-प्रमोद रंजन
हर सनसनीखेज खबर की ही तरह इस खबर को याद रखे जाने की अवधि भी अंततः बहुत छोटी रही. अन्यथा महज तीन माह पहले महाराष्ट्र में बिहारियों की पिटाई की घटना के बाद जिस तरह राजनीति गरमायी थी, उससे शायद कुछ लोगों को ऐसा लगा था कि यह मामला लंबा चलेगा. कुछ यहां तक कह रहे थे कि यह घटना देश की राजनीति की दिशा ही बदल देगी. लेकिन न कुछ ऐसा होना था, न हुआ. अलबत्ता इस बार भी मीडियाई हुड़दंग ने इस मुद्दे से जुडे जेनुइन सवालों को सयास पीछे धकेल दिया. अब जब यह मामला शांत हो गया है, बिहार समेत अन्य बीमारू हिंदी प्रदेशों की मौजूद राजनीति व वास्तविक समस्याओं को उन जरूरी सवालों की ओर लौट कर समझा जा सकता है.
अगर मुंबई की सड़क पर सरेआम पिस्तौल लहरा रहा युवक -'राहुल राज' की जगह कोई 'अनवर हुसैन' होता तो क्या स्थितियां बनतीं? यह एक ऐसा ही सवाल है, जिसका उत्तर सब जानते हैं. सो, राहुल राज इनकाउंटर की आवश्कता, नैतिकता पर बात करने से बेहतर है कि इस प्रकरण के कुछ दूसरे पहलुओं पर बात की जाए.मुंबई में बस अगवा करते राहुल राज की हत्या (२७ अक्टूबर) ने महाराष्ट्र मसले पर बिहार में चल रहे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया था. इस घटना से पहले बिहार में जगह-जगह ट्रेनें जला रहे, तोड़फोड़, पथराव कर रहे छात्र राज ठाकरे से अधिक अपने नेताओं लालू-नीतीश के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर रहे थे. नारे लगा रहे थे. उनमें यह भाव था कि पलायन की विवशता के लिए जिम्मेवार अपने ही नेता हैं. राहुल राज के इनकाउंटर के बाद ही बिहार के राजनेताओं ने राहत की सांस ली. लालू, नीतीश व रामविलाजी ने उसे शहीद, शेरे बिहार, बिहार का सपूत और न जाने क्या-क्या कहा. इससे एक रोज पहले तक नीतीश महाराष्ट्र में बिहारी युवकों की पिटाई के बाद बिहार में घट रही तोड़फोड़ की घटनाओं से बेहद चिंतित थे. उन्होंने संचार माध्यमों को कहा था कि न कुछ ऐसा छापा जाए, न दिखाया जाए, जिससे बिहार की भावना भड़के. लेकिन इस युवक के मारे जाने के बाद परिदश्य बदल गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, रेलमंत्री लालू प्रसाद व रसायन मंत्री रामविलास पासवान अपने-अपने तरीके से राहुल राज के एनकाउंटर को को तूल देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वास्तव में राहुल की हत्या ने ही बिहारी आक्रोश की धारा पूरी तरह राज ठाकरे और महाराष्ट्र सरकार की ओर मोड़ दी है. बिहार के राजनेताओं का अभिष्ट भी यही था. राजनताओं में राहुल की अंतयेष्टि में शामिल होने, उसके घर जाकर सांत्वना देने की होड़ लग गयी. नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी (उपमुख्यमंत्री), दीपंकार भट्टाचार्य (माले महासचिव), अनिल शर्मा (प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष), समेत कई बडे-छोटे नेता उसके घर पहुंचे. बाहुबली सांसद सूरजभान सिंह, राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (प्रदेष अध्यक्ष, जदयू) गिरिराज सिंह (सहाकारिता राज्य मंत्री, बिहार), अखिलेश सिंह (केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री) समेत एक खास जाति के कई राजनेताओं ने राहुल के घर जाकर 'न्याय' दिलाने का वादा किया.
परीक्षा केंद्र बदलने में रूचि न लेने वाले लालू प्रसाद ने राहुल राज की हत्या के बाद टीवी कैमरे के सामने बेतरह गुस्सा दिखाते हुए कहा कि महाराष्ट्र सरकार पगला गयी है. उन्होंने बताया कि राहुल एक 'संभ्रात' परिवार का लड़का था. हमेशा जाति के संदर्भ के साथ बात करने वाले लालू प्रसाद के इस संकेत का अर्थ बिहार के लोग समझते हैं. राहुल का जन्म एक उंची जाति के (भुमिहार) परिवार में हुआ था. लालू कहना चाह रहे थे कि उसे 'गरीब-गुरबा' न समझा जाए. संभ्रांत परिवार का था.
लालू प्रसाद द्वारा किये गये इस संकेत के साथ ही मुंबई पुलिस की गोली से मारा गया राहुल राज एक साथ कई प्रतीकों का वाहक बनता है. ये प्रतीक हैं बिहार की कुंठा के. यहां की द्विज जातियों की प्रतिक्रिया के. बिहार में भीतर-भीतर पनप रही अलगाववादी मनोवृतियों के.राहुल की पारिवारिक पृष्ठभूमि जाने बिना आगे बढ़ने पर हम इन प्रतीकों को नहीं समझ पाएंगे.
राहुल ने रेडियोलॉजी में डिप्लोमा किया था और २४ अक्टूबर को घर से मुंबई जाते हुए यह कह गया था कि वह नौकरी तलाशने जा रहा है. २५ या २६ अक्टूबर को वह मुंबई पहुंचा और दूसरे दिन ही यह कांड सामने आया. वह पटना के कदमकुआं मुहल्ले के एक मध्यवर्गीय परिवार का लड़का था. उसके पिता ने दो शादियां की हैं. दूसरी शादी राहुल की मां की छोटी बहन से है. टीवी पर राहुल के दोस्त यह कहते दिखे कि राहुल के पिता उसे असहनीय शारीरिक व मानसिक यातनाएं दिया करते थे. २४-२५ वर्षीय युवक राहुल की लोहे के रॉड से पिटाई की जाती थी. बात-बेबात अपमानित किया जाता था. बेरोजगारी और पिता की क्रूरता की दोहरी मार से बचने के लिए उसने आत्मघात का रास्ता चुना. खामोशी के हथियार से अपनी जलालत भरी जिंदगी का प्रतिरोध करने वाला यह युवक महाराष्ट्र की घटनाओं से व्यथित रहा होगा. राहुल की कुंठा का यह अंतिम चरण-आत्मघाती प्रवृति-कामोवेश बिहार की कुंठा को भी प्रतिबिंबित करती है.
हिंदी समाचार पत्रों में बिहार व उत्तर प्रदेश्ा के द्विज पत्रकार भरे हैं. बिहार के राजनेताओं के साथ-साथ राहुल की कार्रवाई को महिमामंडित करने में इन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. स्थानीय टीवी चैनलों ने तो कोढ़ में खाज की ही भूमिका निभाई. इस सब के बावजूद, राहुल द्वारा किया गया काम, गरीबी और जहालत की मार झेल रहे विकास की दौड़ में पीछे छूट गये इस बीमारू राज्य से निकला, एक ऐसा संकेत तो है ही, जो बताता है कि पानी अब नाक के उपर से गुजरने वाला है. तो क्या अब तक हालत ठीक थे?
बिहार से पलायन का सिलसिला तो वर्षों से जारी है. १९७५ के आसपास इसमें तेजी आयी. पंजाब-हरियाणा में बिहारी मजदूरों की चाय में अफीम मिलाकर उनसे बंधुआ की तरह काम लिया जाता रहा है. महानगरों में उनका जीवन सामाजिक तथा भौतिक रूप से नारकीय है. मारपीट तो छोटी बात है. कितने बिहारी मजदूर परदेश में काम के दौरान मर गये, इसका आंकड़ा न वहां की सरकारें रखती हैं न ही बिहार सरकार ने इससे कभी मतलब रखा है. सिर्फ पंजाब-हरियाणा जाने वाले सैकड़ों मजदूर हर साल ट्रेनों से कट कर मर जाते हैं. इनमें से अधिकांश की तो पहचान तक नहीं हो पाती है. (देखें, पत्रकार अरविंद मोहन का शोघ 'प्रवासी मजदूरों की पीड़ा', राधाकृष्ण प्रकाशन).
बिहार से पलायन के दो मुख्य कारण हैं. कृषि की बदहाली व शहरीकरण की बेहद सुस्त प्रक्रिया. इन दोनों के पीछे प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से भूमि संबंध ही हैं, जिन्हें बदलने की हर कोशिश यहां के सामंतों ने नाकाम कर दी. नतीजा यह हुआ कि कृषि उत्पादन घटता गया, अंत में तो सिर्फ सामंती हेंठी ही शेष रह गयी; आर्थिक ठाठ लगभग जाता रहा. क्रांतिकारी आंदोलनों के प्रभाव में आयी निचली जातियों के युवकों में जागरूकता आयी कि स्थानीय सामंतों का बंधुआ होने से बेहतर है पूंजी की बड़ी मंडियों में अपना श्रम बेचना. इन सबने बिहार में पलायन के लिए एक आदर्श वातावरण तैयार किया. लालू प्रसाद के नेतृत्व में १५ वर्च्चों तक चली सरकार ने बची-खुची संस्थाओं को भी ध्वस्त कर, इसे और तेज कर दिया. राजद शासन काल में दलितों-पिछड़ों का पलायन तो बढा ही; 'संभ्रांत' जातियों के युवकों का भी बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ, जो उत्तरोत्तर तेज होता गया है.बिहार के गांवों में इन जातियों के पास भले ही पैसा न था, सामाजिक सम्मान तो था ही. परदेश में 'बिहारी', 'भैया' आदि संबोधन अब तक पिछड़े तबके से आने वाले मजदूरों की पहचान था. श्रम की मंडियों में संभ्रांत तबकों के लोग पहुंचे तो उनपर भी यही अपमानजनक संबोधन, व्यवहार लागू हुआ. जब तक बिहारी समाज का पिछड़ा तबका पलायन की पीड़ा झेलता रहा. परदेष में अफीम पीकर काम करता रहा. पिटता रहा. भैया एक्सप्रेसों से गिर कर मरता रहा. बात-बे-बात पर मारा जाता रहा, तब तक न बिहार के 'संभ्रांत' लोगों को कोई फिक्र हुई, न पत्रकारों को. अब जब अपनों पर बीत रही है तो छाती फटी जा रही है!
यह महाराष्ट्र-असम में हिंदी भाषियों पर हमले से मचे बवाल का सामजिक परिप्रेक्ष्य है. जाहिर तौर पर इस प्रकरण के व्यापक आर्थिक पहलु भी हैं. लेकिन इनका संबंध महाराष्ट्र-असम में हो रहे बिहार-उत्तरप्रदेश के लोगों के विरोध से है, न कि इन विरोधों के बाद मचाये जा रहे बवाल से. इस फर्क पर गौर किया जाना बेहद जरूरी है. बेरोजगारी की मार से कराह रहे इन राज्यों की मांग है कि रेलवे समेत तीसरे और चौथे दर्जे की अन्य नौकरियों में भी स्थानीय लोगों को आरक्षण मिले. देश की अखंडता और रोजी-रोजगार के लिए कहीं भी जाने की स्वतंत्रता का समर्थन करने के बावजूद; इन राज्यों की मांगों को खारिज नहीं किया जा सकता. इन घटनाओं के बीच चल रहे लोकसभा सत्र में भी यह सवाल गूंजा था. शिवसेना व भारतीय जनता पार्टी के सांसदों का कहना था कि महाराष्ट्र में रेलवे की नौकरियों में बिहार के लोगों की संख्या ४८ से ६५ प्रतिशत तक हो गयी है. उड़ीसा के एक भाजपा सांसद रूद्र नारायण पाणि ने कहा कि रेलवे की जोनल कमिटियों में ८५ प्रतिशत लोग बिहार के हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस के शरद पवार व छगन भुजबल ने भी इसका समर्थन किया है तथा महाराष्ट्र कांग्रेस भी कमोवेश ऐसा ही सोचती है. किसी जेनुइन सवाल को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह दक्षिणपंथियों की ओर से आया है. बिहार में इन दिनों बड़े पैमाने पर (लगभग २.५० लाख) शिक्षकों की बहाली चल रही है. बिहार वासियों के लिए इसमें सौ फीसदी आरक्षण रखा गया है. जबकि इन शिक्षकों के वेतन का ७५ प्रतिशत भाग केंद्र सरकार वहन कर रही है. महाराष्ट्र जैसे गैर हिंदी भाषियों की तो छोड़िए, अगर आरक्षण न हो और इनमें से ४८-६५ फीसदी लोग उत्तरप्रदेश के ही चुन लिये जाएं तो बिहार के लिए भी इसे पचाना असंभव होगा.
रेलमंत्री के पद पर बिहार का वर्चस्व पुराना है. यह सिर्फ चर्चा ही नहीं, बल्कि राजनीतिक अरोप-प्रत्यारोपों में उजागर हो चुका तथ्य है कि रामविलास पासवान और नीतीश कुमार के कार्यकाल में रेलवे की नौकरियों की पैसे व जाति के आधार पर बंदरबांट की गयी. लालू प्रसाद इसमें भी पीछे नहीं रहे हैं. यह समझना भूल होगी कि वर्तमान व पूर्व रेलमंत्रियों की ओर से उठी 'कहीं भी रोजी-रोजगार करने की स्वतंत्रता' की आवाज देश की अखंडता और एकता की रक्षा के लिए है. इन धुर विरोधियों की एकता के पीछे कुछ और भी है. बहरहाल, बिहारी मान-सम्मान के लुभावने नारों के पीछे भागने वालों से सिर्फ एक सवाल पूछना पर्याप्त होगा कि बिहार की बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार हैं?
श्ाहीद बनाने का खेल
महाराष्ट्र में बिहारी युवकों की पिटाई के बाद बिहार की घटनाओं को तिथिवार देखा जाए तो कुछ तथ्य स्वतः खुलते हैं. १९ अक्टूबर को बिहारी छात्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के कार्यकर्ताओं से पिटे. वहां से २१ अक्टूबर को पटना लौटे विद्यार्थियों ने स्टेशन परिसर व द्याहर की सड़कों पर जम कर उत्पात मचाया. इस बीच नालंदा जिला के एक छात्र की मनसे कार्यकर्ताओं की पिटाई में हुई मौत की भी खबर आ गयी. आक्रोश और भड़का. पवन नालंदा जिला के बाराखुर्द गांव का एक पिछड़ी जाति में पैदा हुआ होनहार युवक था. रेलवे की परीक्षा देने से पहले एलआइसी में उसकी नौकरी हो चुकी थी. २१ अक्टूबर को ही उसका शव पटना एयर पोर्ट पहुंचा, उसी शाम पटना के पास ही फतुहा में उसकी अंतयेष्ठि की गयी. उसके लिए मुआवजे की घोषणा तो हुई लेकिन बिहार के किसी राजनेता ने मनसे कार्यकर्ताओं की हिंसक गुंडागर्दी में मारे गये इस बेकसूर की मातमफूर्सी में शामिल होन की जरूरत नहीं समझी... न ही मीडिया ने 'गरीब-गुरबा' के इस बेगुनाह युवक को 'संभ्रांत' परिवार के पिस्तौल लहारते युवक राहुल की तरह 'शहीद' कहा. जैसे-जैसे मुंबई से छात्र लौटते गये, हंगामा बढ़ता गया. २२ अक्टूबर को जहानाबाद, सासाराम, नवादा आदि स्टेशनों पर जम कर तोड़फोड़ हुई. बाढ़ में ट्रेन में आग लगा दी गयी. सासाराम में हंगामा करते छात्रों पर पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें एक की मौत हो गयी. (बिहार पुलिस की गोली से हुई इस मौत को भी राजनेताओं ने तवज्जो नहीं दी) पवन की मौत के विरोध में इस दिन मुख्यमंत्री का चुनावी गढ नालंदा जिला बंद रहा. जिला मुख्यालय बिहार शरीफ में छात्रों ने न सिर्फ मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के लिए बनाये गये मंच को तोड़ डाला बल्कि शहर भर में उनके नाम के जितने शिलापट्ट थे, सभी ध्वस्त कर दिये. इससे एक दिन पहले वहां मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के पूर्वाभ्यास के लिए पहुंचे हैलीकॉप्टर पर पथराव किया गया था. आक्रोश की दिशा देख घबराए मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को पुचकारते हुए समझाया कि 'आप लोग सहयोग कीजिए. नहीं तो बिहार धू-धू कर जल जाएगा. एक बार आग लग गयी तो कोई नहीं रोक पाएगा. जो छवि बनी है वह मिनट भर में समाप्त हो जाएगी'. याद कीजिए, विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल ने इससे पहले आरोप लगया था कि सत्ताधारी जदयू-भाजपा की द्याह पर रेल-संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. तोड़फोड़ की कुछ घटनाओं में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की संलिप्तता भी सामने आयी थी. अगले तीन-चार दिनों में यह आक्रोश और भड़का तो मुख्यमंत्री ने अपनी चिरपरिचित कार्यशैली को अंजाम देते हुए अखबारों पर सेंसरषिप का उस्तरा चला दिया. २३ अक्टूबर को मोतीहारी, बक्सर, लखीसराय, भागलपुर, मुजफ्फरपुर में रेल व अन्य सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. डालमिया नगर में रेलमंत्री लालू प्रसाद की जनसभा के लिए बनाये गये पंडाल में आग लगा दी गयी. २४ अक्टूबर को भी पटना, गया, बेतिया आदि में उग्र प्रदर्षन हुए लेकिन 'सेंसरषिप' ने असर दिखाया. तोड़फोड़ और 'बिहारी आक्रोष' से संबंधित खबरें अचानक बिहार के अखबारों के भीतरी पन्नों पर चली गयीं और 'अमन चैन बहाली' की खबरों को पहले पन्ने पर जगह मिलने लगी. २७ अक्टूबर को राहुल राज की मौत ने इस अखबारी दृश्य को एक बार फिर उलट दिया. अब खुद नीतीश्ा भी ऐसा ही चाहते थे.
05 February, 2009
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5 comments:
बहुत अच्छे विश्लेषण के साथ एक सामयिक मुददे पर लेख लिखा गया है......इस लेख से हर प्रकार की जानकारी भी मिली.....इस प्रकार के अन्य आलेखों का इंतजार रहेगा।
बहुत बढिया विश्लेषण किया है।
aap puri tarah se confused nazar aaye ees lekh me. Aap Bihariyon par hue atyachar se naraz hain lekin ek Bihari yuvak ki sareyam camera ke saamne goli maar di jaati hai aur ees bich aapko uski jaati ki jankari ho jaati hai. Pure ghatnakram ke dauran aap kunthit hote pratit nazar aaye ees lekh me ki eetna ho halla kyon? Wo Bihari thode naa hai. Wo to sambhrant hai. Bihari means Garib/gurba hota hai.
Basically ye aapka kewal apna problem nahin hai. Ye saare Bihariyon me dekha jaata hai ki wo marne waali ki jaati dekh kar maiyaat me jaana chahte hain. Agar dusare ooske maiyaat me jaate hain to wo kunthit hote rahte hain ki ooski maiyyat me eetni bhid kyon?
Mujhe aapki lekh ek 90 ke dashak ke kunthit mansikata waale Bihari ki lekh nazar aayee. Desh ke saath saath Bihar bhi 21st century me ghush kar aisee baat karne waale logo ko tamacha maar raha hai. Aab ees paribhasha ko koi maanane ko taiyar nahin hain. Bihar me phir se log kandhe se kandhe milakar kaam karna aur rahna sikh liye.
Dhanyabad
Upadhyayjee.
Ek migrated Bihari.
इस घटना को आपने वामपंथी रंग दे दिया है .एक पत्रकार और सम्पादक के नाते कम से कम पवन को शहीद की लिस्ट में रखने की कोशिश के लिए लगातार लेख देना चाहिए था. प्रमोद जी जाने वाले चले जाते है यूँ ही .उसके लाश के साथ कौन कौन खड़ा था ,फर्क क्या पड़ता है . भारत से अंग्रेज को उनके पहले जुल्म पर तो खदेडा नही गया होगा .
इस पर जरा सोचियेगा पूरी दुनिया में जो दशा भारत का है वहीँ दशा भारत के अन्दर बिहार का है .
बिहार में कोई अपने पेशे से बाद में सरोकार रखता है पहले अपने आपको किसी राजनितिक रंग में रंग लेता है .
बिहार तबतक नही बदलेगा जबतक बदलावकार में आमूलचूल परिवर्तन न हो . और इतिहास गवाह है मध्यवर्ग ही बड़ा से बड़ा परिवर्तन किया है . मध्यवर्ग करवट ले रहा है तो जागेगा ही .
U R A SICK MAN...AND UR ALL INCOMPLETE DATA COME THORUGH TO SUPPORT ILL-MINDED PEOPLE...
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