03 November, 2009

मीडिया में हिस्सेदारी के गम्भीर सवाल



















मीडिया में जातिगत हिस्सेदारी का सवाल एक विशुद्ध समाजशास्त्रीय अध्ययन है क्योंकि यह सीधे तौर पर इस राष्‍ट्र की सामाजिक चेतना, इसके लोकतन्त्र और कमजोर तबकों के सशक्तीकरण से अंर्न्तगुंफित है। शायद इसीलिए जब भी ऐसी कोशिश की जाएगी तो उसे खारिज करने वाले भी कम नहीं होंगें, विशेष  तौर पर वे लोग जिनके वर्गहितों से उनका सीधा टकराव होगा।

भारतीय समाज में वर्ग की अवधारणा आर्थिक स्थापनाओं से अलग नहीं हो पाई है। उसके पुरोधा  शायद  इस सच्चाई से साक्षात्कार करना भूल गए कि यह एकदम वैसी अवधारणा नहीं ही हो सकती थी जो युरोपीय समाज में एक समय में जन्मी और विकसित हुई थी। वे अपने वर्गसमाज में इस सच्चाई को  शामिल न करने की भूल कर बैठे कि भारतीय समाज जातिगत आधार पर इस कदर बंटा हुआ है तथा उसके बाहर जिस भी वर्ग समाज की बात की जाएगी वह महज अधूरी अवधारणाओं का द्योतक होगा। इस समाज की बुनाबट में अर्न्तनिहित वर्ग विभेद हर बच्चे के जन्म के साथ ही  शुरू हो जाता है और उसके अवचेतन में इस कदर खुंब आता है कि आजीवन यह उसकी सोच, संवेदन और अभिव्यक्तियों में केवल पदार्थीय रूप में ही नहीं, बल्कि उसके गहन अवचेतन में परिलक्षित होता चलता है। नतीजन ऊंची जातियों में पैदा हुए प्रगतिशील और खुद को हमेशा ज्यातिच्युत करने के आग्रही लोग तक अपने अवचेतन में  शायद ही अपनी जातिगत चेतना से मुक्त हो पाते हैं। इसलिए इस तर्क में दम है कि अपने  शोषण और सामाजिक पीड़ाओं की असल और सही अभिव्यक्ति वही व्यक्ति कर सकता है जिसने आजन्म वे पीड़ाएं अपने  शरीर और आत्मा पर भोगी हैं। उनसे बाहर की जातियों के सदस्य अगर अब उनके  शोषक  नहीं भी रहे मान लिए जाएं, तो भी वे केवल सहानभूति ही जता सकते हैं तथा दलित पीड़ाओं पर  शास्त्रीय विमर्श कर सकते हैं, लेकिन उनकी भोगी गई पीड़ाओं को सही अभिव्यक्ति नहीं दे सकते।

यह अकारण नहीं था कि इस देश को राजनैतिक आजादी प्राप्त होने के तत्काल बाद भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं पर आंबेडकर ने तंज किया था कि वे कुछ ब्राह्मण युवकों का टोला हैं।


भारतीय समाज में वर्ग संघर्ष  की कुल अवधारणा से जातियों के अस्तित्व का नकार एक ऐतिहासिक भूल थी जिस ओर दरअसल आंबेडकर संकेत कर रहे थे। और इस समाज की आज की स्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस भूल का निराकरण होने में बहुत वक्त लगेगा। समाज का कोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। पत्रकारिता जैसा क्षेत्र, जो लोकतन्त्र और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण खम्बा कहा जाता है, इस बीमारी से किस कदर ओतप्रोत है, प्रमोद रंजन की पुस्तिका 'मीडिया में हिस्सेदारी` उसी का समाजशास्त्रीय अध्ययन है।

तो इस समाज में जहां हर ऊंची जाति के व्यक्ति के दिमाग में जातिगत अंहकार और जातिगत हित इस कदर खुबे हों  जिनके चलते वह बाहर कुछ देख पाने की क्षमता खो चुका हो, वहां पत्रकारिता जैसे पेशे के सामाजिक अध्ययन का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। प्रमोद रंजन  के तर्कों से असहमत होना मुश्किल है। समाज में जाति का होना जितना खतरनाक है उससे भी ज्यादा खतरनाक है जातिगत मानसिकता, इस पर  शोध की मानसिक प्रक्रिया के दौरान ही वे पूर्वग्रह से भरे इस समाज में एक आवाजहीन युद्ध से जा टकराते हैं। उनके सामने एक ऐसा अंधा समाज है जो हर समाचार को वस्तुनिष्‍ठ ढंग से देख पाने की नजर से वंचित कर दिया गया है।

प्रमोद रंजन इसी अंधत्व की प्रमाणिकता के लिए बिहारी मीडिया का  शोध करते हुए इस डरावने निष्‍कर्ष  पर पंहुचते हैं कि इस मीडिया पर ७३ प्रतिशत उच्च जाति हिन्दू मर्दों का कब्जा यहां सामान्य पदों पर ही है जबकि बिहार की कुल आबादी में उच्‍च जाति हिन्दुओं का कुल प्रतिशत महज तेरह है। इसके आगे निर्णय करने की क्षमता वाले पहले पॉंच पद तकरीबन सभी अखबारों में ब्राह्मण, राजपूत और भूमिहारों से भरे पड़े हैं। सामान्य पदों पर दलित जातियों के लोग महज एक प्रतिशत, पिछड़ी जातियों  के १० प्रतिशत, अशराफ मुसलमान १२ प्रतिशत, पसमांदा मुसलमान ४ प्रतिशत और महिलाओं की भागीदारी महज ४ प्रतिशत है जिनमें भी कोई भी दलित महिला नहीं है।

जातियों के इस चक्रव्यूह का नतीजा उन्होंने २००८ में कोसी की बाढ़ के दौरान महसूस किया था जब यादव और दूसरी दलित जातियों के गढ़ में आए भंयकर प्रलय के दौरान बिहार सरकार की निष्‍ि क्रयता का नोटिस लेने और बाकी के संसार तक इस सच्चाई को पंहुचाने की बजाए पत्रकारों में सरकार की तारीफ करने की होड़ मच गई थी। बहुत हद तक वे इसे पिछड़ों की राजनीति की नासमझी का परिणाम भी मानने को विवश हैं।

 इस श्रृंखला में 'विश्वास का धंधा` नामक आलेख पत्रकारिता की उस नकारात्मक और निन्दनीय प्रवृति से जुड़ा है जिसके चलते चुनावों के दौरान प्रत्याशियों के पक्ष में खबरें उनसे पैसे लेकर बनाई और परोसी जाती रही हैं। यह जनमानस को गुमराह करने का ही धंधा नहीं है बल्कि पत्रकारिता के किसी भी मानदंड की ज्यामिती से भी निंदनीय है। प्रमोद रंजन जनता को दिगभ्रमित करने वाले इन खबरी पैकजों से भी आगे उस द्विज बर्चस्व की खबर लेते हैं जिसके चलते पत्रकारिता में इस तरह के अमानवीय विचलन देखे जाने लगे हैं। इतना ही नहीं यह मित्रधर्म और उससे भी आगे जातिधर्म से जुड़ा फंडा है इसलिए खबरों की उस पैकेज संस्कृति से भी ज्यादा खतरनाक है। प्रमोद के  शोध में एक बहुमूल्य निष्‍कर्ष  यह भी है कि भारतीय पत्रकारिता के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में सिवाय तकनीक के कोई परिवर्तन लक्षित नहीं किया जा सकता क्योंकि हमेशा ही से उसपर ब्राह्मणवाद की मानसिकता हावी रही है जो यथास्थिति की पोषक है। इससे भी आगे आज जो नया ब्राह्मणवाद पसर रहा है उसके पीछे इसी तकनीक का कमाल है। यानी चीज़ें जितना बदलती हुई दिख रही हैं उतना ही वे अपने मूल रूप में बनती चली जा रही हैं।

 शोधकर्ता ने इस दुबले पतले से दिखने वाले इस काम में बहुत सी चीजों पर से नकाब हटाए हैं, जैसे आखिर खबर है क्या, फ्री प्रैस के भुलावे से जनता कैसे अनभिज्ञ बनी रहती है, मित्रधर्म और जातिधर्म के इस निर्वाह के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी कहां और कैसे पानी भरती रह जाती है, पढ़ने के चयन पर कैसे ताले आयत होते हैं, एक ही सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्‍ठभूमि वाले लोगों के बर्चस्व ने पत्रकारिता के स्वरूप को किस कदर एकांगी बना दिया है और अनन्तिम, कि कैसे कैसे चोलियां और दामन आपस में गुत्थमगुत्था होते चलते हैं। बहुत कुछ है जो सामान्य जन को सूचित ही नहीं करता उससे अपना ज्ञान बढ़ा कर आगे बढ़ने और इस व्यवस्था को बदलकर समग्र हिस्सेदारी की व्यवस्था बनाए जाने की ललकार भी लगाता है। पर फिर सवाल वही है कि यह कैसे मुमकिन होगा और इसका जवाब तलाशने की हर कोशिश ही सही जवाब होगा। 
          
मीडिया में हिस्सेदारी : प्रमोद रंजन
प्रज्ञा सामाजिक शोध संस्थान, कुम्‍हरार, बहादुरपुर,  पटना
मूल्य: पच्चीस रूप्ए

(पुस्तिका 'मीडिया में हिस्‍सेदारी की यह समीक्षा इंडिया टुडे, हिंदी के 11 नवंबर, 2009 अंक में छपी है। पत्रिका में इसका आरंभिक हिस्‍सा संपादित हो गया है। यहां मूल रूप में)
                

02 November, 2009

मीडिया का स्टिंग आपरेशन




(यह समीक्षा 'भारतीय पक्ष' के 7 अक्‍टूबर अंक में प्रकाशित हुई है ) 
प्रमोद रंजन की पुस्तक ‘मीडिया में हिस्सेदारी’ मीडिया पर किये गये सर्वे पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि वर्तमान समय में मीडिया में चयन का आधार गुणवत्ता अथवा बौद्धिकता नहीं है। अब उम्मीदवार के चयन का आधार यह है कि ऊंची जाति से संबंध रखता है या निम्न जाति से।
पुस्तक को पढ़कर पता चलता है कि बिहार के हिंदी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के पत्रकारों में 87 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण हिंदू हैं। इनमें 34 फीसदी ब्राह्मण, 23 फीसदी राजपूत, 14 फीसदी भूमिहार तथा 16 फीसदी कायस्थ हैं। मुसलमान और दलित समाज से आने वाले पत्रकार मात्र 13 फीसदी ही है।
इसके अलावा यह भी बताया गया है कि समाचार-पत्र और न्यूज चैनल पैसे लेकर खबरें छापते या दिखाते हैं। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने कई उदाहरण भी दिये हैं।
मीडिया और राजनीति के संबंधों  का उदाहरण के साथ खुलासा करते हुए पुस्तक में बताया गया है कि किस तरह मीडिया पर राजनीतिक प्रभाव छाया हुआ है।
यह पुस्तक ही नहीं बल्कि मीडिया का स्टिंग आपरेशन है जो मीडिया जगत की कटु सच्चाइयों से पाठक को परिचित कराता है।
पुस्तक में भारत में मीडिया का आरंभ, उद्देश्य, कार्यों तथा बदलते परिवेश में उसके बदलते रूप का समीक्षात्मक बौद्धिक वर्णन मिलता है। पत्रकारिता एवं राजनीति में रूचि रखनेवाले व्यक्तियों के लिये यह पुस्तक महत्वपूर्ण है।
पुस्तक : मीडिया में हिस्सेदारी
लेखक : प्रमोद रंजन
प्रकाशक : प्रज्ञा सामाजिक शोध संस्थान, कुम्हरार, पोस्ट- बहादुरपुर, पटना
मूल्य  : 25 रुपये, पृष्ठ   : 36