैने कहा- मैं अकेले नहीं जाउंगी। सहेली बोली- जा यार, काम कर, मैं ठीक हो जाउंगी। मैं दड़बे में चली आई। लेकिन आज मुझे किसी के साथ नहीं भेजा गया। मैं बस एक कोने में बैठी रही। बाद में किसी की जोर-जोर से बोलने की आवाज सुनाई दी... ''अपने-आपको सब क्या समझती है। मैं रोज एक एंकर पैदा कर सकता हूं। साली, हराम...आती है यहां.......... मरवाने।'' मेरा चेहरा फक्क! ये कौन है जो इतनी भद्दी-गंदी गालियां दे रहा है। उसके थोड़ी देर बाद एक लड़का दौड़ता हुआ आया और मेरे हाथ में स्केच पेन से मोटे अक्षरों में लिखे कुछ कागज पकड़ा गया। उसने कहा- टी सर ने कहा है, इसे जोर-जोर से पढ़ें और दुहराएं। मैं ठीक वैसा ही करने लगी। दो घंटे बाद मुझे वहां के स्टूडियों में बुलाया गया। मेकअप हुआ और मैं बैठी थी लकड़ी की उस कुर्सी पर जहां से देखने पर सिर्फ कैमरा दिखता है लेकिन अंदर गर्व और खुशी का अनोखा तूफान चलता है। जैसे लगता है पटना के लाखों लोग मुझे देख रहे हैं। मेरा सपना सच हुआ और मैंने उस दिन समाचार पढ़ा। यह प्रसारित भी हुआ। उस दिन मुझे भी घर जाने में विलंब होने लगा। आज भी स्थानीय पत्रकारिता के कई बड़े चेहरे उस दड़बे में आने लगे थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इतने बड़े संस्था के अधिकारी इस दड़बे में क्या करने आते हैं।
खैर, मैं मुछमुंडे के स्कूटर के पीछे बैठी, लेकिन अकड़कर नहीं। थोड़ा रीलैक्स होकर। आज मैं बात करने के मूड में थी सो मुछमुंडे से पूछ बैठी- आज मेरी एंकरिंग कैसी रही? उसने कहा- सुपर। उसके बाद मैंने पूछा- तुम बताओ पत्रकारिता के बारे में। तुम तो यहां बहुत दिनों से हो। उसके बाद उसने उस छोटे से सफर में जो कुछ बताया उसने मेरा दिमाग हिला दिया। लेकिन मैनें उसकी बातें बस हूं हां में अनसुनी कर दी। वह कह रहा था कि उसे पत्रकारिता में आने से पहले अपनी जाति और गोत्र का पता नहीं था। यहां आने के बाद सब याद हो गया। अब वह नाम से पहले गोत्र बताता है- पराशर, सिन्हा, पांडे, भूमिहार, राजपूत। गंगा उस पार का है। इस पार का नहीं। एक और बात जो वह नहीं जानना चाहता था, अब समझ गया। वह अब अपने साथ ईर्ष्या, द्वेष, द्रोह, जलन सब कुछ साथ लेकर चलता था। उसने यह भी कहा- सच्चाई से जितना दूर रहो, उतना ही ठीक है। वह अश्विनी सरीन, हेमंत शर्मा, पुण्य प्रसून और कमाल खान नहीं बन सकता। उसे बनने भी नहीं दिया जाएगा। इसलिए जीने के लिए यह सब सीखना होगा। एक दूसरे के सर पर पैर रखकर आगे बढ़ना।
मैं रात के ग्यारह बजे डेरा पहुंची। मेरी सहेली मेरा इंतजार कर रही थी। मैं जाते ही गले से लिपट गई। लेकिन वह ठंडी पड़ी रही। मैने आश्चर्य से पूछा- तुम खुश नहीं हो मेरे एंकर बन जाने से। इतना सुनते ही उसके आंखों में आंसू आ गए। उसने कहा- तुम क्यों गई एंकरिंग करने। मैने शुरू में फील्ड में भेजा था। मैने कहा- इसमें क्या गलती हुई? सहेली ने कहा- ठीक है खाना खाकर सो जाओ, सुबह बात करेंगे। सुबह मैं तैयार होकर पहले ही बैठ गई। लेकिन यह क्या? सहेली अभी भी दांत मांज रही है। मैने पूछा- जाना नहीं है क्या? उसने कहा- नहीं, तुम जाओ। मेरी तबीयत आज भी ठीक नहीं है। मैं इतना सुनते ही निकल पड़ी। मुझे लगा मुछमुंडा की बात सही है। मुझसे मेरी सहेली जल रही है। लेकिन मुझे हर हाल में आगे बढ़ना है।
मुझे दूसरे दिन भी एंकरिंग करनी थी। इतना ही नहीं, आज मुझे यह भी बताया गया था कि कल की मेरी एंकरिंग सबको पसंद आई है और आज बड़े चैनलों के दो और अखबार के एक व्यक्ति मुझे कुछ बताएंगे। हो सकता है मुझे कहीं और भी चांस दिया जाए। आज मैंने और ज्यादा मन लगाकर एंकरिंग की। सब लोगों ने तालियां बजाई। धीरे-धीरे एक-एक कर सब चले गए। बचे सिर्फ टीटू सर और बाहर से आए तीन लोग। मुझे टीटू सर ने अपने बगल में बिठाया और बाहर से मुछमुंडा द्वारा लाया गया स्प्राईट का बोतल खोला गया। मुझे भी एक ग्लास दिया गया। मैंने पीने के साथ कहा कि मैं निकलूंगी सर, मेरी सहेली इंतजार कर रही होगी। टीटू सर बोले- छोड़ो उस सहेली को, तुम्हारे लिए पास में मैने घर देखा है, कल से वहीं रहना। उसके बाद टीटू सर ने कहा- तुम्हारी सहेली का बूथ से फोन आया था, कह रही थी, सर, बिभा को एंकरिंग में मत रखिए। तुम उसे सहेली कहती हो। यह सुनकर मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ जब सर ने नोकिया 6600 से मेरी सहेली की आवाज सुनाई।
मेरा सर भारी होने लगा था। बीच-बीच में आंखें बंद हो रही थी। पता चल रहा था मैं किसी दूसरे कमरे में हूं। मेरे तन पर कुछ कम कपड़े हैं। टीटू सर मेरे दोनों पैरों के बीच अपना सर रखे हैं। लग रहा था जैसे लिजलिजा सा चीज मुझे स्पर्श कर रहा है। मेरी आंखें तो बस खुल रही थीं और बंद हो रही थीं। उसके बाद तथाकथित उन दो बड़े पत्रकारों का लिजलिजापन भी मुझे छुआ। मैं निढाल पड़ी रही। सुबह मैंने अपने को प्रदेश चैनल के एक पास वाले मकान में सोए हुए पाया। पूरा बदन पीरा रहा था। टूट रहा था। एंकर बनने का सपना गायब था। सारा सिद्धांत, प्रतिबद्धता, ग्लैमर, सपने, सब कुछ बिखर सा गया था। मुझे सहेली के वे आंसू याद आ रहे थे जो मुझे एंकरिंग करने से रोक रहे थे। अब समझ में आया था कि क्यों रोक रही थी वो। जैसे-तैसे मैं डेरा पर पहुंची और उसे गले लगाकर रो पड़ी। लेकिन उसकी आंखों के तो आंसू जैसे सूख चुके थे। उसने कहा- चिंता मत कर, मैने सेटिंग कर ली है, हम यहां इस चैनल में नहीं रहेंगे, हम साऊथ इंडिया की एक कंपनी के नए लांच हुए चैनल में चलेंगे, चिंता मत कर। मेरी सहेली ने मेरे आंसू पोंछे और कहा- मैं तुझे एकंरिंग करने से क्यों रोक रही थी, सुन। यहां प्रतिभा सुंदरता कुछ नहीं। सब झूठ है। इक्के-दुक्के को छोड़ दो तो सब के सब हरामी हैं। इन्हें मुफ्त की दारू, लड़की मिल जाए, बस यही इनका संपादकीय है। ये बौद्धक और सिद्धांत से समझौता न करने जैसे विषय पर भाषण पिला देंगे। लेकिन वह सिर्फ इनका मुखौटा है। हां, यह बात अलग है कि किसी लड़की का भोग भी काफी सैद्धांतिक तरीके से करते हैं। उसे सब्जबाग, ग्लैमर व सपनों का संसार दिखाकर सब कुछ लूट लेते हैं।
तू जानती नहीं। मैं मुंह खोल दूं तो कितनों की कुर्सी सरक जाएगी। सरे बाजार नंगे हो जाएंगे साले। भड़वे। जिस्मखोर। सुअर की औलाद....। यह सब सुनकर मुझे सब कुछ अजूबा-सा लगने लगा था। लेकिन मेरी सहेली रूकने वाली कहां थी। उसने फिर कहा- इक्के-दुक्के नहीं, दर्जनों सच्चे पत्रकार हैं लेकिन उनके लिए कोई जगह नहीं। कोई फ्रीलांसर है, तो कोई फ्रस्टेशन का शिकार है। मैने यहां के बड़े-बड़े चेहरों को लड़कियों का .......... चाटते देखा है। सब साले प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन, स्थानीय बिजनेसमैन के दरवाजे के कुत्ते हैं। दिन में जाओ तो ऐसे मिलेंगे जैसे समाज के सबसे चरित्रवान और सिद्धांत पर चलने वाले व्यक्ति हों। लेकिन शाम ढलते ही रात में मिलने वाली मुफ्त दारू और लड़की के चक्कर में रहते हैं। मेरी आंखों के काले घेरे देख रही थी तुम। यह इन्हीं मादरजातों की देन है। मैं दो बार एबार्शन करा चुकी हूं.......। उसके बाद वह फूट-फूटकर रोने लगी। मुझे तो लग रहा था किसी ने जैसे सारा खून निचोड़ लिया हो। थोड़ी देर रोने के बाद वह फिर शुरू हो गई। जानती है, इसमें कुछ लड़कियों का भी हाथ रहा है जो अब दूसरी जगहों पर चली गई हैं। मैं तुम्हें क्या बताऊं, जिन अखबारों को तू चिल्ला-चिल्ला कर पढ़ती थी, उसके जिला संवाददाता भी दारू की बोतल और लड़की पर बहाल होते हैं। यहां का एक अखबारी चोट्टा जो आज तक बदला नहीं गया, उसे सिर्फ सुंदर लड़कियों को चूसना, अपनी चापलूसी कराना, अपनी जाति के लोगों को आगे बढ़ाना ही आता है। ईमानदारी से उसे सख्त नफरत है। बोलते-बोलते वो हांफने लगी थी। जैसे-तैसे सुबह हुई और हम एक नए क्षेत्रीय चैनल के दरवाजे तक पहुंच गए। पहुंचे ही नहीं बल्कि प्रदेश न्यूज के नाम पर कापी एडिटर/ रिपोर्टिंग में 5 हजार रुपए महीने की सेलरी पर ज्वाइन भी कर लिया। लेकिन यहां कि कहानी ने तो शोषण और मानसिक प्रताड़ना की परिभाषा ही बदलकर रख दी। जारी....
20 March, 2009
फील गुड बनाम गुड न्यूज
-प्रमोद रंजन
' वो सब कुछ करने को तैयार/सभी अफसर उनके/अखबार, छापेखाने/बहाने चुप कराने के/नेता और गुंडे तक उनके '
-ब्रेख्त की कविता पंक्ति
निम्न जातियों के प्रतिरोध के लिए विख्यात रहे बिहार में इन दिनों दलित उत्पीड़न के विरोध में उठने वाली आवाजें सुनाई नहीं देतीं. यहां के 'अखबार, छापेखानों' ने भी चुप्पी साध रखी है.
एक ओर 'विकास-विकास' का प्रयोजित शोर और दूसरी ओर दलितों पर ढायी जा रही हिंसा पर अनमयस्क चुप्पी-यह बिहार का मौजूदा मीडिया-परिदृश्य है.
सबसे ताजा घटना को ही लें. गत चार फरवरी को दरंभगा जिला के बिरौल अनुमंडल के लगमां गांव की मुसहर बस्ती पर ब्राह्मणों का कहर बरपा. लगभग ७० झोपड़ियां ब्राह्मणों के क्रोध में जलकर खाक हो गयीं. घरों से भागते दर्जनों महिला-पुरूषों को खदेर-खदेर का बेरहमी से अधमरा होने तक पीटा गया. कई दुधमुंहे बच्चे आग में झुलस गये. लेकिन यह खबर बिहार के समाचार पत्रों के जिला संस्करणों से बाहर नहीं निकल पायी. राजधानी पटना के संस्करणों में इसे छोटी सी जगह अंदर के पन्नों में दी गयी. इस मामले में विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल का रवैय्या भी गैरजिम्मेवाराना रहा. इसी दिन सरस्वती की मूर्ति विर्सजन को लेकर गोपालगंज जिला के विशुनपरा गांव में सांप्रदायिक तनाव की घटना पर राजद प्रवक्ताओं ने हो-हंगाम किया लेकिन लगमां में दलितों पर ढायी गयी हिंसा पर एक चलताऊ बयान देकर चुप्पी साध ली. झगड़ा जमीन का था. कभी दरभंगा महाराज की जायदाद रही इस बस्ती की जमीन राज्य सरकार के पिछले सर्वे के अनुसार 'सरकारी गैरमजरूआ' पायी गयी थी. इसी तथ्य के बूते मुसहरों ने लगभग पांच साल पहले इस जमीन पर आशियाना बसा लिया था. लगमां गांव ब्राह्मण कहते हैं कि यह जमीन दरभंगा महाराज के वंशजों ने हमें दान में दी थी. पांच साल पहले भाकपा (माले) की षह पर मुसहरों ने हमारी जमीन पर जबरन कब्जा कर लिया था. वह लालू के जंगलराज का समय था सो चुप रहे; लेकिन नीतीष के सुषासन पर हमें भरोसा है. नीतीश ने 'न्याय के साथ विकास' का नारा दिया है. वह विकास में फंसे है, इस बीच 'न्याय' हम खुद कर ले रहे हैं!
मीडिया की कारस्तानी उस समय और संगीन हो जाती है जब हम यह जानते हैं कि बिहार के प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अधिकांश प्रमुख संवाददाता घंटों चली इस भयंकर आगजनी के समय घटना स्थल से महज १० किलोमीटर की दूर बिरौल अनुमंडल के ही दबंग ब्रह्मणों के गांव कमलपुर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मौजूद थे. इस गांव में मुख्यमंत्री की 'विकास यात्रा' की सभा और रात्रिविश्राम था. मुख्यमंत्री ने भी इस घटना की न निंदा की, न ही कोई बयान दिया। !
भारातीय जनता पार्टी और जदयू की मिली जुली सरकार के दौरान दलित उत्पीड़न की ऐसे दो दर्जन से अधिक घटनाएं हुई हैं, जिन्हें मीडिया ने हाशिया पर धकेला है. मुख्यमंत्री के गृह जिला नालंदा के सिलाव थाना के घोसतामा गांव में ऐसी ही एक वीभत्स घटना में अपनी १४ साल की बेटी को उठाने का विरोध करने पर सामंतों ने छोटन पासवान नामक व्यक्ति की मूंछ उखाड़ ली थी और उसकी पत्नी की बेरहमी से पिटाई की थी. पीड़ित परिवार कई दिनों तक बिहार शरीफ के सदर अस्पताल में भर्ती रहा लेकिन मीडिया ने कोई सुध नहीं ली. इसी जिला के अस्थावां थाना के जियर गांव में मंदिर में प्रवेश करने के कोशिश करने के आरोप में कारू पासवान की हत्या कर दिये जाने की घटना को भी मीडिया ने अछूत माना. नालंदा जिला की इन दोनों घटनाओं पर दलित सेना के अध्यक्ष व लोकजनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ने प्रेस कांफ्रेंस कर जानकारी दी थी. तब भी इसकी कोई नोटिस नहीं ली गयी.
वास्तव में साल २००३-०४ में केंद्र की सत्ता में राजग द्वारा अपनाये गये 'फील गुड' की पैरोडी के रूप में बिहार में इन दिनों 'गुड न्यूज' की धूम है. फर्क सिर्फ इतना है कि अटल बिहारी वाजपेयी को 'फील गुड' के विज्ञापन छपाने के लिए देश की गाढ़ी कमाई अखबारों पर खर्च करनी पड़ी थी. नीतीश-मोदी के लिए बिहार के समाचार पत्र यह काम मुफ्त कर रहे हैं.
विकास यात्रा के उत्साह में हुआ कांड
'' जब जमींदारी खत्म होने लगी तो दरभंगा महाराज के मैनेजरों ने आननफानन में फर्जी रसीद पर सैकड़ों लोगों को जमीन दे दी. मिथिलांचल में ऐसे विवाद कई जगह हैं. लगमां की जमीन भी इसी तरह की है लेकिन पिछले सर्वे के अनुसार यह जमीन गैरमजरूआ के रूप में सरकारी रिकार्ड में दर्ज है. वास्तव में मामला सिर्फ इतना ही नहीं है. लगमां की मुसहर बस्ती पर हमला करने वाले गुंडो को भाजपा के विधान पार्षद संजय झा का संरक्षण प्राप्त था. परीसीमन के बाद नीतीष के चहेते, दरभंगा महाराज के अररिया ड्योढ़ी के वशंज संजय झा दरभंगा लोकसभा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ना चाह रहे हैं. इस मामले में जमीन-विवाद के अलावा हमले का तात्कालिक कारण लोकसभा चुनाव और मुख्यमंत्री की विकास यात्रा है. मुख्यमंत्री की यात्रा से उत्साहित ब्राह्मणों ने अपनी ताकत दिखलाने के लिए इस घटना को अंजाम दिया है ताकि उनमें इतना भय भर दिया जाए वे मतदान केंद्रों तक न पहुंचें.''
-धीरेंद्र झा, भाकपा (माले) केंद्रीय कमिटि के सदस्य व दरभंगा मामलों के प्रभारी
घर का मोह छोड़ पोखर किनारे बसें दलित!
'' लगामां गांव की दलित बस्ती दरभंगा महाराज की पट्टी है. इस जमीन पर बसे लोगों ने इस पर जबरन कब्जा कर लिया है. यहां बसे दलितों को हम लोग पोखर के किनारे जगह दे रहे हैं. लेकिन ये वहां बसने के लिए तैयार नहीं हैं. इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है. आगजनी की घटना में दोनों पक्षों पर प्राथमिकी दर्ज की गयी है.''
-शमीम अहमद, एसडीओ, बिरौल अनुमंडल
प्रथम प्रवक्ता, संपादक रामबहादुर राय, के 16 मार्च अंक में प्रकाशित
25 February, 2009
बाढ़ पर हंगामी बुकलेट
05 February, 2009
राहुल राज और बिहारी अस्मिता का लुभावना नारा
हर सनसनीखेज खबर की ही तरह इस खबर को याद रखे जाने की अवधि भी अंततः बहुत छोटी रही. अन्यथा महज तीन माह पहले महाराष्ट्र में बिहारियों की पिटाई की घटना के बाद जिस तरह राजनीति गरमायी थी, उससे शायद कुछ लोगों को ऐसा लगा था कि यह मामला लंबा चलेगा. कुछ यहां तक कह रहे थे कि यह घटना देश की राजनीति की दिशा ही बदल देगी. लेकिन न कुछ ऐसा होना था, न हुआ. अलबत्ता इस बार भी मीडियाई हुड़दंग ने इस मुद्दे से जुडे जेनुइन सवालों को सयास पीछे धकेल दिया. अब जब यह मामला शांत हो गया है, बिहार समेत अन्य बीमारू हिंदी प्रदेशों की मौजूद राजनीति व वास्तविक समस्याओं को उन जरूरी सवालों की ओर लौट कर समझा जा सकता है.
अगर मुंबई की सड़क पर सरेआम पिस्तौल लहरा रहा युवक -'राहुल राज' की जगह कोई 'अनवर हुसैन' होता तो क्या स्थितियां बनतीं? यह एक ऐसा ही सवाल है, जिसका उत्तर सब जानते हैं. सो, राहुल राज इनकाउंटर की आवश्कता, नैतिकता पर बात करने से बेहतर है कि इस प्रकरण के कुछ दूसरे पहलुओं पर बात की जाए.मुंबई में बस अगवा करते राहुल राज की हत्या (२७ अक्टूबर) ने महाराष्ट्र मसले पर बिहार में चल रहे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया था. इस घटना से पहले बिहार में जगह-जगह ट्रेनें जला रहे, तोड़फोड़, पथराव कर रहे छात्र राज ठाकरे से अधिक अपने नेताओं लालू-नीतीश के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर रहे थे. नारे लगा रहे थे. उनमें यह भाव था कि पलायन की विवशता के लिए जिम्मेवार अपने ही नेता हैं. राहुल राज के इनकाउंटर के बाद ही बिहार के राजनेताओं ने राहत की सांस ली. लालू, नीतीश व रामविलाजी ने उसे शहीद, शेरे बिहार, बिहार का सपूत और न जाने क्या-क्या कहा. इससे एक रोज पहले तक नीतीश महाराष्ट्र में बिहारी युवकों की पिटाई के बाद बिहार में घट रही तोड़फोड़ की घटनाओं से बेहद चिंतित थे. उन्होंने संचार माध्यमों को कहा था कि न कुछ ऐसा छापा जाए, न दिखाया जाए, जिससे बिहार की भावना भड़के. लेकिन इस युवक के मारे जाने के बाद परिदश्य बदल गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, रेलमंत्री लालू प्रसाद व रसायन मंत्री रामविलास पासवान अपने-अपने तरीके से राहुल राज के एनकाउंटर को को तूल देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वास्तव में राहुल की हत्या ने ही बिहारी आक्रोश की धारा पूरी तरह राज ठाकरे और महाराष्ट्र सरकार की ओर मोड़ दी है. बिहार के राजनेताओं का अभिष्ट भी यही था. राजनताओं में राहुल की अंतयेष्टि में शामिल होने, उसके घर जाकर सांत्वना देने की होड़ लग गयी. नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी (उपमुख्यमंत्री), दीपंकार भट्टाचार्य (माले महासचिव), अनिल शर्मा (प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष), समेत कई बडे-छोटे नेता उसके घर पहुंचे. बाहुबली सांसद सूरजभान सिंह, राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (प्रदेष अध्यक्ष, जदयू) गिरिराज सिंह (सहाकारिता राज्य मंत्री, बिहार), अखिलेश सिंह (केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री) समेत एक खास जाति के कई राजनेताओं ने राहुल के घर जाकर 'न्याय' दिलाने का वादा किया.
परीक्षा केंद्र बदलने में रूचि न लेने वाले लालू प्रसाद ने राहुल राज की हत्या के बाद टीवी कैमरे के सामने बेतरह गुस्सा दिखाते हुए कहा कि महाराष्ट्र सरकार पगला गयी है. उन्होंने बताया कि राहुल एक 'संभ्रात' परिवार का लड़का था. हमेशा जाति के संदर्भ के साथ बात करने वाले लालू प्रसाद के इस संकेत का अर्थ बिहार के लोग समझते हैं. राहुल का जन्म एक उंची जाति के (भुमिहार) परिवार में हुआ था. लालू कहना चाह रहे थे कि उसे 'गरीब-गुरबा' न समझा जाए. संभ्रांत परिवार का था.
लालू प्रसाद द्वारा किये गये इस संकेत के साथ ही मुंबई पुलिस की गोली से मारा गया राहुल राज एक साथ कई प्रतीकों का वाहक बनता है. ये प्रतीक हैं बिहार की कुंठा के. यहां की द्विज जातियों की प्रतिक्रिया के. बिहार में भीतर-भीतर पनप रही अलगाववादी मनोवृतियों के.राहुल की पारिवारिक पृष्ठभूमि जाने बिना आगे बढ़ने पर हम इन प्रतीकों को नहीं समझ पाएंगे.
राहुल ने रेडियोलॉजी में डिप्लोमा किया था और २४ अक्टूबर को घर से मुंबई जाते हुए यह कह गया था कि वह नौकरी तलाशने जा रहा है. २५ या २६ अक्टूबर को वह मुंबई पहुंचा और दूसरे दिन ही यह कांड सामने आया. वह पटना के कदमकुआं मुहल्ले के एक मध्यवर्गीय परिवार का लड़का था. उसके पिता ने दो शादियां की हैं. दूसरी शादी राहुल की मां की छोटी बहन से है. टीवी पर राहुल के दोस्त यह कहते दिखे कि राहुल के पिता उसे असहनीय शारीरिक व मानसिक यातनाएं दिया करते थे. २४-२५ वर्षीय युवक राहुल की लोहे के रॉड से पिटाई की जाती थी. बात-बेबात अपमानित किया जाता था. बेरोजगारी और पिता की क्रूरता की दोहरी मार से बचने के लिए उसने आत्मघात का रास्ता चुना. खामोशी के हथियार से अपनी जलालत भरी जिंदगी का प्रतिरोध करने वाला यह युवक महाराष्ट्र की घटनाओं से व्यथित रहा होगा. राहुल की कुंठा का यह अंतिम चरण-आत्मघाती प्रवृति-कामोवेश बिहार की कुंठा को भी प्रतिबिंबित करती है.
हिंदी समाचार पत्रों में बिहार व उत्तर प्रदेश्ा के द्विज पत्रकार भरे हैं. बिहार के राजनेताओं के साथ-साथ राहुल की कार्रवाई को महिमामंडित करने में इन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. स्थानीय टीवी चैनलों ने तो कोढ़ में खाज की ही भूमिका निभाई. इस सब के बावजूद, राहुल द्वारा किया गया काम, गरीबी और जहालत की मार झेल रहे विकास की दौड़ में पीछे छूट गये इस बीमारू राज्य से निकला, एक ऐसा संकेत तो है ही, जो बताता है कि पानी अब नाक के उपर से गुजरने वाला है. तो क्या अब तक हालत ठीक थे?
बिहार से पलायन का सिलसिला तो वर्षों से जारी है. १९७५ के आसपास इसमें तेजी आयी. पंजाब-हरियाणा में बिहारी मजदूरों की चाय में अफीम मिलाकर उनसे बंधुआ की तरह काम लिया जाता रहा है. महानगरों में उनका जीवन सामाजिक तथा भौतिक रूप से नारकीय है. मारपीट तो छोटी बात है. कितने बिहारी मजदूर परदेश में काम के दौरान मर गये, इसका आंकड़ा न वहां की सरकारें रखती हैं न ही बिहार सरकार ने इससे कभी मतलब रखा है. सिर्फ पंजाब-हरियाणा जाने वाले सैकड़ों मजदूर हर साल ट्रेनों से कट कर मर जाते हैं. इनमें से अधिकांश की तो पहचान तक नहीं हो पाती है. (देखें, पत्रकार अरविंद मोहन का शोघ 'प्रवासी मजदूरों की पीड़ा', राधाकृष्ण प्रकाशन).
बिहार से पलायन के दो मुख्य कारण हैं. कृषि की बदहाली व शहरीकरण की बेहद सुस्त प्रक्रिया. इन दोनों के पीछे प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से भूमि संबंध ही हैं, जिन्हें बदलने की हर कोशिश यहां के सामंतों ने नाकाम कर दी. नतीजा यह हुआ कि कृषि उत्पादन घटता गया, अंत में तो सिर्फ सामंती हेंठी ही शेष रह गयी; आर्थिक ठाठ लगभग जाता रहा. क्रांतिकारी आंदोलनों के प्रभाव में आयी निचली जातियों के युवकों में जागरूकता आयी कि स्थानीय सामंतों का बंधुआ होने से बेहतर है पूंजी की बड़ी मंडियों में अपना श्रम बेचना. इन सबने बिहार में पलायन के लिए एक आदर्श वातावरण तैयार किया. लालू प्रसाद के नेतृत्व में १५ वर्च्चों तक चली सरकार ने बची-खुची संस्थाओं को भी ध्वस्त कर, इसे और तेज कर दिया. राजद शासन काल में दलितों-पिछड़ों का पलायन तो बढा ही; 'संभ्रांत' जातियों के युवकों का भी बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ, जो उत्तरोत्तर तेज होता गया है.बिहार के गांवों में इन जातियों के पास भले ही पैसा न था, सामाजिक सम्मान तो था ही. परदेश में 'बिहारी', 'भैया' आदि संबोधन अब तक पिछड़े तबके से आने वाले मजदूरों की पहचान था. श्रम की मंडियों में संभ्रांत तबकों के लोग पहुंचे तो उनपर भी यही अपमानजनक संबोधन, व्यवहार लागू हुआ. जब तक बिहारी समाज का पिछड़ा तबका पलायन की पीड़ा झेलता रहा. परदेष में अफीम पीकर काम करता रहा. पिटता रहा. भैया एक्सप्रेसों से गिर कर मरता रहा. बात-बे-बात पर मारा जाता रहा, तब तक न बिहार के 'संभ्रांत' लोगों को कोई फिक्र हुई, न पत्रकारों को. अब जब अपनों पर बीत रही है तो छाती फटी जा रही है!
यह महाराष्ट्र-असम में हिंदी भाषियों पर हमले से मचे बवाल का सामजिक परिप्रेक्ष्य है. जाहिर तौर पर इस प्रकरण के व्यापक आर्थिक पहलु भी हैं. लेकिन इनका संबंध महाराष्ट्र-असम में हो रहे बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों के विरोध से है, न कि इन विरोधों के बाद मचाये जा रहे बवाल से. इस फर्क पर गौर किया जाना बेहद जरूरी है. बेरोजगारी की मार से कराह रहे इन राज्यों की मांग है कि रेलवे समेत तीसरे और चौथे दर्जे की अन्य नौकरियों में भी स्थानीय लोगों को आरक्षण मिले. देश की अखंडता और रोजी-रोजगार के लिए कहीं भी जाने की स्वतंत्रता का समर्थन करने के बावजूद; इन राज्यों की मांगों को खारिज नहीं किया जा सकता. इन घटनाओं के बीच चल रहे लोकसभा सत्र में भी यह सवाल गूंजा था. शिवसेना व भारतीय जनता पार्टी के सांसदों का कहना था कि महाराष्ट्र में रेलवे की नौकरियों में बिहार के लोगों की संख्या ४८ से ६५ प्रतिशत तक हो गयी है. उड़ीसा के एक भाजपा सांसद रूद्र नारायण पाणि ने कहा कि रेलवे की जोनल कमिटियों में ८५ प्रतिशत लोग बिहार के हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस के शरद पवार व छगन भुजबल ने भी इसका समर्थन किया है तथा महाराष्ट्र कांग्रेस भी कमोवेश ऐसा ही सोचती है. किसी जेनुइन सवाल को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह दक्षिणपंथियों की ओर से आया है. बिहार में इन दिनों बड़े पैमाने पर (लगभग २.५० लाख) शिक्षकों की बहाली चल रही है. बिहार वासियों के लिए इसमें सौ फीसदी आरक्षण रखा गया है. जबकि इन शिक्षकों के वेतन का ७५ प्रतिशत भाग केंद्र सरकार वहन कर रही है. महाराष्ट्र जैसे गैर हिंदी भाषियों की तो छोड़िए, अगर आरक्षण न हो और इनमें से ४८-६५ फीसदी लोग उत्तरप्रदेश के ही चुन लिये जाएं तो बिहार के लिए भी इसे पचाना असंभव होगा.
रेलमंत्री के पद पर बिहार का वर्चस्व पुराना है. यह सिर्फ चर्चा ही नहीं, बल्कि राजनीतिक अरोप-प्रत्यारोपों में उजागर हो चुका तथ्य है कि रामविलास पासवान और नीतीश कुमार के कार्यकाल में रेलवे की नौकरियों की पैसे व जाति के आधार पर बंदरबांट की गयी. लालू प्रसाद इसमें भी पीछे नहीं रहे हैं. यह समझना भूल होगी कि वर्तमान व पूर्व रेलमंत्रियों की ओर से उठी 'कहीं भी रोजी-रोजगार करने की स्वतंत्रता' की आवाज देश की अखंडता और एकता की रक्षा के लिए है. इन धुर विरोधियों की एकता के पीछे कुछ और भी है. बहरहाल, बिहारी मान-सम्मान के लुभावने नारों के पीछे भागने वालों से सिर्फ एक सवाल पूछना पर्याप्त होगा कि बिहार की बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार हैं?
श्ाहीद बनाने का खेल
महाराष्ट्र में बिहारी युवकों की पिटाई के बाद बिहार की घटनाओं को तिथिवार देखा जाए तो कुछ तथ्य स्वतः खुलते हैं. १९ अक्टूबर को बिहारी छात्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के कार्यकर्ताओं से पिटे. वहां से २१ अक्टूबर को पटना लौटे विद्यार्थियों ने स्टेशन परिसर व द्याहर की सड़कों पर जम कर उत्पात मचाया. इस बीच नालंदा जिला के एक छात्र की मनसे कार्यकर्ताओं की पिटाई में हुई मौत की भी खबर आ गयी. आक्रोश और भड़का. पवन नालंदा जिला के बाराखुर्द गांव का एक पिछड़ी जाति में पैदा हुआ होनहार युवक था. रेलवे की परीक्षा देने से पहले एलआइसी में उसकी नौकरी हो चुकी थी. २१ अक्टूबर को ही उसका शव पटना एयर पोर्ट पहुंचा, उसी शाम पटना के पास ही फतुहा में उसकी अंतयेष्ठि की गयी. उसके लिए मुआवजे की घोषणा तो हुई लेकिन बिहार के किसी राजनेता ने मनसे कार्यकर्ताओं की हिंसक गुंडागर्दी में मारे गये इस बेकसूर की मातमफूर्सी में शामिल होन की जरूरत नहीं समझी... न ही मीडिया ने 'गरीब-गुरबा' के इस बेगुनाह युवक को 'संभ्रांत' परिवार के पिस्तौल लहारते युवक राहुल की तरह 'शहीद' कहा. जैसे-जैसे मुंबई से छात्र लौटते गये, हंगामा बढ़ता गया. २२ अक्टूबर को जहानाबाद, सासाराम, नवादा आदि स्टेशनों पर जम कर तोड़फोड़ हुई. बाढ़ में ट्रेन में आग लगा दी गयी. सासाराम में हंगामा करते छात्रों पर पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें एक की मौत हो गयी. (बिहार पुलिस की गोली से हुई इस मौत को भी राजनेताओं ने तवज्जो नहीं दी) पवन की मौत के विरोध में इस दिन मुख्यमंत्री का चुनावी गढ नालंदा जिला बंद रहा. जिला मुख्यालय बिहार शरीफ में छात्रों ने न सिर्फ मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के लिए बनाये गये मंच को तोड़ डाला बल्कि शहर भर में उनके नाम के जितने शिलापट्ट थे, सभी ध्वस्त कर दिये. इससे एक दिन पहले वहां मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के पूर्वाभ्यास के लिए पहुंचे हैलीकॉप्टर पर पथराव किया गया था. आक्रोश की दिशा देख घबराए मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को पुचकारते हुए समझाया कि 'आप लोग सहयोग कीजिए. नहीं तो बिहार धू-धू कर जल जाएगा. एक बार आग लग गयी तो कोई नहीं रोक पाएगा. जो छवि बनी है वह मिनट भर में समाप्त हो जाएगी'. याद कीजिए, विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल ने इससे पहले आरोप लगया था कि सत्ताधारी जदयू-भाजपा की द्याह पर रेल-संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. तोड़फोड़ की कुछ घटनाओं में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की संलिप्तता भी सामने आयी थी. अगले तीन-चार दिनों में यह आक्रोश और भड़का तो मुख्यमंत्री ने अपनी चिरपरिचित कार्यशैली को अंजाम देते हुए अखबारों पर सेंसरषिप का उस्तरा चला दिया. २३ अक्टूबर को मोतीहारी, बक्सर, लखीसराय, भागलपुर, मुजफ्फरपुर में रेल व अन्य सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. डालमिया नगर में रेलमंत्री लालू प्रसाद की जनसभा के लिए बनाये गये पंडाल में आग लगा दी गयी. २४ अक्टूबर को भी पटना, गया, बेतिया आदि में उग्र प्रदर्षन हुए लेकिन 'सेंसरषिप' ने असर दिखाया. तोड़फोड़ और 'बिहारी आक्रोष' से संबंधित खबरें अचानक बिहार के अखबारों के भीतरी पन्नों पर चली गयीं और 'अमन चैन बहाली' की खबरों को पहले पन्ने पर जगह मिलने लगी. २७ अक्टूबर को राहुल राज की मौत ने इस अखबारी दृश्य को एक बार फिर उलट दिया. अब खुद नीतीश्ा भी ऐसा ही चाहते थे.
31 January, 2009
निराला को आज पढ़ते हुए
-प्रमोद रंजन
निराला के जन्म काल को ही लें। साहित्य के इतिहास में उनका जन्म वर्ष १८९६ बताया गया है लेकिन वहां तिथि और माह नहीं है। छायावाद के अन्य कवियों जयशंकर प्रसाद (१८८९) और महादेवी वर्मा (१९०७) के साथ भी ऐसा ही है। पंत को अपनी जन्म तिथि पता है-२० मई, १९०० । संभव है पंत का परिवार अपनी संतान की जन्म तिथि की स्मृति रखने के मामले में छायावाद के अन्य कवियों निराला, महादेवी और जयशंकर प्रसाद के परिवार से अधिक सचेत रहा हो। लेकिन यह संभवना उस समय समाप्त हो जाती है-जब हम उनकी जन्म तिथि के स्थान पर 'वसंत पंचमी' दर्ज पाते हैं। अगर निराला को यह पता है कि उनका जन्म 'वसंत पंचमी' के दिन हुआ था तो उन्होंने इसकी तिथि क्यों नहीं निकाली? १८९६ में वसंत पंचमी किसी तिथि को पड़ी थी-यह कैलेंडर के माध्यम से आज भी आसानी से जाना जा सकता है। निराला द्वारा प्रयुक्त शब्दों के उत्स के लिए पोथी दर पोथी तलाशने वाले आलोचकों ने भी इसे यथावत छोड़ दिया है. निराला के काव्य के कई हिस्सों को पढ़ते हुए यह तथ्यगत संदेह होता है कि एक हिंदू त्योहार को जन्म तिथि के रूप में पेश करना सिर्फ मिथक गढ़ना नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति के नाम पर सचेत रूप से हिंदू मानकों को स्थापित करना है. निराला के काव्य के बारे में रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं- 'अद्वैतवाद के वेदांती स्वरूप को ग्रहण करने के कारण इनकी रहस्यात्मक रचनाओं में भारतीय दार्शनिक निरूपणों की झलक जगह-जगह मिलती है (हिंदी साहित्य का इतिहास)'. ध्यान दें, अद्वैतवाद का वेदांती स्वरूप और भारतीय दार्शनिक निरूपणों की झलक. अद्वैतवाद के वेदांती स्वरूप में-हजारों परंपरा वाले भारतीय दर्शन की कितनी और कैसी झलक संभव है? तुलसीदास की तरह निराला के भी रामचंद्र शुक्ल की प्रशंसा के पात्र बनने का कारण यह था कि खुद शुक्ल जी का 'इतिहास' हिंदी साहित्य और 'हिंदू साहित्य' के फर्क को लगभग मिटा देने वाला रहा है. सोचिए, समाज के 'वेदांती रूप' की असलियत जानने वाले आज के पाठक के लिए इस प्रशंसा के क्या मायने हो सकते हैं. निराला के काव्य में मनु और नीत्शे की झलक इस पाठक को और दुविधाग्रस्त कर देती है.
निराला की प्रसिद्ध पंक्ति है-'योग्य जन जीता है, योग्य जन जीता है/ पश्चिम की उक्ति नहीं, गीता है, गीता है'. 'योग्य जन जीता है' यह मानवतावाद की अवधारणा नहीं है. मार्क्सवाद के तो यह ठीक विपरीत ही है. निराला को पढ़ते हुए आज के पाठक के ध्यान में यह भी रहेगा कि 'चातुवर्ण्यं मया सृष्टि' (वर्णव्यवस्था मेरी रचना है) का उदघोष करने वाली गीता का लक्षित 'योग्य जन' कौन है. नीत्शे के परिप्रेक्ष्य में यही 'योग्य जन' 'सूपर मैन' है. निराला के ऐसे रूप उनकी रचना 'तुलसीदास' में भी साफ दिखते हैं. कवि तुलसीदास के देश काल के वर्णन के बहाने यहां निराला मुसलमानों के प्रति अपना वैर भाव दिखाने का कोई अवसर नहीं चूकते. उनके हिंदुत्व की उग्रता का ताप विचलित कर देने वाला है. यद्पि यह तुलना ज्यादा प्रासंगिक नहीं है पर यहीं हमारा ध्यान निराला और नीत्शे के जीवन की दो समानताओं की ओर भी जाता है. नीत्शे की ही तरह निराला के बारे में भी कहा जाता है कि उनका जीवन घोर अभावों और विपत्तियों के बीच बीता था. इसके अलावा दोनों को अपने जीवन के अंतिम दिनों में विक्षिप्तावस्था से गुजरना पड़ा था. निराला अंतिम कविता है 'पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है'. यही उस कविता की पहली पंक्ति भी है. डॉ. बच्चन सिंह ने अपने एक लेख में इस कविता की व्यख्या करते हुए लिखते हैं- 'पत्रोत्कंठित शब्द अर्थ बोध में बाधा डालता है...संधि विच्छेद करने पर इसका अर्थ कुछ खुलता है. पत्रा+उत्कंठित. अवध के गांवों में, अवधि से सटे हुए भोजपुरी के गांवों में एक मुहाविरा चलता है. उनका पत्रा खो गया है-उनका पत्रा हेरायल बा. यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु विलंबित हो जाती है, तो लोग ऐसा ही कहते हैं. पत्रा खो जाने से मृत्यु तिथि के न मिलने का बोध होता है. कवि को उसी पत्रा को पाने की उत्कंठा है.' निराला की इस अंतिम कविता की अंतिम पंक्ति है 'पुनः सवेरा एक और फेरा है जी का'. यहां पुर्नजन्म की अवधारणा की पुष्टि स्पष्ट है.
'वसंत पंचमी' से ' पुर्नजन्म' तक की यात्रा के अन्य अनेक पड़ाव सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कथित प्रगितशीलता को ध्वस्त करते हैं और आज के पाठक के समक्ष उनके पूरे काव्य को संदिग्ध बनाते हैं।
( प्रभात खबर, 31 जनवरी, 2009 के अंक से साभार )
15 January, 2009
बाढ़ त्रासदी की अनकही सुनिए
अमलेन्दु उपाध्याय
बिहार की बाढ़ त्रासदी पर पत्रकारों और समाजसेवियों की नई दृष्टि देती रिपोर्टिंग 'अनकही कहानी' हर संवेदनशील व्यक्ति को पढ़नी चाहिए। यह हमें मौतों पर होती घटिया राजनीति और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कार्यपालिका के नंगे यथार्थ से रूबरू कराती है 11 सितंबर को अमरीका में हवाई हमले में लगभग 5 हजार लोग मारे गए थे। आज भी उनकी याद में मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। भारतीय मीडिया भी इन तस्वीरों को प्रसारित करता है। क्या 18 अगस्त की याद में भी, जिसमें 50 हजार लोग मारे गए, मोमबत्तियां जलाई जाएंगी? यह सुलगता हुआ सवाल किया गया है 'बाढ़-2008' पर फ्री थिंकर्स की ओर से जारी 'अनकही कहानी' के मुखपृष्ठ पर ही। जाहिर है जवाब भी सवाल के माफिक सुलगता हुआ ही होगा - 'नहीं। कारण? हम-आप सब जानते हैं।' बिहार की कोसी बाढ़ त्रासदी पर पत्रकारों और समाजसेवियों की नई दृष्टि देती रिपोर्टिंग हमें मौतों पर होती घटिया राजनीति और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कार्यपालिका के नंगे यथार्थ से रूबरू कराती है।
'बाढ़ की जाति' में प्रमोद रंजन बताते हैं कि किस प्रकार जदयू नेता शिवानंद तिवारी ने निहायत ही फूहड़ और घटिया बयान देकर 'भाई का दर्द भाई ही समझता है' साबित कर दिया है कि इस विकराल आपदा के समय बिहार में घृणित राजनीति ही नहीं चल रही है, बल्कि इसके पीछे एक कुत्सित जातिवाद भी चल रहा है, जो यह हुंकार भर रहा है कि 'यादवो, दलितो, अति पिछड़ो! तुम्हारे समर्थन का भी हमारे लिए कोई मोल नहीं है।' प्रमोद रंजन की रिपोर्ट बताती है कि जाति बिहार की नस-नस में कूट-कूट कर भरी है। मेधा पाटकर के साथ आए 'घर बचाओ' आंदोलन के कार्यकर्ताओं के द्वारा लाई गई सहायता सामग्री को कैसे कैपिटल एक्सप्रेस के गार्ड उदयशंकर ने गालियां बकते हुए फिंकवा दिया, चूंकि ये कार्यकर्ता दलित थे। रपट के अंत में प्रमोद कहते हैं कि सुशील मोदी बता रहे हैं कि केमिकल 'गुजरात' से आ रहा है (और शायद आइडिया भी)। राज्य सरकार की ओर से पहली बार व्यवस्थित ढंग से आदमियों के शवों को भी ठिकाने लगाया जाएगा। न बदबू आएगी, न आक्रोश फैलेगा.....मरे तो शूद्र हैं। भाजपा जिस मनुवाद में विश्वास करती है, उसके अनुसार शूद्र और पशु एक समान होते हैं।
अष्टावक्र कहते हैं कि ठीक उसी तरह जैसे प्रेमचंद के 'कफन' में घीसू और माधव कफन के लिए चंदा कर रहे हैं, उसी तर्ज पर नीतीश चंदा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सब कुछ समय से होगा। हिटलर जिंदाबाद का नारा है। भावी इतिहास हमारा है। नीतीश हिटलर के बिहारी अवतार हैं। दोनों समाजवादी। दोनों विकास-पुरुष। हिटलर ने कहा था- गर्व से कहो हम जर्मन हैं। नीतीश ने कहा है- गर्व से कहो हम बिहारी हैं। विकास की जो मिसाल हिटलर ने रखी थी, वही मिसाल नीतीश ने रखी है।
एक संवाददाता की डायरी में कितना मार्मिक चित्रण है कि दिल दहल जाए- 'बाढ़ पीढ़ितों द्वारा कहा गया हर वाक्य खबर है...अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं की भीड़ थी। किसी के गर्भ से हाथ निकाले बच्चा चार दिनों से पड़ा था, तो कोई खून से लथपथ अस्पताल के फर्श पर पड़ी थी।....नवजात बच्चे दम तोड़ रहे थे।' आरएसएस के ऊपर टिप्पणी करते हुए यह संवाददाता कहता है- 'भाजपा के एक नेता कहते हैं कि यहां ईसाई मिशनरियों की दाल नहीं गलने दी जाएगी। बाबा रामदेव से बात हो गई है कि जितने बच्चे अनाथ हो गए हैं उन्हें गोद ले लिया जाएगा। आखिर आरएसएस जिंदा ही है इन्हीं हथकंडों के कारण। मेरा ध्यान तो रामदेव पर अटका है। बाबा रामदेव माने रामदेव यादव। वैसे ही जैसे लालू प्रसाद माने लालू यादव?' टिप्पणी बहुत गंभीर है। कोसी के पीड़ितों की अनकही कहानी वहां से शुरू होती है, जहां से शब्द अभिव्यक्ति की सामर्थ्य खोने लगते हैं। अपने परिवार के छह सदस्यों को खोने वाले हशमत की व्यथा के लिए न 'व्यथा' शब्द पर्याप्त है न ही नाव पलटने के बाद गर्भवती पत्नी और बच्चों के लिए बिलखते हशमत को पीटकर कोसी की अथाह धारा में फेंक देने वाले सैनिकों की क्रूरता के लिए 'क्रूरता'। डायरी के अंत में संवाददाता कहता है- 'थोड़ी देर लेटता हूं। सोकर क्या करूंगा...सुबह की पहली ट्रेन से उस पटना नगरी में लौटना है, जहां सत्ताधीश बाढ़-पीढ़ितों के लिए राहत शिविर चलने नहीं देना चाहते।'
आखिरी रपट में सत्यकाम की उलाहना नीतीश के लिए काफी गंभीर है, लेकिन क्या नीतीश भी सीख लेने का समय निकालेंगे? - 'बांध 18 तारीख को टूटता है, नीतीश की खुमारी 24 को टूटती है। चिल्लाते हैं- जा रे यह तो प्रलय है।.....नीतीश कुमार!....हजारों लोग बाढ़ से निकलकर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे हैं। आप भी उस जानलेवा बाढ़ से निकलिए, जिसमें गरदन तक डूब चुके हैं। आपके इर्द-गिर्द सांप, बिच्छुओं का और लाशों का ढेर लग गया है।'
'अनकही कहानी' को पढ़ते हुए आप सिर्फ बाढ़ की विभीषिका पर टिप्पणियां ही नहीं पढ़ते हैं, बल्कि उस संत्रास और दर्द से गुजरते हैं, जिसकी कल्पना मात्र से आप अपनी सुध-बुध खो बैठें। महाकवि धूमिल ने कहा था- 'शब्द मित्रों पर कारगर होते हैं।' इसलिए अगर आप में एक इनसान का दिल धड़कता है और आपका जमीर जिंदा है और शिराओं में खून अभी बाकी है तो इस अनकही कहानी को सुनते हुए आप के अंदर उबाल आ सकता है- सत्ता के प्रति, धर्म के प्रति, सरकारी मशीनरी के प्रति और सबसे ज्यादा अपने बहैसियत एक इनसान होने पर हिंदुस्तान में जन्म लेने के प्रति। हर संवेदनशील व्यक्ति को अनकही कहानी अवश्य पढ़नी चाहिए। बाबा नागार्जुन के शब्दों में- अन्न पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़-करोड़/ सचमुच ही लग जाएगी आंख कान में होड़।
THIS BOOK REVIEW IS PUBLISHED BY "PRATHAM PRAVAKTA"
साभार - Fropper.com
08 January, 2009
तीन साल, तेरह सवाल
बिहार सरकार के तीन साल पूरा करने पर जारी हुई यह पुस्तिका तब से लेकर आज तक बिहार के राजनीतिक हलकों में चर्चा में है। महज 22 पन्नों की इस पुस्तिका पर जारी करने वाली संस्था का नाम की जगह 'जनमत, महेंद्रु, पटना' छपा है। नीतीश सरकार के तानाशाहिक चरित्र का पता इस तथ्य से भी लगता है कि बिहार पुलिस की स्पेशल ब्रांच इस संस्था का पता लगाने के लिए दर्जनों प्रेसों पर दबिश बना चुकी है।
यहां इस पुस्तिका की सभी सामग्री दे गयी है। 'लेबल' में 'तीन साल, तेरह सवाल' क्लिक कर आप पूरी पुस्तिका एक साथ देख सकते हैं।
प्रतिक्रांति के तीन साल
चारों ओर से वाह, वाह का शोर है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वाहवाही के समंदर में उब-डूब कर रहे हैं. कोई विकास पुरुष कह रहा है, कोई सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री तो कोई भावी प्रधानमंत्री. इन प्रशंसकों ने उनके आसपास भव्य और गुरुगंभीर महौल सृजित करने की भी भरपूर कोशिश की है. कोसी की बाढ़ ने रंग में भंग जरूर डाला है लेकिन राग मल्हार अब भी जारी है.
कौन हैं ये प्रशंसक? क्या ये समाजवाद के समर्थक हैं? सामाजिक न्याय के हिमायती हैं? अगर नहीं, तो ये समाजवादी नेता नीतीश कुमार की प्रशंसा में कसीदे क्यों काढ़ रहे हैं? जाहिर है, नीतीश के आसपास आरक्षण विरोधियों का जमावड़ा अनायास तो नहीं ही है.
इसे समझने के लिए राजग के वोट समीकरण व नीतीशकुमार की मानसिक बुनावट को समझना होगा. राजग 'नया बिहार-नीतीश कुमार' के नारे के साथ सत्ता में आया है. अगर नीतीश कुमार का नाम न होता तो राजग को अति पिछड़ी जातियों, पसमांदा मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलता. मार्च, २००५ में हुए विधान सभा चुनाव में भी माना जा रहा था कि राजग सत्ता में आया तो नीतीश मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन गठबंधन के स्तर पर इसकी साफ तौर पर घोषणा नहीं की गयी थी. उस चुनाव में अपेक्षा से कम वोट मिलने के बाद राजग (भाजपा) को महसूस हुआ कि किसी पिछड़े नेता के नाम के बिना उसकी नैया पार नहीं हो सकती. इसलिए राष्ट्रपित शासन के बाद फिर चुनाव हुआ तो भाजपा ने नीतीश को बतौर मुख्यमंत्री घोषित करते हुए- 'नया बिहार-नीतीश कुमार' का स्लोगन बनाया. इस स्लोगन के अपेक्षित परिणाम आये. नीतीश कुमार को फेन्स पर खड़े पिछड़े तबके ने दिल खोलकर वोट दिया. दरअसल, वे लालू को किसी अपर कास्ट नेता से पदच्यूत कराना नहीं चाहते थे. इस तरह नीतीश कुमार ने बाजी जीती. लेकिन नीतीश कुमार को हमेशा यही विश्वास रहा कि उनकी जीत उंची जातियों के सहयोग के कारण हुई है. पिछड़ी जातियों के सहयोग को उन्होंने नजरअंदाज किया.
दरअसल नीतीश को दो तरह के वोट मिले थे. एक तो सामंतों का वोट था दूसरा पिछड़ों का. सामंतों का वोट बहुप्रचारित 'पिछड़ा राज' हटाने के लिए था. पिछड़ों का वोट विकास के लिए था.लेकिन सत्ता में आने के साथ ही सामंती ताकतों ने उन्हें अपने घेरे में लेना शुरू कर दिया. सत्ता के शुरूआती दिनों में नीतीश ने इसका प्रतिरोध किया लेकिन पांच-छह महीने में ही वह इन्हीं ताकतों की गोद में जा बैठे. उनके इस आत्मसमर्पण के साथ ही बिहार में के प्रतिक्रांति दौर की शुरूआत हो गयी. लंबे संघर्ष से बिहार के पिछड़े तबकों को जो आत्मसम्मान हासिल हुआ था, उसे अचानक ध्वस्त किया जाने लगा. पंचायत से लेकर विधानमंडल तक के जनप्रतिनिधियों पर द्विज नौकरशाही का शिकंजा कस दिया गया. रणवीर सेना जैसे संगठन का तो जैसे राज्य-सत्ता में विलय ही हो गया. दूसरी ओर माओवाद को खत्म करने के नाम बड़े पैमाने पर पिछड़े तबके के युवकों को मरवाया गया तथा नक्सल संगठनों के लगभग सभी नेताओं को चौतरफा घेराबंदी कर जेलों में ठूंस दिया गया है. इन संगठनों से वैचारिक असहमति रखने के बावजूद, शायद ही कोई इससे असहमत होगा कि दूर-दराज के गांवों में शक्ति-संतुलन कायम रखने में इन्होंने बड़ी भूमिका निभायी है. इनकी गैरमौजूदगी ने कई ईलाकों में सामंती ताकतों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. रही-सही कसर द्विज नौकरशाही पूरी कर रही है. गांव-गांव में 'बाभन राज' वापस आ जाने की घोषणाएं की जा रही हैं. पिछड़े-दलित तबकों के सामने अपमान और विश्वासघात के इन घूंटों को पीने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.
शुरू के पांच-छह महीने में नीतीश सरकार ने अपनी चुनावी घोषणा पर अमल करते हुए सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने वाले अनेक फैसले किये थे. इनमें अत्यंत पिछड़ों के लिए पंचायत चुनाव में २० फीसदी तथा महिलाओं के लिए ५० फीसदी आरक्षण सबसे महत्वपूर्ण था. महिलाओं के लिए ५० फीसदी आरक्षण का फैसला बाद में हुई शिक्षक नियुक्ति में भी बरकरार रखा गया. यह ऐसे फैसले थे जो बिहारी समाज को आतंरिक रूप से बदलने की क्षमता रखते थे. शुरूआती महीनों में सत्ता में पिछड़ी जातियों के नेताओं की सशक्त हिस्सेदारी के भी संकेत दिखते रहे. लेकिन जल्दी ही सब कुछ बदलने लगा. पंचायत चुनाव में मिला आरक्षण अत्यंत पिछड़ों के लिए 'काल' बन गया. इस आरक्षण के कारण जो द्विज तथा गैर द्विज दबंग जातियां पंचायत चुनाव न लड़ सकीं थीं उन्होंने नौकरशाही के साथ गठबंधन कर, चुनाव जीत कर आए पंचायत प्रतिनिधियों को घेरना शुरू किया. अतिपिछड़ी जातियों के सैकड़ों मुखिया व अन्य पंचायत प्रतिनिधियों पर विभिन्न आरोपों में मुकदमे दर्ज किये गये. इनमें कइयों को गैर जमानतीय धाराओं में जेलों में डाला गया.
इन सबके साथ-साथ जनता दल (यू) के शीर्ष पर भी यह परिवर्तन साफ दिखने लगा. सामंत-द्विज तबके के लोग पार्टी तथा राज्य सरकार में हावी होने लगे. चुनाव के दरम्यान विजेंद्र प्रसाद यादव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. उपेंद्र कुशवाहा की बड़ी हैसियत थी. विजेंद्र-उपेंद्र की जोड़ी का जिक्र खुद नीतीश कुमार शान से करते थे. प्रेमकुमार मणि जैसे चिंतक-लेखक तब नीतीश कुमार के खासम-खास थे, जिनसे हर बात में सलाह ली जाती थी. लेकिन राज पाट आते ही प्राथमिकताएं बदल गयीं. पिछड़े वर्गों से आने वाले नेता धकिया दिये गये. 'विजेंद्र-उपेंद्र की जोड़ी की जगह 'ललन-प्रभुनाथ' की जोड़ी हावी हो गयी. प्रेमकुमार मणि की जगह शिवानंद तिवारी लाये गये. नीतीश कुमार ने प्रयास करके पिछड़ा राज वाली छवि को खत्म किया. सामंती ताकतों को विश्वास में लेने के लिए शीर्षासन करने से भी नहीं चूके. जिन श्ाक्तियों ने बिहार में सामाजिक न्याय का आंदोलन पुख्ता किया था, उन सबको नीतीश कुमार ने एक-एक कर अपमानित किया. कोशशि की गयी कि अतिपिछड़ों और मुसलमानों को रणवीर सेना-भूमि सेना का पिछलग्गू बनाया जाए. अतिपिछड़ों की राजनीतिक शक्ति को सामाजिक परिवर्तन के बजाए द्विजवाद के विस्तार में लगाया गया. भागलपुर में एक अशराफ मुसलमान और विमगंज में एक अशराफ महिला को इसी ताकत पर लोकसभा भेजा गया.
सत्ता में आने के बाद जदयू में पार्टी स्तर पर नीतीश कुमार की तानाशाही भी बढ़ती गयी है. जार्ज फर्नांडिस को हाशिये पर धकेलने के बाद अब उनके निशाने पर शरद यादव हैं. शरद को किनारे करने के लिए भी 'उपेक्षा' की वही तकनीक लागू की जा रही है जो जार्ज के लिए की गयी थी. कुल मिलाकर यह कि पिछले तीन सालों में बिहार की सत्ताधारी पार्टी रणवीर सेना-भूमिसेना के साझा संगठन में तब्दील होती गयी है. इसे सत्ता में लाने वाली जातियों को हाशिये पर धकेल दिया गया है.
नीतीश कुमार की जकड़बंदी करने वाली सामंती ताकतें यही चाहती थीं. प्रशंसा की जो दुदुभियां बजायी जा रही हैं, उनका राज भी यही है. इस 'रास्ते' पर आगे बढ़ रहे नीतीश को उमा भारती और कल्याण सिंह जैसे पिछड़े नेताओं का हश्र जरूर याद रखना चाहिए.
07 January, 2009
मीडिया में महामारी
- दिवाकर
अगर आप अमेरिकी मीडिया के इजरायल-प्रेम को समझना चाहते हैं तो मीडिया के शीर्ष पदों पर बैठे यहूदियों की बहुतायत को नजरअंदाज नहीं कर सकते. -योगेंद्र यादव
यह बात बिहार के संदर्भ में भी लागू होती है. अगर आपको बिहारी मीडिया के राग-द्वेष को समझना है, तो यह भी जानना होगा कि स्थानीय समाचार पत्रों, टीवी चैनलों के शीर्ष पदों पर कौन लोग हैं.योगेंद्र यादव ने मीडिया के चरित्र को समझने के लिए वर्ष २००६ में दिल्ली के प्रमुख हिंदी व अंग्रेजी मीडिया हाउसों में शीर्ष पदों पर काम करने वाले लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि का सर्वेक्षण किया था. सर्वेक्षण में यह तथ्य आया था कि दिल्ली के मीडिया हाउसों में ९० प्रतिशत शीर्ष पदों पर हिंदुओं का कब्जा है. इसमें से ४९ प्रतिशत (भूमिहार व त्यागी के साथ) ब्राहमण हैं. कायस्थ १४ प्रतिशत. राजपूत ७ प्रतिशत. वैश्य ७ प्रतिशत. गैर द्विज उच्च जाति २ प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ी जाति के लोग ४ प्रतिशत हैं. सर्वेक्षण में इन नतीजों के आने के बाद काफी हंगामा मचा था. सारा देश इस बात से चकित था कि राष्ट्रीय मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर दलित और आदिवासी एक भी नहीं है और लगभग ४५-६० फीसदी आबादी वाले अन्य पिछड़ा वर्ग का हिस्सेदारी महज चार प्रतिशत है. इस सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आयी थी कि देश की आबादी में १३.५ फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले मुसलमानों की संख्या मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर महज तीन प्रतिशत है.
अगर ऐसा ही एक सर्वेक्षण बिहार में किया जाए तो? बिहार से इस समय मुख्य रूप से ६ हिंदी दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं. इनमें से पांच के संपादक ब्राह्मण हैं. इन छह समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख के पदों पर काबिज लोगों में ४ ब्राह्मण १ भुमिहार व एक राजपूत हैं. यही हाल टीवी चैनलों का भी है. बिहार में हिंदी, अंग्रेजी समाचार पत्रों, टीवी चैनलों में शीर्ष पदों पर १०० फीसदी हिंदुओं का कब्जा है. इनमें ९९ प्रतिशत द्विज हैं. पिछड़ी जाति का कोई भी पत्रकार फैसला लेने वाले पद पर नहीं है. इन पदों पर दलित, मुसलमान व महिलाओं की उपस्थिति शून्य है. अब सवाल यह उठता है कि बिहार की इस द्विज पत्रकारिता ने किसका हित साधा है? किसने इसका उपयोग किया है? इसके अपने राग-द्वेष क्या हैं? लालू प्रसाद के १५ साल व नीतीश कुमार के तीन साल के दौरान मीडिया के रूख के तुलनात्मक अध्ययन से इन सवालों के जबाव मिलते हैं. पिछले तीन सालों से अखबार के पन्नों पर विकास की धारा बह रही है. छोटी से छोटी खबर में यह देखा जाता है कि कहीं यह नीतीश कुमार के खिलाफ तो नहीं जा रही है. लालू प्रसाद के शासनकाल में सिर्फ सुशील कुमार मोदी के बयानों को आधार बनाकर सप्ताह में चार विशेष खबर (स्टोरी) छापने वाले अखबारों को अब ध्यान से देखें. आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि पिछले तीन सालों में इन समाचार पत्रों में एक भी ऐसी खबर नहीं छपी है, जिससे नीतीश कुमार को राजनैतिक रूप से नुकसान पहुंचने की आशंका हो. विपक्षी दलों के नेताओं के बयान तक सेंसर किये जा रहे हैं. वास्तव में राजद शासनकाल के अंतिम दिनों में जिस मिशनरी सक्रियता से खबरें 'गढ़ी' जा रही थीं, उससे कहीं अधिक तत्परता से नीतीश कुमार के इन तीन सालों में खबरें 'दबायी' जा रही हैं.
कोसी में १८ अगस्त, २००८ को प्रलयंकारी बाढ़ आयी. हजारों लोग मारे गये. लोगों ने इसे बिहार में विगत एक सदी में आयी सबसे बड़ी आपदा कहा. मुख्यमंत्री तक ने इसे प्रलय कहा. यह भी साफ था कि कोसी तटबंध राज्य सरकार की लापरवाही के कारण टूटा था. लेकिन मीडिया ने चुप्पी साधे रखी. बिहार के अखबारों में इस पर एक भी खोजपरक रिपोर्ट नहीं छपी. इतना ही नहीं, बाढ़ की त्रासदी को कम से कम करके दिखाया गया. सरकारी दावे पहले पन्ने की खबर बनते रहे.
खबरों के न छपने के कारण दोतरफा हैं. एक ओर द्विज मीडिया का अपना 'लालू फोबिया' तथा जातिगत हित है तो दूसरी ओर नीतीश कुमार की प्रच्छन्न तानाशाही. नीतीश कुमार व उनके सलाहकारों ने सुनियोजित तरीके से पत्रकारों को पालतू और भ्रष्ट बनाया है. खोजपरक रिपोर्ट की तो बात ही छोड़िए, अखबार को भेजे गये विपक्षी दलों के बयान तक छपने से पहले मुख्यमंत्री के टेबल पर पहुंच जा रहे हैं. सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल तुरुप के पत्तों की तरह किया जा रहा है. नतीजा यह है कि बिहार से समाचार पत्र राज्य सरकार की योजनाओं, घोषणाओं की सूचना देने वाले बुलेटिन की भूमिका में पहुंच गये हैं.
04 January, 2009
इसका ताज, उसका राज
- निरंजन
जरा याद कीजिये. वर्ष २००५ का बिहार विधान सभा चुनाव. एक ओर लालू प्रसाद थे, तो दूसरी ओर नीतीश कुमार. जनता कोई विकल्प ढूंढ रही थी. एक बेहतर विकल्प के रूप में नीतीश कुमार जनता के खांचे में फिट बैठ रहे थे. लोक-लुभावन वादे किये जा रहे थे. प्रदेश की जर्जर सड़क, खराब बिजली व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक करने का आश्वासन तो था ही, साथ ही यह भी कहा जा रहा था की नीतीश कुमार की सरकार बनी तो तीन माह में कानून का राज स्थापित होगा. वह बिहार की जनता को 'जंगल राज' से मुक्ति दिलायेंगे. यह वह दौर था, जब समाचार पत्रों में रोजाना अपहरण, हत्या, लूट की खबरें देखने को मिल रहीं थी. शहरों का मध्यवर्ग इससे उब चुका था. ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार का यह कहना कि मेरी सरकार बनी तो तीन माह में कानून का राज स्थापित होगा. जात-पात से उपर उठकर बिहार का विकास होगा. मध्यवर्ग के लिए डूबते को तिनका के सहारे के समान था. चुनाव हुआ और जनता ने जोरदार समर्थन देकर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान किया. बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार बनी. पिछले तीन सालों में अन्य वादों की ही तरह इस सरकार का 'कानून का राज' स्थापित करने का वादा भी धराशायी हो गया है. इन सालों में छोटे अपराधों पर तो कुछ सख्ती बरती गयी है लेकिन बड़े अपराधियों को खुली छूट मिली है. बड़े आपराधिक धंधों को जहां बड़ी सफाई से संस्थागत रूप दे दिया गया है वहीं गरीबों पर पुलिसिया जुल्म में काफी बढ़ोत्तरी हुई है.आइये अब जानें कि कानून का राज स्थापित करने वाली सुशासन सरकार का पुलिसिया ढांचा क्या है. नीतीश सरकार गठन के पहले से पुलिस महानिदेशक के पद पर कुरमी जाति से आने वाले आशीष रंजन सिन्हा काबिज थे. नीतीश सरकार ने उन्हें तो पद पर बरकरार रखा लेकिन सरकार बनने के एक माह बाद ही दिसंबर, २००५ में भूमिहार जाति से आने वाले अभ्यानंद को अपर पुलिस महानिदेशक के पद पर बिठा कर पूरा पुलिस महकमा उनके हाथों में सौंप दिया. अभ्यानंद की छवि पैसा के मामले में ईमानदार लेकिन जाति के मामले में बेईमान अधिकारी की रही है. एडीजी रहते हुए भी उनपर जात-पात करने के आरोप लगे.यहीं से शुरू हुआ 'कुर्मी को ताज, भूमिहार का राज' तथा 'नीतीश कुमार-नया बिहार, थोड़ा कुरमी-ज्यादा भुमिहार' का जुमला. जब तक आशीष रंजन सिन्हा और अभ्यानंद अपने पदों पर रहे, उनके बीच छत्तीस का आंकड़ा बना रहा है. दोनों अधिकारी अपना-अपना 'राज' समझ कर एक-दूसरे के आदेश को ठेंगा दिखाते रहे। डीजी अपने आदमियों को मलाईदार पोस्टिंग दिलाने में दिलचस्पी दिखाते, तो अभ्यानंद अपने पसंदीदा पदाधिकारी को रूतबे वाली कुर्सी पर विराजमान करने की फिराक में रहते। लिहाजा पुलिस मुख्यालय में गुटबाजी चरम सीमा पर रही। आशीष रंजन सिन्हा की सेवानिवृनि का समय आया तो इन दो अधिकारियों के माध्यम से कुर्मी-भूमिहार के बीच सना संतुलन बना रहे मुख्यमंत्री ने अभ्यानंद को भी चलता कर दिया. ८ अप्रैल, २००८ को अभ्यानंद को भी आशीष रंजन सिन्हा के साथ ही बीएमपी का डीजी बनाकर पुलिस मुख्यालय से विदा कर दिया गया.जब तक ये दोनों अधिकारी मुख्यालय पर काबिज रहे पुलिस महकमे के अन्य अधिकारियों के लिए पुलिस हेडक्वार्टर के लिए 'हेडक क्वार्टर' बना रहा.
दरोगा बहाली
सरकार बनने के साथ ही पुरानी दारोगा बहाली को रदद करते हुए नयी दारोगा बहाली की घोषणा हुई थी तथा बहाली को पूरी तरह निष्पक्ष कराने का सपना अभ्यार्थियों को दिखाया गया था. बिहार में वर्ष १९९४ के बाद से दारोगा की बहाली नहीं हुई है. बेरोजगारी से जूझ रहे छात्रों को सुशासन में भरोसा तो हुआ, लेकिन बहाली प्रक्रिया 'बीरबल की खिचड़ी' साबित हुई है.
अमीर दास आयोग
अपराध समाप्त करने का दावा करने वाले सुशासन बाबू ने सरकार बनते ही अमीर दास आयोग को भंग कर दिया। यह आयोग रणवीर सेना के राजनीतिक संबंधों की जांच कर रहा था. आयोग की रिपोर्ट से राज्य सरकार में काबिज किन-किन दिग्गजों पर गाज गिरने वाली थी, यह अब किसी से छुपा नहीं है.
स्पीडी ट्रायल 'कट्टा पकड़ने पर स्पीडी ट्रायल, एके-४७ से मुख्यालय घायल'. स्पीडी ट्रायल का जिक्र आते ही एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी यह जुमला सुना डालते हैं. वास्तव में 'स्पीडी ट्रायल' पूरी तरह हास्यास्पद साबित हुआ है. इसकी शुरूआत कथित तौर पर सभी दलों के बड़े अपराधियों पर लगाम कसने के लिए की गयी थी. लेकिन हुआ उल्टा है. इस बड़े जाल में छोटी मछलियां तो फंस जा रही हैं लेकिन मगरमच्छ जाल फाड़ कर निकलवा दिया जा रहा है. इसके प्रमाण हैं अनंत सिंह और प्रभुनाथ सिंह जैसे लोग. महाराजगंज से जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह वर्ष ९५ में मशरख में हुए दोहरा हत्याकांड के अभियुक्त थे, लेकिन सरकारी गवाह हाजिर नहीं हुए और पिछले दिनों वे आराम से बरी हो गये.
जिस-जिस ने मांगा हक, सबको मिली लाठी
पिछले तीन सालों में पटना के लोगों के 'अमन-चैन' के नाम पर प्रजातांत्रिक विरोधों को लगभग प्रतिबंधित कर दिया है. जयप्रकाश नारायण द्वारा छात्र आंदोलन के दौरान बैरिकेटिंग तोड़ने की घटना का फक्र से जिक्र करने वाले-सत्ता में बैठे उनके चेलों को इतना भी बर्दाश्त नहीं है कि आंदोलनकारियों का कोई जत्था विधान सभा की ओर जाने वाले रास्ते में आर ब्लॉक चौराहे पर बने बैरिकेटिंग को छुए भी. नीतीश सरकार ने अपने शासन की शुरूआत से ही यह साफ कर दिया था. किसी को भी सरकार के विरोध में आवाज उठाने की इजाजत नहीं दी जाएगी. आम लोगों का संगठन हो अथवा शिक्षकों, डॉक्टरों, छात्रों, कर्मचारियों का-जिसने भी प्रभावशाली विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से अपनी बात रखनी चाहिए, उसे पुलिस का बर्बर लाठी चार्ज झेलना पड़ा. सबसे अधिक मार उन संगठनों के लोगों को खानी पड़ी जिसके लोगों ने बड़ी संख्या में पटना पहुंच राज्य सरकार को अपनी बात सुनानी चाही. महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया. शिक्षा मित्र, वाम छात्र संगठनों, आशा कार्यकर्ताओं, दारोगा भर्ती के उम्मीदवारों, पीएमसीएच के जूनियर डॉक्टरों, वित्त रहित शिक्षकों समेत लगभग डेढ़ दर्जन संगठनों को विरोध प्रदर्शनों के दौरान बर्बर लाठी चार्ज झेलना पड़ा है. वास्तव में स्थिति यह हो गयी है कि लाठी चार्ज के भय से कोई भी संगठन अब पटना में प्रदर्शन करने से पहले दस बार सोचता है. अतिक्रमण हटाने के नाम पर राजधानी के गरीबों पर तो लगभग हर दो-तीन महीने पर लाठियां बरसायी ही जा रही हैं. पटना के अलावा अन्य जिलों के प्रशासन को भी विरोध प्रदर्शनोंसे सख्ती से निपटने के आदेश दिये गये हैं. कहलगांव में तो बिजली की मांग पर विरोध कर रहे स्थानीय लोगों पर सिर्फ लाठियां ही नहीं भांजी गयीं, गोली तक चलायी गयी।