20 March, 2009

फील गुड बनाम गुड न्यूज

-प्रमोद रंजन

' वो सब कुछ करने को तैयार/सभी अफसर उनके/अखबार, छापेखाने/बहाने चुप कराने के/नेता और गुंडे तक उनके '

-ब्रेख्त की कविता पंक्ति


निम्न जातियों के प्रतिरोध के लिए विख्यात रहे बिहार में इन दिनों दलित उत्पीड़न के विरोध में उठने वाली आवाजें सुनाई नहीं देतीं. यहां के 'अखबार, छापेखानों' ने भी चुप्पी साध रखी है.
एक ओर 'विकास-विकास' का प्रयोजित शोर और दूसरी ओर दलितों पर ढायी जा रही हिंसा पर अनमयस्क चुप्पी-यह बिहार का मौजूदा मीडिया-परिदृश्‍य है.

सबसे ताजा घटना को ही लें. गत चार फरवरी को दरंभगा जिला के बिरौल अनुमंडल के लगमां गांव की मुसहर बस्ती पर ब्राह्‌मणों का कहर बरपा. लगभग ७० झोपड़ियां ब्राह्‌मणों के क्रोध में जलकर खाक हो गयीं. घरों से भागते दर्जनों महिला-पुरूषों को खदेर-खदेर का बेरहमी से अधमरा होने तक पीटा गया. कई दुधमुंहे बच्चे आग में झुलस गये. लेकिन यह खबर बिहार के समाचार पत्रों के जिला संस्करणों से बाहर नहीं निकल पायी. राजधानी पटना के संस्करणों में इसे छोटी सी जगह अंदर के पन्नों में दी गयी. इस मामले में विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल का रवैय्‌या भी गैरजिम्मेवाराना रहा. इसी दिन सरस्वती की मूर्ति विर्सजन को लेकर गोपालगंज जिला के विशुनपरा गांव में सांप्रदायिक तनाव की घटना पर राजद प्रवक्ताओं ने हो-हंगाम किया लेकिन लगमां में दलितों पर ढायी गयी हिंसा पर एक चलताऊ बयान देकर चुप्पी साध ली. झगड़ा जमीन का था. कभी दरभंगा महाराज की जायदाद रही इस बस्ती की जमीन राज्य सरकार के पिछले सर्वे के अनुसार 'सरकारी गैरमजरूआ' पायी गयी थी. इसी तथ्य के बूते मुसहरों ने लगभग पांच साल पहले इस जमीन पर आशियाना बसा लिया था. लगमां गांव ब्राह्‌मण कहते हैं कि यह जमीन दरभंगा महाराज के वंशजों ने हमें दान में दी थी. पांच साल पहले भाकपा (माले) की षह पर मुसहरों ने हमारी जमीन पर जबरन कब्जा कर लिया था. वह लालू के जंगलराज का समय था सो चुप रहे; लेकिन नीतीष के सुषासन पर हमें भरोसा है. नीतीश ने 'न्याय के साथ विकास' का नारा दिया है. वह विकास में फंसे है, इस बीच 'न्याय' हम खुद कर ले रहे हैं!


मीडिया की कारस्तानी उस समय और संगीन हो जाती है जब हम यह जानते हैं कि बिहार के प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अधिकांश प्रमुख संवाददाता घंटों चली इस भयंकर आगजनी के समय घटना स्थल से महज १० किलोमीटर की दूर बिरौल अनुमंडल के ही दबंग ब्रह्‌मणों के गांव कमलपुर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मौजूद थे. इस गांव में मुख्यमंत्री की 'विकास यात्रा' की सभा और रात्रिविश्राम था. मुख्यमंत्री ने भी इस घटना की न निंदा की, न ही कोई बयान दिया। !


भारातीय जनता पार्टी और जदयू की मिली जुली सरकार के दौरान दलित उत्पीड़न की ऐसे दो दर्जन से अधिक घटनाएं हुई हैं, जिन्हें मीडिया ने हाशिया पर धकेला है. मुख्यमंत्री के गृह जिला नालंदा के सिलाव थाना के घोसतामा गांव में ऐसी ही एक वीभत्स घटना में अपनी १४ साल की बेटी को उठाने का विरोध करने पर सामंतों ने छोटन पासवान नामक व्यक्ति की मूंछ उखाड़ ली थी और उसकी पत्नी की बेरहमी से पिटाई की थी. पीड़ित परिवार कई दिनों तक बिहार शरीफ के सदर अस्पताल में भर्ती रहा लेकिन मीडिया ने कोई सुध नहीं ली. इसी जिला के अस्थावां थाना के जियर गांव में मंदिर में प्रवेश करने के कोशिश करने के आरोप में कारू पासवान की हत्या कर दिये जाने की घटना को भी मीडिया ने अछूत माना. नालंदा जिला की इन दोनों घटनाओं पर दलित सेना के अध्यक्ष व लोकजनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ने प्रेस कांफ्रेंस कर जानकारी दी थी. तब भी इसकी कोई नोटिस नहीं ली गयी.
वास्तव में साल २००३-०४ में केंद्र की सत्ता में राजग द्वारा अपनाये गये 'फील गुड' की पैरोडी के रूप में बिहार में इन दिनों 'गुड न्यूज' की धूम है. फर्क सिर्फ इतना है कि अटल बिहारी वाजपेयी को 'फील गुड' के विज्ञापन छपाने के लिए देश की गाढ़ी कमाई अखबारों पर खर्च करनी पड़ी थी. नीतीश-मोदी के लिए बिहार के समाचार पत्र यह काम मुफ्‌त कर रहे हैं.

विकास यात्रा के उत्साह में हुआ कांड
'' जब जमींदारी खत्म होने लगी तो दरभंगा महाराज के मैनेजरों ने आननफानन में फर्जी रसीद पर सैकड़ों लोगों को जमीन दे दी. मिथिलांचल में ऐसे विवाद कई जगह हैं. लगमां की जमीन भी इसी तरह की है लेकिन पिछले सर्वे के अनुसार यह जमीन गैरमजरूआ के रूप में सरकारी रिकार्ड में दर्ज है. वास्तव में मामला सिर्फ इतना ही नहीं है. लगमां की मुसहर बस्ती पर हमला करने वाले गुंडो को भाजपा के विधान पार्षद संजय झा का संरक्षण प्राप्त था. परीसीमन के बाद नीतीष के चहेते, दरभंगा महाराज के अररिया ड्योढ़ी के वशंज संजय झा दरभंगा लोकसभा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ना चाह रहे हैं. इस मामले में जमीन-विवाद के अलावा हमले का तात्कालिक कारण लोकसभा चुनाव और मुख्यमंत्री की विकास यात्रा है. मुख्यमंत्री की यात्रा से उत्साहित ब्राह्‌मणों ने अपनी ताकत दिखलाने के लिए इस घटना को अंजाम दिया है ताकि उनमें इतना भय भर दिया जाए वे मतदान केंद्रों तक न पहुंचें.''
-धीरेंद्र झा, भाकपा (माले) केंद्रीय कमिटि के सदस्य व दरभंगा मामलों के प्रभारी

घर का मोह छोड़ पोखर किनारे बसें दलित!
'' लगामां गांव की दलित बस्ती दरभंगा महाराज की पट्टी है. इस जमीन पर बसे लोगों ने इस पर जबरन कब्जा कर लिया है. यहां बसे दलितों को हम लोग पोखर के किनारे जगह दे रहे हैं. लेकिन ये वहां बसने के लिए तैयार नहीं हैं. इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है. आगजनी की घटना में दोनों पक्षों पर प्राथमिकी दर्ज की गयी है.''
-शमीम अहमद, एसडीओ, बिरौल अनुमंडल

प्रथम प्रवक्‍ता, संपादक रामबहादुर राय, के 16 मार्च अंक में प्रकाशित

0 comments:

Post a Comment