03 February, 2008

उदय प्रकाश, मोहल्‍ला और मंगलेशजी की टिप्‍प्‍णी .

( इसे 'टूटी हुई बिखरी हुई' पर छपे ए‍क पोस्‍ट पर टिप्‍प्‍णी के रूप में लिखा गया है, यहां किंचित परिमार्जन के साथ)


अपने प्रिय कवियों में से एक, मंगलेशजी की बातों से मेरी लगभग पूरी सहमति है लेकिन यह भी एक सच्‍चाई है कि वह ब्लॉग की मूल प्रकृति को समझ पाने में असफल रहे हैं. दूसरी बात जो मुझे उनकी नवभारत टाइम् वाली टिप्‍पणी पढते हुई महसूस हुई कि उन्‍होंने अपनी राय मुख्‍यत: मोहल्ला तथा एक दो और ब्‍लॉगों को ही ध्‍यान में रखते हुए बनाई है. (..हालांकि कुछ अन्‍य अच्‍छे ब्‍लॉग भी हैं जिनपर कतिपय बेहतर सामग्री होती है. मसलन, कस्‍बा, हाशिया या आपका ब्लाग‍ ..हाशिया पर तो रेयाज ने शायद एमानुल ओर्तीज की कविता दी भी थी, जिसके न ब्‍लॉग पर न मिलने पर मंगलेशजी को खेद हुआ.) बहरहाल, मंगलेशजी की टिप्‍पणी एक बार फिर देखें - http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2734203.cms


इस टिप्‍पणी में वह कहते हैं ''उनमे (ब्‍लॉगों में)ज्‍यादातर गपशप का माहौल है या गंभीरता के नाम पर छोटी छोटी पॉलिमिक्‍स बहसें हैं, जिनमें भडास या कुंठाएं निकाली जाती हैं या कोई सनसनीदार साहित्यिक चीज पेश की जाती है ''. ( यद्यपि मोहल्ला ‍पर दो तीन अच्‍छी , गंभीर कही जाने लायक चीजें भी आईं हैं. और अब कम्‍युनिटी ब्‍लॉग बनने के बाद कुछ विवेकवान लोग उससे जुड रहे हैं . सो हिंदी के इस सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग के सार्थक भी हो सकने की उम्‍मीद तो की ही जा सकती है. लेकिन अब तक कुल मिलाकर जो इस ब्लॉग की स्थिति ‍रही है, उसके आधार पर मंगलेश जी की बातों से सहमति बनती है.


किंतु इसके अलावा मंगलेशजी कहते हैं कि '' कुछ लेखकों के ब्लॉग शायद अनजाने में ही आत्म विज्ञापन का साधन बने हुए दिखते हैं, जिनमें उनकी रचनाओं के साथ उनकी आगामी पुस्तकों के चित्र भी चिपके होते है '' . ऐसा लगता है उन्‍होंने शब्‍दों में यह बात हिंदी एक समर्थ कवि-(जो सिर्फ अभिव्यक्ति के नए माध्यम के रूप में ब्लॅग का क्षमता पहचाने वाला पहला वरिष् साहित्यक है बल्कि जिसकी उपस्थित ने ब्लॉग जगत को गरिमा प्रदान की है और कई पढने-लिखने वालों को इस ओर आने के लिए प्रेरित किया है)-के ब्‍लाग के संदर्भ में कही है . और यहीं मंगलेशजी चूक कर गए हैं ... और एक ऐसी चूक है जिस पर 'गंभीरता' से ध्‍यान दिया जाना चाहिए. चुंकि यह एक बडे कवि की चूक है इसलिए यह कुछ ' बडे दिग्‍भ्रम' भी पैदा कर सकती है. इसी चूक के कारण मंगलेश जी अपनी टिप्‍पणी में ब्लॉग की वास्तविक निजता , उसकी मूल प्रकृति के ही विरोध में जा खडे हुए हैं. वह मूल प्रकृति है उसका ' वयक्तिगत' होना. ब्‍लॉग का बेहद खूबसूरत हिंदी अनुवाद है 'चिट्ठा'----कच्‍चा पक्‍का जैसा भी ! जिस वैक‍ल्पिक कथ्‍य की अपेक्षा वह रख रहे हैं, उसे टलॉगों संदर्भ में 'कच्‍चा चिट्ठा' कहा जाना बहुत गलत न होगा .


अमेरिका के ब्‍लॉगों 'सांस्‍कृतिक शक्ति' बन जाने के संदर्भ में मुझे तथ्‍यों का ठीक-ठीक पता नहीं है, लेकिन एक बात याद दिला देना समीचीन होगा कि दुनिया के अनेक महत्‍वपूर्ण समकालीन लेखकों, कवियों, दार्शनिकों, फिल्‍मकारो, इतिहासकारों, समाजशास्‍त्रीयों की अपनी वेब्‍साइटें (व‍ह भी शायद पेड,सशुल्‍क) हैं , जिनपर उनकी प्रकाश्‍य पुस्‍तकों समेत अन्‍य संबंधित जानकारिकयां रहती हैं.


इसे लिखते हुए यह भी ध्‍यान में आ रहा है कि कई लेखक अचानक इधर 2-3 सालों से खूब अमेरिका-अमेरिका करने लगे हैं, जैसे पहले रूस-रूस कहते थे. क्‍या साम्‍यवाद का स्‍वप्‍न भी मर गया? या वह सीधा-सीधा हित-लाभ का मामला था? जब रूस से पुरस्‍कार, विदेश यात्राओं का सुख और कुछ दूसरे लाभ मिलत थे वह; और अब विश्‍व बैंक द्वारा फंडेड एनजीओ से मिलने लगा है तो - अमेरिका! या सचमुच इन दिनों अमेरिका में महान साहित्‍य लिखा जाने लगा है? मैं इसकी संभावना को सिरे से नकार नहीं रहा हूं ; हालांकि स्‍वयं मंगलेशजी ने 'एक बार अयोबा'(1996) में लिखा है - '' इतना बडा देश है यह (अमेरिका) . पाब्‍लो नेरूदा के शब्‍दों में 'भैंस के चमडे की तरह फैला हुआ'. पर यहां एक भी महान कवि, महान कलाकार, महान संगीतकार क्‍यों नहीं है? अमेरिका शायद बडी रचनात्‍मक प्रतिभा पैदा नहीं कर सकता. साहित्‍य में ज्‍यादतर लोग अपने से ही 'ऑब्‍सेस्‍ड' हैं या फिर सेक्‍स दूसरा 'ऑब्‍सेशन' है ''.


खैर ... यह सदि्च्‍छा तो अच्‍छी है कि '' ब्लॉगों को मुख्य मीडिया से ज्यादा जिम्मेदार होना होगा ताकि वे 'ब्लॉग-ब्लॉग' खेलने तक सीमित रह जाएं '' लेकिन क्‍या ऐसी ही अपेक्षा हमने लघु पत्रिकाओं से भी न की थी कि वे बडी पत्रिकाओं, बडे पूंजी वाले प्रिंट मीडिया के बरक्‍स वैकल्पिक विचार दें ? लेकिन क्‍या यह सच नहीं है कि हिंदी में जो सैकेडों लघुपत्रिकाएं छपतीं हैं, उनमें से 98/99 प्रतिशत 'पत्रिका- पत्रिका' ही खेलती रही हैं. हमने उनमें से सार्थक काम करने वाली पत्रिकाओं को चुना है. यही काम ब्‍लॉगों के संदर्भ में भी करना होगा.

हिंदी चिट्ठों जो अगंभीरता अभी दिख रही है उसका एक कारण तो यह है ( जैसा कि मंगलेशजी ने भी उचित ही स्‍वीकार किया है ) कि अभी बहुत कम लोग इस दिशा में सक्रिय हैं. संख्‍या बढने पर स्‍वभावत: इनमें विविधता भी बढेगी . इसके अलावा क्‍या यह विचारणीय नही है कि स्‍वयं 'हिंदी' की वैचारिकता का ही क्‍या हाल रहा है?

क्‍या यह सच नहीं है कि स्‍वयं हिंदी का लेखन अपनी तमाम '' नेकनीयती के बावजूद अभी तक अराजनैतिक, व्यक्तिगत, रूमानी, भावुक और अगंभीर है''. ( बल्कि मंगलेशजी के इस वाक्‍य में मैं 'वर्णवादी' और ' पुनरूत्थानवादी' भी जोडना चाहूंगा. )

जाहिर है चिंताएं और भी हैं तथा इन दिनों और गंभीर होती जा रही हैं. 'हंस' जैसी प्रखर पत्रिका में तेज गिरावट देखी जा रही है ; गंभीर कही जाने 'पहल' में 'हल्‍कापन' आया है. तो दूसरी ओर किंचित चटपटे 'नया ज्ञानोदय' को पसंद करने वालों की संख्‍या बढी है. ऐसे में ब्‍लॉगों से ही कुछ बहुत खास कर गुजरने की उम्‍मीद तो नहीं ही की जा सकती . हां, इतना जरूर है कहूंगा कि यह मूलत: अस्‍थापितों का अख्‍यान है. इसकी निजता इसका 'व्‍यक्तिगत' होना है.

26 January, 2008

सरोज वशिष्‍ठ













सरोज वशिष्‍ठ द्वारा तिहाड़ जेल में किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए किरण बेदी ने अपनी पुस्तक 'इट्स ऑलवेज पॉसिबिल` में लिखा है कि '१९९३ में उनकी उम्र ६० वर्ष थी किंतु देखने में काफी कम उम्र की लगती थीं। जीवन के प्रति उनका उत्साह अद्वितीय था।` ७२ बसंत देखने के बाद भी आज की सरोज के उत्साह में कोई कमी नहीं है। वे वृद्धावस्था को जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा मानती हैं। उनके अनुसार यही तो मजे लूटने का वक्त है। अगर आप रोगी नहीं तो इस उमर में जीवन की आपाधापी में घुटते रहे सपनों को साकार कर सकते हैं।

उनकी ऊर्जा को देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। कहती हैं, दिन २४ की बजाए ४८ घंटे का होना चाहिए, ताकि वे ढेर सारा किया जा सके। उन्होंने अपने चारों ओर मदमस्ती का ऐसा घेरा बना रखा है जिसके निकट फटकने की हिमाकत उदासी नहीं कर सकती। हर पल उल्लास छलकाते रहने का उन्हें कई बार खामियाजा भी भुगतना पड़ा है। एक बार तो शिमला रेडियो स्टेशन में कार्यक्रम पेश करने के दौरान उन पर ड्रग एडिक्ट होने का भी शक किया गया।

सरोज के अभिभावक लाहौर में रहते थे। शिमला में उनका काफी लंबा-चौड़ा कारोबार था। वे छुटि्टयों में शिमला आया करती थीं। १३-१४ वर्ष की रही होंगी जब माल रोड पर सतीशचंद्र वशिष्‍ठ ने उन्हें देखकर जगमोहन का गीत गाया था-'मुझको है तुमसे प्यार क्‍यों ..।` फिर शुरू हुआ था शायराना खतों के लेन-देन का सिलसिला। खत सरोज की मां के हाथ पड़े और खूब पिटाई हुई, लेकिन पिता ने साथ दिया। आज वही सतीश चंद्र वशिष्‍ठ सरोज के पति हैं, जिनके मुंह पर कभी उन्होंने फूलों का गजरा दे मारा था।

सतीश वैज्ञानिक हैं। साहित्यिक लेखन में रूचि रखने वाली सरोज वशिष्‍ठ उनके विज्ञान संबंधी सेमिनारों में भी उतनी ही उत्सुकता से जाती हैं जितनी खुशी से वे लेखकों की गोष्‍ठी में शरीक होती हैं। यह पूछने पर कि 'आपने तो १३ वर्ष की उम्र में ही प्रेम की पींगे बढ़ा दी थी, क्या आज इस उम्र की लड़की को इसकी इजाजत देना चाहेंगी?` बिंदास सरोज कहती हैं, 'प्रेम में संस्कार महत्वपूर्ण हैं न कि उम्र। यह तो आग का दरिया हैं जिसमें डूब कर हर उम्र के आशिक को गुजरना होता है।`

सरोज फैशनेबल भी कम नहीं है। उनका फैशन अजीब किस्म का होता है। विभिन्न रंगों की ढेर सारी मालाएं, रूद्राक्ष, विभिन्न आकार-प्रकार के पत्थर उनके गले में झूलते रहते हैं। उंगलियों में इतने किस्म की अंगूठियां कि गिनना मुश्किल।वे बताती हैं कि इन्हें धारण करने के पीछे कोई आध्यिमात्क-तांत्रिक कारण नहीं है, लेकिन इससे उन्हें बहुत 'लाभ` मिलता है। कैसा लाभ? वे कहती हैं कि कुछ मूढ़मति इसी कारण कोई पहुंची हुई संन्यासिन समझ बैठते हैं और चरण छूकर आशीर्वाद मांगते हैं। कुछ तो दान-दक्षिणा देने को भी तत्पर हो जाते हैं। दान तो वे नहीं लेतीं लेकिन आर्शीवाद देने का सुख खूब उठाती है।

वैसे देखा जाए तो विभिन्न जेलों तथा समाज के अन्य तबकों के बीच किए गए काम उन्हें वास्तविक 'संन्यासिन` का दर्जा देने के लिए पर्याप्त हैं। किरण बेदी ने भी अपनी पुस्तक 'इट्स ऑलवेज पॉसिबिल` में लिखा है कि सरोज को कैदी सम्मान भाव से 'अम्मा` कहा करते थे। राग-द्वेष से कोसों दूर इस संन्यासिन अम्मा को शिमला भी कम प्यार नहीं करता।

(९ मई, २००५, दैनिक भास्कर)