31 January, 2009

निराला को आज पढ़ते हुए

-प्रमोद रंजन


निराला की जयंती पर यह प्रश्‍न स्वभाविक है कि आज उन्हें कैसे पढ़ा जाए, उनके साहित्य में मूल रूप से किन मूल्यों की स्थापना दिखती है? हिंदी के इस बड़े कवि पर लिखी गयी अधिकांश आलोचना को दरकिनार कर ही इन दोनों सवालों पर विचार संभव है- अन्यथा पिछले लगभग पांच दशकों का हिंदी साहित्य का इतिहास उनकी प्रशंसाओं से पटा है- इन प्रशंसा ने उन्हें एक मिथक बना दिया है- आज के समय में निराला की कविता पर उठाये जा सकने वाले सवालों के जबाव के लिए इन मिथकों को गढ़े जाने के उददेश्‍यों को भी देखा जाना चाहिए।

निराला के जन्म काल को ही लें। साहित्य के इतिहास में उनका जन्म वर्ष १८९६ बताया गया है लेकिन वहां तिथि और माह नहीं है। छायावाद के अन्य कवियों जयशंकर प्रसाद (१८८९) और महादेवी वर्मा (१९०७) के साथ भी ऐसा ही है। पंत को अपनी जन्म तिथि पता है-२० मई, १९०० । संभव है पंत का परिवार अपनी संतान की जन्म तिथि की स्मृति रखने के मामले में छायावाद के अन्य कवियों निराला, महादेवी और जयशंकर प्रसाद के परिवार से अधिक सचेत रहा हो। लेकिन यह संभवना उस समय समाप्त हो जाती है-जब हम उनकी जन्म तिथि के स्थान पर 'वसंत पंचमी' दर्ज पाते हैं। अगर निराला को यह पता है कि उनका जन्म 'वसंत पंचमी' के दिन हुआ था तो उन्होंने इसकी तिथि क्यों नहीं निकाली? १८९६ में वसंत पंचमी किसी तिथि को पड़ी थी-यह कैलेंडर के माध्यम से आज भी आसानी से जाना जा सकता है। निराला द्वारा प्रयुक्त शब्दों के उत्स के लिए पोथी दर पोथी तलाशने वाले आलोचकों ने भी इसे यथावत छोड़ दिया है. निराला के काव्य के कई हिस्सों को पढ़ते हुए यह तथ्यगत संदेह होता है कि एक हिंदू त्योहार को जन्म तिथि के रूप में पेश करना सिर्फ मिथक गढ़ना नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति के नाम पर सचेत रूप से हिंदू मानकों को स्थापित करना है. निराला के काव्य के बारे में रामचंद्र शुक्‍ल लिखते हैं- 'अद्वैतवाद के वेदांती स्वरूप को ग्रहण करने के कारण इनकी रहस्यात्मक रचनाओं में भारतीय दार्शनिक निरूपणों की झलक जगह-जगह मिलती है (हिंदी साहित्य का इतिहास)'. ध्यान दें, अद्वैतवाद का वेदांती स्वरूप और भारतीय दार्शनिक निरूपणों की झलक. अद्वैतवाद के वेदांती स्वरूप में-हजारों परंपरा वाले भारतीय दर्शन की कितनी और कैसी झलक संभव है? तुलसीदास की तरह निराला के भी रामचंद्र शुक्‍ल की प्रशंसा के पात्र बनने का कारण यह था कि खुद शुक्‍ल जी का 'इतिहास' हिंदी साहित्य और 'हिंदू साहित्य' के फर्क को लगभग मिटा देने वाला रहा है. सोचिए, समाज के 'वेदांती रूप' की असलियत जानने वाले आज के पाठक के लिए इस प्रशंसा के क्या मायने हो सकते हैं. निराला के काव्य में मनु और नीत्‍शे की झलक इस पाठक को और दुविधाग्रस्त कर देती है.

निराला की प्रसिद्ध पंक्ति है-'योग्य जन जीता है, योग्य जन जीता है/ पश्चिम की उक्ति नहीं, गीता है, गीता है'. 'योग्य जन जीता है' यह मानवतावाद की अवधारणा नहीं है. मार्क्सवाद के तो यह ठीक विपरीत ही है. निराला को पढ़ते हुए आज के पाठक के ध्यान में यह भी रहेगा कि 'चातुवर्ण्यं मया सृष्टि' (वर्णव्यवस्था मेरी रचना है) का उदघोष करने वाली गीता का लक्षित 'योग्य जन' कौन है. नीत्‍शे के परिप्रेक्ष्य में यही 'योग्य जन' 'सूपर मैन' है. निराला के ऐसे रूप उनकी रचना 'तुलसीदास' में भी साफ दिखते हैं. कवि तुलसीदास के देश काल के वर्णन के बहाने यहां निराला मुसलमानों के प्रति अपना वैर भाव दिखाने का कोई अवसर नहीं चूकते. उनके हिंदुत्व की उग्रता का ताप विचलित कर देने वाला है. यद्पि यह तुलना ज्यादा प्रासंगिक नहीं है पर यहीं हमारा ध्यान निराला और नीत्‍शे के जीवन की दो समानताओं की ओर भी जाता है. नीत्‍शे की ही तरह निराला के बारे में भी कहा जाता है कि उनका जीवन घोर अभावों और विपत्तियों के बीच बीता था. इसके अलावा दोनों को अपने जीवन के अंतिम दिनों में विक्षिप्तावस्था से गुजरना पड़ा था. निराला अंतिम कविता है 'पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है'. यही उस कविता की पहली पंक्ति भी है. डॉ. बच्चन सिंह ने अपने एक लेख में इस कविता की व्यख्या करते हुए लिखते हैं- 'पत्रोत्कंठित शब्‍द अर्थ बोध में बाधा डालता है...संधि विच्छेद करने पर इसका अर्थ कुछ खुलता है. पत्रा+उत्कंठित. अवध के गांवों में, अवधि से सटे हुए भोजपुरी के गांवों में एक मुहाविरा चलता है. उनका पत्रा खो गया है-उनका पत्रा हेरायल बा. यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु विलंबित हो जाती है, तो लोग ऐसा ही कहते हैं. पत्रा खो जाने से मृत्यु तिथि के न मिलने का बोध होता है. कवि को उसी पत्रा को पाने की उत्कंठा है.' निराला की इस अंतिम कविता की अंतिम पंक्ति है 'पुनः सवेरा एक और फेरा है जी का'. यहां पुर्नजन्म की अवधारणा की पुष्टि स्‍पष्‍ट है.

'वसंत पंचमी' से ' पुर्नजन्म' तक की यात्रा के अन्य अनेक पड़ाव सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कथित प्रगि‍तशीलता को ध्वस्त करते हैं और आज के पाठक के समक्ष उनके पूरे काव्‍य को संदिग्‍ध बनाते हैं।

( प्रभात खबर, 31 जनवरी, 2009 के अंक से साभार )

7 comments:

योगेश समदर्शी said...

सामयिक और प्रासंगिक भी...

हिमांशु said...

सुन्दर और प्रासंगिक ।

vikram7 said...

सुन्दर प्रभावशाली लेख

परमजीत बाली said...

अच्छी पोस्ट लिखी है।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन आलेख.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बेहतरीन लेख

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

प्रभावशाली सामयिक और प्रासंगिक लेख.

Post a Comment