संशयात्मा

25 October, 2008

कोसी ढूंढ रही है सबको

- रवीश कुमार

( दोस्तों,सहरसा,सुपौल और मधेपुरा से लौट आया हूं । मेरा अब भी मानना है कि बाढ़ प्राकृतिक नहीं है। ऐसे तर्को से सावधान रहने की ज़रूरत है कि कोई भी सरकार इतनी बड़ी तबाही में क्या कर सकती है। इस तर्क से दोषियों को चेहरा छुपाने के लिए पर्दा मिल जाता है। नितांत भाग्यवादी तर्कों से बचा जाना चाहिए। भ्रष्ट लोगों की वजह से बाढ़ आई है। इसलिए इस आपदा में कारण बड़ी खबर है राहत नहीं। मानवीय खबरें बड़ी खबर नहीं है न ही बचाव में लगे किसी नायक की खोज। बल्कि बड़ी ख़बर सिर्फ यही है कि जिनकी वजह से बाढ़ आई वो कहां हैं। मुझे जो कुछ भी दिखा, लगा मैं यहां आपके सामने रखूंगा। यह मेरा पहला लेख है।)


माइक और कैमरा बंद कर दिया है। अब आप सच बताइये। कहते ही कुशहा में तैनात इंजीनियर के चेहरे पर भय की रेखाएं निकल आईं। सच। हां,कैमरे पर कही गई बहुत बातें पर्दे में ही होती हैं। मैं ये अपने लिए जानना चाहता हूं। किसी को बताने के लिए नहीं। आपके बाल बच्चे होंगे। घर होगा। ईमान भी होगा। बता दीजिए कि कुशहा में जहां आप तटबंध का कटाव रोक रहे हैं वो काम पंद्रह दिन पहले हो सकता था या नहीं। इंजीनियर अब सच बोलना चाहता था। मुझे अकेले में ले गया। पत्रकार साहब,लोगों के शरीर में कीड़े पड़ेंगे। यहां जब हम आए तो लगा ही नहीं कि कुछ भी युद्ध स्तर पर किया जा रहा था। अगर बचाये जाने की कोशिश होती तो बचाया जा सकता था। कोई बड़ी बात नहीं थी। विभाग और सरकार से पाप हुआ है। लेकिन मेरा नाम मत छापियेगा। मेरी नौकरी चली जाएगी। मैं तो चौबीस तारीख के बाद पटना से आया हूं। मेरा कोई कसूर नहीं है। वो सच बोल चुका था। लेकिन बोलने के बाद भी उसका मन हल्का नहीं हुआ। क्योंकि उसके ठीक सामने से कोशी पूर्वी किनारे को तोड़ उन अधिकारियों,नेताओं और ठेकेदारों को ढूंढने पूर्णिया,सहरसा,अररिया,मधेपुरा,सुपौल तक जा चुकी थी। वो खेतो में,सड़कों पर,गांवों में,घरों की छत पर,हर तरफ ढूंढ रही थी।

कोसी का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। वो उस समाज को भी ढूंढने लगी जिसने ऐसी चोर व्यवस्था चुनी है। उस मतदाता को भी ढूंढने लगी जो भ्रष्ट राजनेता चुनती है,उस नागरिक को भी ढूंढने लगी जिसके बेखबर होने से अफसरशाही भ्रष्ट होती है। कोसी इन्हीं को लोगों को ढूंढते ढूंढते बर्बादी ला रही थी। कोसी ने चालीस पचास निकम्मे और चोर नेताओं और अफसरों की सजा उन लाखों लोगों को भी दी है जिनकी एक उंगली इन्हें चुनती है। कोशी को समाज की सड़न या उसकी मजबूरियों से मतलब नहीं था। वो इन मजबूरियों को तटबंध से निकल कर ढहा देना चाह रही है। कोशी ने लाखों मासूम लोगों को मासूम बने रहने की सज़ा दी है। इंजीनियर सच बोलकर भी हल्का नहीं हुआ तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि वह कोसी के इरादे को जान गया था।

बिहार सरकार और नीतीश कुमार रात दिन झूठ बोल रहे हैं। चेहरा गंभीर होता है लेकिन झूठ बोलते हैं। वे बाढ़ और राहत कार्य में व्यस्त होने के बहाने कारण पर बात नहीं करना चाहते। वे जानते हैं कि कारण पर चर्चा की तो गर्दन उनकी भी फंस जाएगी और कोशी ने जिन लाखों लोगों को उजाड़ा है वे कोसी का गुस्सा नीतीश कुमार पर उतार देंगे। हर मुख्यमंत्री राहत काम में व्यस्त होता है लेकिन किसकी वजह से टूटा ये क्या वो चार साल बाद बतायेगा। १७ अगस्त को कोसी प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर का तबादला किया जाता है। चीफ इंजीनियर एक बड़ा अफसर होता है। इसकी तैनाती या तबादला बिना मुख्यमंत्री की जानकारी या दस्तखत के नहीं होता। अगर जलसंसाधन मंत्री की कलम से भी होता है तो साफ हो जाता है कि बिजेंद्र यादव एक रुटीन तबादले में व्यस्त थे। वैसे चीफ इंजीनियर के तबादले की फाइल कैबिनेट में जाती है और मुख्यमंत्री मंजूरी देते हैं। ध्यान रहे कि चीफ इंजीनियर को किसी लापरवाही के चलते नहीं हटाया गया था बल्कि कोई और कारण रहे होंगे। साफ है कि किसी को मालूम नहीं था।

मालूम इसलिए नहीं था क्योंकि जिस जगह पर तटबंध टूटा है वहां जाकर साफ हो गया कि आने जाने का रास्ता ही नहीं है। जंगल देखकर और बुरी तरह से टूटे रास्ते से पता चल गया कि यहां कोई आया ही नहीं होगा। रास्ते की हालत बता रही थी कि यहां किसी भी प्रयास से युद्ध स्तर के प्रयास हो ही नहीं सकते थे।

किसी ने पूछा है कि निराशाजनक कहानी के बीच में कोई तो होगा जो अच्छा काम कर रहा होगा। ऐसे बहुत लोग है। लेकिन ये बाद की कहानी है। उनके अच्छा काम करने से से बाढ़ ग्रस्त इलाके की हकीकत में कोई बदलाव नहीं होता। जो अपने घरों में बैठे टीवी देख रहे हैं उन्हें शायद पोज़िटीव स्टोरी से राहत मिले लेकिन क्या जिनके घर उजड़ गए हैं उन्हें ह्यूमन या मानवीय या सकारात्मक स्टोरी से राहत मिलेगी। और इस जानकारी का क्या महत्व है। इस पर बहस अगले लेख में करूंगा।

मेरी राय में कोसी को पटना तक आना चाहिए। इस सड़े हुए प्रदेश को सिरे से उजाड़ देना चाहिए। किसी को बिहार की ऐसी छवि से परेशानी हो सकती है लेकिन कोसी जानती है कि बिहार को एक दिन नई छवि बनानी होगी तब तक के लिए वो तटबंधों को तोड़ ऐसे भ्रष्ट समाज और सरकार को ढूंढने के लिए तबाही लाती रहेगी।

-साभार, कस्‍बा

23 October, 2008

लकवाग्रस्‍त मधुकर सिंह का बायोडाटा


आज सुबह मधुकर सिंह का फोन आया। 'पांच मिनट के लिए जाते, बस पांच मिनट'। उनकी आवाज भर्रायी और आशंका से भरी थी।

दफतर जाने से पहले उनके यहां पहुंचा। उन्‍होंने कोई बात न की सिर्फ दो आवेदन अपने कांपते हाथों से मे‍री ओर बढा दिये। 'इन पर दस्तख् कर दीजिए।' मैं समझ गया। बिहार के शिक्षा मंत्री के नाम आर्थिक मदद का आवेदन होगा। उन्‍होंने इस आशय के आवेदन पर जून में ही मेरा हस्‍ताक्षर लिया था। तो वह आवेदन अभी तक दिया नहीं गया...

वह मेरी ओर टकटकी लगाये देख रहे थे। वह एक अजीब नजर थी उनकी आंखों की पु‍तलियां थरथरा रहीं थीं। दस्‍तख्‍त करने से पहले उन आवेदनों को पढने की मेरी हिम्‍मत नहीं हुई। दस्‍तख्‍त कर दिये। मधुकर जी ने कहा- अपने अखबार का नाम भी लिख दें तो शायद अच्‍छा रहेगा। तब मैंने आवेदनों का उपरी हिस्‍सा देखा। मैं समझ रहा था कि यह शिक्षा मंत्री के नाम लिखे एक ही आवेदन की दो प्रतिलिपियां हैं। लेकिन इनमें से एक शिक्षा मंत्री के नाम लिखा गया जबकि दूसरा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम

मैंने अभी डेढ महीने पहले ही कोसी मे आयी बाढ पर कुछ लेख लिखे हैं। एक पुस्तिका भी जारी की है। कई जगहों से मुझे सूचनाएं मिल रही हैं कि मेरा यह सारा काम मुख्‍यमंत्री को बेहद नागवार गुजरा है। जैसे-जैसे इस पुस्तिका के रिप्रिंट आ रहे हैं, सत्‍ताधारी दल के खास लोगों का गुस्‍सा बढता जा रहा है। ...ऐसे में शिक्षा मंत्री वाले आवेदन पर तो नहीं लेकिन मुख्‍यमंत्री वाले आवेदन पर मेरा हस्‍ताक्षर (और साथ में अखबार का नाम भी, जिसके बाद पहचानने में कोई दुविधा ही नहीं रहेगी) राज्‍य सरकार द्वारा संभावित आर्थिक मदद मे रोडा बन सकता है। दस्‍तख्‍त तो मैं कर चुका था, मधुकर जी का ध्‍यान इस ओर दिलाया और कहा कि कम से कम मुख्‍यमंत्री वाले दरख्‍वास्‍त से मेरा हस्‍ताक्षर हटा देना चाहिए।

हिंदी कथा साहित्‍य के पुरोधाओं में एक मधुकर का जबाब था - 'उन्‍ं‍हें मदद देना हो तो मत दें, लेकिन सिर्फ आप अपना हस्ताक्षर रहने दें'यह है रोगशैया पर पडे मधुकर सिंह की अभिव्यक्ति की स्‍वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्वता।

क्या 40 करोड हिंदी भाषी जनता के लिए इस प्रतिबद्वता का कोई मोल नहीं है।

मधुकर जी को लकवा है। अप्रैल के अंतिम सप्‍ताह से ही वह रोगशैया पर पडे हैं। इधर कुछ हालत सुधरी है। शारीरिक हालत में तो थोडा ही सुधार आया है लेकिन आर्थिक हालत उसके कई गुणा बदतर हो गयी है। फिजियोथेरेपी वाला रोज सौ रूपये लेता है। सौ-दो सौ की रोज दवाइयां। दत्तक पुत्री अन् परिजनों के साथ रहने खाने पीने का खर्च अलग। पटना में जिस मकान में है उसका किराया भी उनकी आर्थिक हैसयित से काफी ज्‍यादा है। पर उपाय ही क्या है, पटना छोड कर अपने पैतक गांव चले जाएं तो इलाज कैसे हो।

video
पटना स्थित किराये के आवास में रोगशैया पर पडे मधुकर सिंह का मोबाइल कैमरे से लिया गया विडियो।

मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के नाम पटना के लेखकों की ओर से दयाद्र भाव से लिखे आवेदनों के साथ मधुकर सिंह का बायोडाटा लगा है। इसके तीन पन्नों में उनकी किताबों, पुरस्कारों, उनपर हुए शोंधों, उनके द्वारा बिहार में करवाए गये साहित्यिक आयोजनों का जिक्र है। यह बायाडाटा क्या हमें शर्म से डुबो देने के लिए काफी नहीं है। मधुकर सिंह जैसे हिंदी के दिग्गज लेखक को अपना बायोडाटा बताना होगा.... मित्रों क्या यह शर्म .....

मधुकर सिंह मार्क्सवाद की सामाजिक न्याय के धारा के लेखक रहे हैं। मुझे यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं लगती कि इस 76 वर्षीय लेखक के साहित् को पढकर हजारों युवक सामाजिक न्याय की अवधारणा मे दीक्षित हुए हैं। हजारों ने जनवाद को अपनाया है।


बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोंनों कथित्त रूप से सामाजिक न्याय का हिमायती है। तब भी ...

मैं नहीं जानता कि मधुकर सिंह का यह बायोडाटा सत्ताधीशों तक पहुंच पाएगा या नहीं। अगर पहुंच भी गया तो उसका हश्र क्या होगा, यह भी मुझे नहीं पता।

मित्रों, सरकार से मधुकर सिंह को चाहे जितनी आशा हो, हो, मेरी अपेक्षा बस इतनी है कि हिंदी समाज उन्हें इस हालत में इस कदर अकेला छोडें।

मैं नहीं जानता की उनके लिए सार्वजनिक रूप से आर्थिक मदद करने की अपील पर भी कितने लोग सामने आएंगे लेकिन तब भी, इस बार यह काम कर रहा हूं।

मधुकर सिंह का फोन नं है - 9334821919

डाक का पता है - श्री मधुकर सिंह, द्वारा - श्री अशोक कुमार, बी-20, इंदिरापुरी कॉलोनी, पो-बी भी कॉलेज, पटना-800014




(मधुकर सिंह पर इससे पहले लिखी मेरी टिप्पणी 'कथाकार मधुकर सिंह को पक्षधात' यहां देंखें।)

14 October, 2008

बाढ 2008

अनकही कहानी
( 'बाढ 2008- अनकही कहानी' शीर्षक से यह 32 पन्‍नों की पुस्तिका 15 सितंबर को जारी हुई है। 10 अक्‍टूबर तक इसके पांच संस्‍करण हो चुके हैं। एक महीने में ही इसका मुद्रित संस्‍करण कई लाख लोग इसे पढ चुके हैं।
अभी तक आपने इसके कुछ लेख इस ब्‍लॉग पर पढे हैं। अब यह पूरी पुस्तिका यहां उपलब्‍ध है। यहां इसके सभी लेखों के लिंक दिये जा रहे हैं ताकि इसे क्रमवार पढने में पढने में सुविधा हो)
लेखों के लिंक
  1. बाढ की जाति - प्रमोद रंजन
  2. बाढ है, मजाक नही- सत्‍यकाम
  3. सरकारी मिशनरी में उत्‍साह नहीं- मेधा पाटकर से बातचीत
  4. बयानों की बाढ- 19 अगस्‍त से 8 सितंबर,08 के बीच राजनीतिक दलों के बयान

7. सुधरो नीतीश कुमार- सत्‍यकाम

11 सितंबर को अमेरिका में हवाई हमले में लगभग ५ हजार लोग मारे गये थे. आज भी उनकी याद में मोमबत्तियां जलाई जाती हैं. भारतीय मीडिया भी इन तस्वीरों को प्रसारित करता है. क्या १८ अगस्त की याद में, जिसमें ५० हजार लोग मारे गये, भी मोमबत्तियां जलाई जाएंगी? क्या यह देश इसे एक काले दिन की तरह याद करेगा? उत्तर है-नहीं. कारण; हम-आप सब जानते हैं.

सुधरो नीतीश कुमार

-सत्‍यकाम

आज से ठीक दस साल पहले अगस्त 1999 में जब गाइसल में टेन हादसा हुआ था, तब के रेल मंत्री नीतीश कुमार ने नैतिकता की दुहाई देकर मंत्री पद से इस्तीफा कर दिया था. उस वक्त केंद्र में-एक ऐसी सरकार थी, जिसने विश्‍वास मत खो दिया था. और जिसके मुखिया राष्‍ट्रपति को इस्तीफा सौंप चुके थे. चुनाव संपन्न होने और नयी सरकार के गठन तक-जैसी परंपरा है-राष्‍ट्रपति ने वाजपेयी जी को सरकार में रहने को कहा था. ऐसी सरकार कामकाजी सरकार कही जाती है, और इससे इस्तीफा देने का कोई मतलब नहीं होता. मुहावरे में इसे उंगली खुरच कर शहादत देना कहा जा सकता है.यह नौटंकी नीतीश कुमार ने की थी. उस पर तुर्रा यह था कि मैं पिछड़ी जाति का हूं, इसलिए मेरे त्याग को नहीं समझा गया. वे अपनों के बीच फुनफुनाते थे कि मैं यदि उंची जाति का होता तो मुझ पर संपादकीय लिखे जाते. नीतीश कुमार ऐसी आत्ममुग्धता में अक्सर डूबे होते हैं. वे खुद परीक्षार्थी और खुद ही परीक्षक होते हैं. पिछले तीन साल से अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड खुद जारी कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं.


लेकिन अबकी इस बाढ़ अथवा जलप्लावन ने उनकी ऐसी की तैसी कर दी है. जाने अब उनकी नैतिकता इस्तीफा की सिफारिश कर रही है या नहीं. गाइसल में पटरी टूटी थी, किसी शरारत के कारण. अबकी तटबंध टूटा है, सरकार की गैर जबावदेही के कारण. तब कुछ सौ लोग तबाह हुए थे, अबकि लाखों लोग तबाह हुए हैं.


मैं नहीं जानता नीतीश कुमार के मन में इस्तीफा की बात उठ रही है या नहीं. विपक्ष चाहेगा कि वो इस्तीफा कर दें ताकि उनके लिए मार्ग प्रशस्‍त हो जाए. ऐसी बाढ़ देख कर उनके हाथों में खुजली हो रही होगी. लेकिन इन पंक्तियों का लेखक ऐसा नहीं चाहेगा. नीतीश कुमार को ऐसी बातें मन से निकाल देनी चाहिए और राजधर्म का पालन करना चाहिए.


लेकिन काश नीतीश कुमार राजधर्म का पालन करते. जिस मंसूबे से राज्य की जनता उन्हें सरकार में लायी थी-उसके मंसूबों पर पानी फेर रहे हैं नीतीश कुमार. उन्हें फुरसत निकाल कर अपनी स्थिति का आकलन करना चाहिए.


यह बाढ़, जिसे नीतीश कुमार प्रलय कह रहे हैं, की स्थिति क्या एक दिन में बनी है-अचानक बनी है? नहीं! यह हादसा नहीं है. यह राज्य सरकार की नाकामियों का कुफल है. इसे मुख्यमंत्री स्वीकारें. नहीं स्वीकारेंगे तो इसका निराकरण भी नहीं कर पायेंगे.


जरा देखिए कि तटबंध जब दरकनें ले रहा था तो नीतीश कुमार और उनके लोग क्या कर रहे थे. इनके दो प्रिय पालतू इस दरम्यान एक केंद्रीय मंत्री की जमीन-जायदाद की नाप-जोख कर रहे थे. मुख्यमंत्री का पूरा सचिवालय उनके लिए मीडिया-मसाला तैयार करने में लगा था. पखवारे भर के उन भाषणों के क्लीप देखिए जिसे नीतीश कुमार धुंआधार दे रहे थे. वे लालू को जीरो पर आउट कर रहे थे. पूरे बिहार में उनकी ध्वजा फहरा रही थी. उनके चापलूस उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा रहे थे. पता नहीं क्या-क्या बना रहे थे.


बांध 18 तारीख को टूटता है. नीतीश की खुमारी 24 तारीख को टूटती है. चिल्लाते हैं- जा रे, यह तो प्रलय है. नीतीश कुमार ! देखा! चपलूसों ने आपको कहां पहुंचा दिया. छोड़िये प्रधानमंत्री की कुर्सी. मुख्यमंत्री की कुर्सी तो बचाइये. और छोडिये मुख्यमंत्री-तंत्री की कुर्सी-अपने ही आत्मधिक्कार के दलदल से तो खुद को निकालिए. हजारों लोग बाढ़ से निकल कर सुरक्षित स्थानों पर आ रहे हैं. आप भी उस जानलेवा बाढ़ से निकलिये जिसमें गरदन तक डूब चुके हैं. आपके इर्द-गिर्द सांप-बिच्छुओं और लाशों का ढेर लग गया है. इनके बीच से निकलिये. केवल जनता को ही मत बचाइये-खुद भी बचिये.


तरस आती है नीतीश कुमार आप पर. जिस अरमान से जनता आपको लायी थी, उसके अरमानों को चूर-चूर कर दिया. दुनिया भर के लंपट, चापलूस अपने इर्द-गिर्द जुटा लिये. कोई मुकदमेबाज है तो कोई छूरेबाज, कोई जालसाज है तो कोई कोयला-किरासन माफिया. ऐसे ही लोग आपके चरगट्टे के स्थायी सदस्य हैं. इनके साथ ही रोज आपका उठना-बैठना होता है. आपका मंत्रीपरिषद संदिग्ध आचरण वालों का जमावड़ा है. सबसे नालायक अधिकारियों को आपने अपने इर्द-गिर्द जमा कर रखा है. क्योंकि अफसर चुनने में जाति आपकी कसौटी होती है. नवंबर आ रहा है और आप फिर रिपोर्ट कार्ड जारी कीजिएगा. आप से मेरा निवेदन होगा कि एक बार ईमानदार भाव से लालू के तीन साल से अपने इस तीन साल को तौलिये. वह आदमी, जिसे प्रायः नॉन सीरियस और जोकर तक कहा गया, बिहार के मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठने के तीसरे साल में गरीबों-पिछड़ों का मसीहा बन गया था. उनका पतन तो तब शुरू हुआ जब दंभ उन पर हावी हो गया और अपने काबिल साथियों को नजरअंदाज कर वो चापलूस और लंपट तत्वों से घिरने लगे. लेकिन आपने तो मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठते ही चापलूसों और लंपटों के हाथों अपने को सौंप दिया. और इसका नतीजा है कि एक नायक वाली आपकी जो छवि मुख्यमंत्री पद पाते वक्त थी वह आज कुसहा बांध की तरह ध्वस्त हो चुकी है. लेकिन इतने पर भी बिहार की जनता आप से नाउम्मीद नहीं हुई है. वह आपसे आज भी-अब भी उम्मीद करेगी कि चपंडुकों के चरगट्टे से आप बाहर निकलेंगे और अपने हृदय पर हाथ रख कर अपनी ही धड़कनों को सुनेंगे. यदि ऐसा आपने किया तो विश्‍वास मानिये, हर धड़कन से यही स्वर उभरेगा-सुधरो नीतीश कुमार, सुधरो. खुदा के लिए सुधरो. बिहार के लिए सुधरो.

13 October, 2008

बयानों की बाढ़

18 अगस्त को नेपाल में कुशहा के पास तटबंध टूटते ही बिहार के सैकड़ों सीमावर्ती गांव तबाह हो गये हजारों लोग मारे गये. लगभग एक पखबाड़े तक पानी रोज नए-नए इलाकों को डूबोता गंगा की ओर बढ़ता रहा. 19 से 30 अगस्त के बीच जानमाल का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ.
आइए जानें, तबाही के इन दिनों में व उसके बाद बिहार के प्रमुख राजनीतिक दल क्या कह रहे थे.

19 अगस्त
नेपाल पर आरोप
विजेंद्र यादव, जल संसाधन मंत्री
बिहार के जल संसाधन मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि नेपाल के अधिकारियों के असहयोगात्मक रवैये के कारण तटबंध टूटा है. यह अंतराष्‍ट्रीय मसला है. भारत सरकार को ही नेपाल से बात करनी चाहिए. फिर भी बिहार सरकार तटबंध कटाव स्थल को पाटने की हर संभव कदम उठा रही है. (दैनिक हिंदुस्तान)

20 अगस्त
नौकरियों को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी
ललन सिंह, प्रदेश अध्यक्ष जदयू
ललन सिंह ने लालू प्रसाद द्वारा नौकरी देने के मामले में नया पिटारा खोलने का ऐलान किया और कहा कि कैसे डीए मामले में पक्ष में गवाही देने वालों को भी नौकरी देकर उपकृत किया गया इसका प्रमाण मीडिया के समक्ष पेश करेंगे. उन्होंने कहा कि जदयू जमीन लिखवाकर रेलवे में नौकरी देने की बात पर अब तक अपनी जगह कायम है.(दैनिक हिंदुस्तान)

श्‍याम रजक व शकील अहमद खां, प्रवक्ता राजद
राजद के राष्‍ट्रीय प्रवक्ता द्ययाम रजक व प्रदेष मुख्य प्रवक्ता शकील अहमद खां ने राजद की ओर से नीतीश कुमार के रेलमंत्रीत्व काल में रेलवे में हुई 231 नियुक्तियों की सूची जारी करते हुए कहा कि नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में अपने संसदीय क्षेत्र के एक खास वर्ग के लोगों को और जद यू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह के चहेतों को रेलवे में नौकरी दी. (दैनिक हिंदुस्तान)

नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री बिहार
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कार्यकर्ताओं को संकल्प दिलाया कि लोकसभा चुनाव में राजद को जीरो पर आउट कर दिया जाएगा. वह मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में सहरसा, मधेपुरा और दरभंगा जिला के कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे.

21 अगस्त
देर आये, तब भी दुरुस्त नहीं
राबड़ी देवी, नेता प्रतिपक्ष
प्रतिपक्ष की नेता राबड़ी देवी ने कहा कि नेपाल स्थित कुसहा के पास कोसी तटबंध टूटने के बाद भीमनगर बराज के सभी फाटक खोल दिये गये जिससे हजरों लोग बह गये. बराज का फाटक खोलने से पहले लोगों को सूचना तक नहीं दी गयी. अगर सरकार सजग रहती तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता था और हजारों लोग मौत के मुंह में जाने से बच सकते थे.उन्होंने बाढ़ से प्रभावित जिलों को सेना के हवाले करने और सेना से राहत कार्य चलाने मांग की. (दैनिक हिंदुस्तान)

( तथ्य यह है कि भीमनगर बराज से काफी पहले नेपाल में स्थित कुसहा के पास तटबंध टूटा है. जहां से तटबंध टूटा है वहां कोसी की नयी धार बन गयी है. इसी से होकर कोसी का लगभग 80 फीसदी पानी बह रहा है. कोसी अंचल के हजारों लोगों की मौत बराज से पानी छोड़ने से नहीं बल्कि तटबंध टूटने से हुई थी. राबड़ी देवी के इस बयान को आधार बना कर जलसंसाधन मंत्री विजेंद्र यादव ने अगले दिन कहा कि राबड़ी देवी को बिहार के भूगोल का ज्ञान नही है. आगे चलकर राजद की ओर से पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद ने मोर्चा संभाला तो उन्होंने भी शुरूआत एक उलझे हुए बयान (प्रभात खबर, 23 अगस्त) से की, जिस कारण उनके सवालों का कोई उत्तर न होने के बावजूद सत्ता पक्ष उन्हें पहले बयान के आधार पर आड़े हाथों लेता रहा.।)

22 अगस्त
जयप्रकाश -विजेंद्र आमने सामने
राजद के वरिष्‍ठ नेता व केंद्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद हा कि नेपाल स्थित कोसी तटबंध टूटने से प्रलय की स्थिति है. उन्होंने कहा कि केंद्र के अनवरत निर्देश के बावजूद कार्यों की कोई जानकारी नहीं दी गयी. कोसी तटबंध की मरम्मत के लिए राशि केंद्र सरकार देती है.राशि खत्म भी नहीं हुई, काम भी नहीं हुआ और कहा गया कि कार्य पूरा हो गया है.
श्री यादव के आरोपों का जबाव देते हुए बिहार के जल संसाधन मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री को अंतररष्‍ट्रीय कानून का ज्ञान नहीं है. नेपाल क्षेत्र में कोसी का तटबंध टूटा नहीं बल्कि कटाव हुआ है. केंद्रीय मंत्री को किस हैसियत से नेपाल क्षेत्र में तटबंध कटाव की सूचना दी जाती. क्या इनका वहां के दूतावास पर नियंत्रण है?(दैनिक जागरण)

22, 23, 24 व 25 अगस्त
नौकरी मामले में एक-दसरे को बदनाम करने की होड़
श्‍याम रजक व शकील अहमद खां, अखिलेश्‍ा सिंह (राजद)
ललन व शिवानंद तिवारी (जदयू)

22 अगस्त : जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह व राष्‍ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने संवाददाता सम्मेलन में ऐसे चार लोगों की विवरणी पेश की जिन्हें डीए मामले में रेलवे में नौकरी मिली. उन्होंने कहा कि पार्टी इन सब मामलों को लेकर 23 अगस्त को प्रधानमंत्री से मुलाकात करेगी और उनके समक्ष दस्तावेज प्रस्तुत करेगी.

22 अगस्त : राजद के राष्‍ट्रीय प्रवक्ता श्‍याम रजक ने कहा है कि जदयू के नेता डिरेल्ड हो गये हैं इसलिए रेल मंत्री लालू प्रसाद पर आरोप लगा रहे हैं. श्री प्रसाद अदालत में गवाही के बाद रेल मंत्री बने थे लिहाजा यह कहना पूरी तरह गलत है कि किसी को गवाही के बदले रेलवे में नौकरी की पेशकश की गयी.

23 अगस्त : राजद नेता व केंद्रीय मंत्री डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह, राष्‍ट्रीय महासचिव सह प्रवक्ता श्‍याम रजक, राज्य प्रवक्ता शकील अहमद खां एवं महासचिव निहोरा प्रसाद यादव ने आरोपों का दूसरा ऐपिसोड जारी करते हुए नीतीष कुमार पर रेलवे के ग्रुप-सी के पद पर नियुक्ति में हेरा-फेरी का आरोप लगाते हुए नौकरी पाये नालंदा एवं बेगुसराय संसदीय क्षेत्र के 100 से ज्यादा लोगों का नाम पेश किया. उन्होंने कहा राजद का प्रतिनिधिमंडल जल्दी ही प्रधानमंत्री से मिलकर मामले की जांच सीबीआई से करवाने की मांग करेगा.

23 अगस्त : जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह ने राजद द्वारा प्रधानमंत्री से जांच की मांग को हास्यास्पद बताते हुए कहा कि लालू प्रसाद जानते हैं कि जांच में कुछ नहीं मिलने वाला इसलिए वे खुद जांच से कतरा रहे हैं, सिर्फ बयान देकर काम चला रहे हैं.

24 अगस्त : जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा है कि रेलवे भर्ती मामले में राजद ने बेगुसराय, नालंदा और बाढ़ के लोगों की मेधा पर सवाल उठाया है. परोक्ष रूप से दो खास समुदायों के लोगों की मेहनत, श्रम और अध्ययन साधना पर सवाल खड़ा किया गया है. उन्होंने राजद के इस कृत्य की भर्त्सना की. (दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिंदुस्तान)

24 अगस्त (प्रधानमंत्री से राजग नेताओं की मुलाकात) : राजग का एक प्रतिनिधिमंडल ने द्यानिवार (23 अगस्त) को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भेंट कर जमीन के बदले नौकरी के कथित घोटाले के मामले में रेलमंत्री लालू प्रसाद को तुरंत बर्खास्त कर उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की. जदयू के अध्यक्ष शरद यादव, भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी की अगुवाई में प्रधानमंत्री से मिला और उसने श्री यादव व उनके परिवार वालों के खिलाफ जमीन के बदले नौकरी घोटाले से जुड़े दस्तावेज और ज्ञापन दिया. 25 मिनट की इस मुलाकात के बाद श्री नकवी ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री इन दस्तावेजों के बावजूद रेल मंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते हैं तो यही माना जाएगा कि उनकी मूक सहमति है. (दैनिक हिंदुस्तान)

24 अगस्त : रेल मंत्री लालू प्रसाद ने एनडीए के जमीन के बदले नौकरी देने के आरोपों को नीचता की हद बताते हुए विद्वेष व प्रतिशोध की भावना किया हुआ काम करार दिया. श्री प्रसाद ने कहा कि यह एनडीए की विदाई का समय है. (दैनिक हिन्‍दुस्‍तान)

25 अगस्त
यह प्रलय है, पीड़ितों के परिजन आगे आएं !
नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री बिहार सरकार
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रविवार (24 अगस्त) को बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों के हवाई सर्वेक्षण के बाद खुद स्वीकार किया कि बाढ़ नहीं प्रलय की चेतावनी है. मुख्यमंत्री ने लोगों से सचेत रहने को कहा. उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री से भी बाढ़ की विभीषिका व तबाही पर चर्चा करेंगे. पटना एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया कि सरकार हर स्तर पर गंभीर है और स्थिति सामान्य होने तक राहत कार्य चलता रहेगा. उन्होंने गैर सरकारी संगठनों से भी मदद मांगी. इसके अलावा लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए पीड़ित परिवार के परिजनों को आगे आने की अपील की. (दैनिक हिंदुस्तान, पृष्‍ठ सं.-1 व 2)

26 अगस्त
नेपाल में भी करेंगे राहत कार्य
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि वे नेपाल में भी राहत कार्य चलाने को तैयार हैं. सोमवार को पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कें अगर यह जिम्मेवारी उन्हें देगा तो वे बखूबी उसपर अमल करेंगे. मुख्यमंत्री ने कहा कि राहत और बचाव कार्यों को सीमा या राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। इस समय हम सभी को मिलकर राहत कार्य चलाना है, लोगों की मदद करनी है. कोसी नदी द्वारा फैलाई गई तबाही का दंश बिहार के साथ-साथ नेपाल में भी लोग भुगत रहे हैं. लिहाजा बिहार हर तरह की जिम्मेवारी उठाने को तैयार है. (दैनिक हिंदुस्तान)

पूर्व जल संसाधन मंत्री के सवालों पर भिड़ंत

धारा बदलने से आयी बाढ़ : जगदानन्द
राजद के वरिष्‍ठ नेता व पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानन्द ने कोसी तटबंध के टूटने से आई बाढ़ पर राजनीति न करने की सलाह पक्ष और विपक्ष को दी है. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में कोई राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ तो इससे नेपाल को राजनीतिक ताकत मिल जाएगी. पूर्व मंत्री ने कहा कि कुसहा में बांध टूटा नहीं है बल्कि यह बाढ़ कोसी की धारा बदलने का परिणाम है. (23 अगस्त, 08, प्रभात खबर)

निजी दुश्‍मनी से आयी बाढ़
पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानन्द ने बांध टूटने का कारण गिनाते हुए कहा कि मुख्मंत्री ने निजी दुश्‍मनी दिखाते हुए मधेपुरा, सुपौल, सहरसा, अररिया एवं पूर्णिया जिले को इस हाल में पहुंचा दिया है. उन्होंने विदेष मंत्री प्रणव मुखर्जी का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम 21 अगस्त को लिखा पत्र भी सार्वजनिक किया. श्री सिंह ने सिंचाई विभाग की बाढ़ बुलेटिन जारी करते हुए कहा कि 17 अगस्त तक विभाग बताता रहा कि सभी तटबंध सुरक्षित हैं. 18 को दोपहर में तटबंध टूटने के बाद कहा गया कि तटबंध के 12.10 एवं 12.90 किमी. के स्परों पर कई दिनों से नदी का कटाव हो रहा था. फलस्वरूप 400 मी. की लंबाई में तटबंध क्षतिग्रस्त हो गया है जिससे नेपाली भूभाग एवं वीरपुर में बाढ़ का पानी प्रवेष कर रहा है. उन्होंने नीतीष कुमार से सवाल किया कि सिंचाई विभाग का लाइजनिंग ऑफिसर का स्थाई कार्यालय काठमांडू में है, उसने बांध मरम्मत को लेकर नेपाल स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क क्यों नहीं किया? (30 अगस्त, दैनिक हिंदुस्तान)

नदारद थे अभियंता
पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानन्द ने कहा कि बांध तोड़ने के लिए सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार जिम्मेवार हैं और उनमें गैरत है तो शीघ्र गददी छोड़ें. अपनी ताकत का अहसास कराने और नरमेघ करने के लिए नीतीश कुमार ने बांध तोड़ा है. उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा यह कहकर लोगों को बरगलाया जा रहा है कि कोसी उच्चस्तरीय कमेटि केन् की कमेटि है. दरअसल बिहार सरकार द्वारा गठित इस कमेटि में राज्य और केन् के विषेच्चज्ञों की अध्यक्षता केन्‍द्रीय बाढ़ नियंत्रण आयोग का अध्यक्ष करता है. उन्होंने अक्टूबर 2007 में आयोजित इस कमेटि की बैठक की कॉपी पेश करते हुए कहा कि इस बैठक में सूबे के जलसंसाधन विभाग के अभियंता प्रमुख समेत एक को छोड़कर सभी मुख्य अभियंता नदारद थे. इससे अहसास लग सकता है कि कोसी बांध की सुरक्षा को लेकर नीतीश कुमार कितने गंभीर थे. (31 अगस्त, 08, दैनिक हिंदुस्तान)

केंद्र ने नहीं की कार्रवाई : विजेंद्र यादव
जलसंसाधन मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा है कि तटबंध मरम्मत से बचाव कार्यों तक में केंद्र के असहयोग के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई. जहां तटबंध की मरम्मत के लिए केंद्रीय कमिटी ने मामूली रकम स्वीकृत की, वहीं कटाव शुरू होने के बाद केंद्रीय एजेंसियों से बार-बार गुहार लगाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. कोसी का तटबंध अंतरराष्‍ट्रीय मसला होने के कारण केंद्र के अधीन है तटबंध का कटाव निरोधक कार्य कोसी उच्चस्तरीय कमेटि द्वारा अनुशं‍सित होता है. इसके अध्यक्ष केंद्र सरकार के अधिकारी होते हैं. राज्य उन अनुसंशाओं के अनुरूप काम करवाने को बाध्य हैं. जहां तटबंध कटा है वहां कमेटि ने महज 1.25 लाख रुपये के कार्यों की ही अनुसंशा की. यह कार्य 15 जून के पूर्व करा लिया गया और इसे 18 जूलाई की बैठक में केंद्रीय मंत्री जयप्रकाष नारायण यादव ने भी स्वीकारा कि निर्धारित काम पूरा हुआ है. अगर केंद्रीय जलसंसाधन मंत्रालय को राज्य सरकार द्वारा कटाव निरोध कार्य से संतुष्टि नहीं थी तो उसने अपने स्तर से ही नेपाल के हिस्से के कार्यों का कार्यान्वयन क्यों नहीं करवाया? (31 अगस्त, 08, दैनिक हिंदुस्तान)

राजद को कैसे मिला पत्र?
जदयू के प्रदेष अध्यक्ष ललन सिंह एवं सिंचाई मंत्री विजेन् प्रसाद यादव ने कहा है कि कोसी तटबंध टूटने की निच्च्पक्ष जांच कराने पर कें ही कटघरे में खड़ा होगा. श्री सिंह ने पूछा कि विदेष मंत्री प्रणव मुखर्जी का पत्र राजद के पास कैसे पहुंच गया? उन्होंने कहा कि जगदानन्द अज्ञानी की तरह बात कर रहे हैं. उनके द्याासनकाल में 2004 में बिहार के सारे तटबंध टूट गए थे. वे कैसे टूटे? दूसरी ओर जदयू के प्रवघ षिवानंद तिवारी ने कहा है कि लालू प्रसाद जब भी राहत कार्य में जुटते हैं, घोटाला हो जाता है. उन्होंने कहा कि रेलवे के 90 करोड़ रुपये लेकर जो राहत कार्य वे करना चाहते हैं उसे मुख्यमंत्री राहत कोच्च में जमा करवा दें. उन्होंने पूर्व सिंचाई मंत्री जगदानन्द पर बरसते हुए कहा कि वे सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के महारथी हैं. अपने पहले बयान में कहा कि तटबंध की टूट मानवीय भूल नहीं है बल्कि परिस्थितियों की देन है. इससे लड़ने के लिए सामूहिक प्रयास होने चाहिए न कि राजनीति. अचानक अब पलटी मार कर कह रहे हैं कि बांध नीतीष कुमार ने तोड़ा है. (1 सितंबर, 08, दैनिक हिंदुस्तान)

भाई की पीड़ा से हुई बेचैनी : शिवानंद
जदयू के राष्‍ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने रेल मंत्री लालू प्रसाद की बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सक्रियता पर सवाल करते हुए कहा कि पिछले साल आयी बाढ़ के दौरान वे कहां थे? लोग कह रहे हैं कि ' भाई का दर्द भाई ही समझता है'. भाई की पीड़ा ने उन्हें इतना संवेदनशील बना दिया है कि वे उनके बीच कूद पड़े हैं. (2 सितंबर, 08, दैनिक जागरण)

नीतीश के अहंकार ने डूबोया : लालू
रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि नीतीश कुमार ने अपने अहंकार में पूरे बिहार को डूबो दिया. उन्होंने कहा कि कोसी के प्रलय के लिए नीतीश सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं. यह ि‍‍क्रमनल ऐक्ट है. सी.एम. होके छोटी बात करते हैं. कहते हैं-'चुनाव के चलते राहत बंटवाया जा रहा है.' ' भाई का दर्द भाई ने जाना.' पटना में बैठ के कंप्यूटर से राहत संभव नहीं. सरकार में बैठे लोगों का दिमाग खराब हो गया है. कह रहे हैं ' राहत रेल' को पटना नहीं आने देंगे. बाल ठाकरे की तरह बयान दे रहे हैं कि पटना में ि‍शि‍वर नहीं है. (3 सितंबर, 08, दैनिक हिंदुस्तान)

बहस नहीं करना है : नीतीश
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि उनको किसी के साथ बहस में शामिल नहीं होना है. उनको तो बस बाढ़ पीड़ितों के लिए काम करना है. रेलमंत्री लालू प्रसाद द्वारा उठाये जा रहे सवालों के बाबत उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को आदत है 48 घंटे घूमकर 48 बार मीडिया से बात करने की. 3 साल पहले जनता ने उनको ऐसा उखाड़ कर फेंका है कि वह इसे पचा नहीं पा रहे हैं. बाढ़ पीड़ितों द्वारा घर छोड़कर भागने की तुलना देश के बंटवारे से किये जाने से नाराज श्री कुमार ने कहा कि इससे बड़ी नासमझी क्या हो सकती है? पूर्णिया के चूनापूर हवाई अड्डे पर मुख्यमंत्री ने लालू प्रसाद के दौरे को ड्रामेबाजी की संज्ञा दी. (3 सितंबर, 08, दैनिक हिंदुस्तान)

इन्ही की करनी से टूटा तटबंध : मोदी
उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने राजद और कांग्रेस पर जमकर निशाना साधते हुए कहा कि इन्हीं दलों की करनी से कोसी का तटबंध टूटा है. उन्होंने तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि आज भी कोसी तटबंध की वही स्थिति है जो 1991 में थी लेकिन राजद और कांग्रेस की हुकूमत ने इस पर ध्यान नहीं दिया. श्री मोदी ने तत्कालीन सिंचाई मंत्री जगदानंद सिंह को ईमानदार और सक्षम तो माना लेकिन यह भी कहा कि वे जबान के अच्छे नहीं हैं.
(6 सितंबर, 08, दैनिक हिंदुस्तान)

काठमांडू कार्यालय को नहीं मिला पैसा : जगदानन्द
पूर्व जल संसाधन मंत्री राजद नेता जगदानन्द ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर बरसते हुए कहा कि जनता के बीच भ्रम उत्पन्न करने के लिए कुसहा के समीप कोसी तटबंध के 12.90 किमी. टुटान की चर्चा नहीं कर इधर-उधर की पुरानी कहानी सुनायी जा रही है. सरकार जिस काठमांडू स्थित जल संसाधन विभाग के लिए संपर्क अधिकारी के माध्यम से सूचना देने की बात करती है वह कार्यालय ही आवंटन के अभाव में बंद है. उन्होंने कहा कि तटबंध को लेकर सरकार का तर्क है कि नेपाल क्षेत्र में कार्य नहीं करने दिया गया जबकि वह खुद मानती है कि जून में सभी कार्य पूरे कर लिए गए. आखिर ऐसी कौन स्थिति उत्पन्न हो गयी कि मात्र 5 अगस्त से ही रहे कटाव रोकने के कार्य में ही व्यवधान उत्पन्न हो गया. एकमात्र जल संसाधन विभाग ही ऐसा विभाग है जिसने अंतराष्‍ट्रीय मामलों के लिए काठमांडू में कार्यालय खोल रखा है. इसको वर्तमान सरकार ने बंद करवा दिया है. कार्यालय व्यय व कर्मियों के वेतन भुगतान आदि के लिए सरकार ने आवंटन बंद कर दिया है. इसको प्राप्त करने को संपर्क पदाधिकारी अरुण कुमार 14 व 15 को सिंचाई भवन मुख्यालय पहुंचे थे. इनको अब छुट्टी पर दिखाया जा रहा है. सरकार बताये कि ऐसी ि‍वषम परिस्थिति में किस आधार पर छुट्टी मंजूर की गयी. संपर्क कार्यालय का फैक्स व फोन भी भुगतान नहीं होने के कारण बंद है. उन्होंने कहा कि सरकार बताये कि किस परिस्थिति में संपर्क पदाधिकारी मुख्यालय में मौजूद थे. उन्होंने कहा कि वीरपुर के तत्कालीन मुख्य अभियंता सत्यनारायण ने तो मुख्यालय सहित सात स्थानों पर स्थिति की सूचना दी किंतु उस पर ध्यान नहीं दिया गया. उनका पत्र ही असलियत को सामने रख रहा है. जनता को मालूम हो गया कि सरकार सोयी रही व मामले को अभियंताओं पर छोड़ दिया. उन्होंने कहा कि विभाग के वीरपुर स्थिति हवाई अड्डे का भी कटाव रोकने को कभी उपयोग नहीं किया गया. (8 सितंबर, 08, दैनिक जागरण)

(कुछ छूट गए प्रसंग : तबाही के इन दिनों में ही राज्य सरकार ने राकंपा के प्रदेष अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का मकान खाली करवाया. राजनीतिक बवाल खड़ा होने पर कई दिनों तक राज्य सरकार के मंत्री समेत जदयू के अनेक वरीय नेता इस पर प्रेस कांफ्रेंस करते रहे. लोजपा के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने बाढ़ के मुददे पर राजनीतिक बयानबाजी से लगभग परहेज रखा. माले बाढ़ के शुरूआती दिनों में राज्य व केंद्र सरकार की 'साम्राज्यवादपरस्ती' के खिलाफ जेल भरती रही. माकपा और भाकपा ने बयानबाजी को लेकर खास उत्साह नहीं दिखाया.)

04 October, 2008

इंजीनियर सत्यनारायण ने दी थी चेतावनी


-प्रभात कुमार शांडिल्‍य

कोसी को फिर से भीमनगर बराज में कैद कर रखना, टूटे एफ्‌लक्स बांध की मरम्मत करना तथा इसके द्वारा एक पखवारे में किये गये विध्वंस की भरपाई अगले ५० वर्च्चों में संभव नहीं लगती. बाढ़ का पानी उतरने पर स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि आजादी के ६० वर्षों में जो भी निर्माण कार्य हुआ था, उसे अब पुनर्जीवित करना कितना दुष्‍कर कार्य है.

इस त्रासदी को किसी ने प्रलय, किसी ने सामूहिक नरसंहार, किसी ने जबरिया जलसमाधि की संज्ञा दी है. किसी ने षडयंत्र का परिणाम, किसी ने अधिकारियों का निकम्मेपन, किसी ने नेता-अधिकारी-अभियंता-ठेकेदार गठजोड़ के प्रभावी हो जाने का परिणाम बताया है. इधर जो तथ्य सामने में आए हैं. उनसे यह स्‍पष्‍ट हो रहा है कि सरकारी तंत्र के निकम्मेपन के कारण कोसी ने बिहारवासियों पर यह कहर ढाया है.

बिहार सरकार के मुख्य अभियंता सत्यनारायण भीमनगर बैराज के नजदीक वीरपुर स्थित कोसी बहुउददेश्‍यीय परियोजना मुख्यालय में पदस्थापित थे. उन्होंने ९ अगस्त,२००८ को ही यह सूचना भेजी थी कि नेपाल में कुसहा के पास एफ्‌लक्स बांध में तेजी से कटाव हो रहा है और त्वरित कार्रवाई नहीं की गयी तो बांध पर टूट का खतरा है, जिसके भयावह परिणाम होंगे. उन्होंने यह त्राहिमाम पत्र, फैक्स एवं बेतार संवाद के तौर पर काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास में पदास्थापित कोसी परियोजना के बिहार सरकार के लायजन अधिकारी अरुण सिंह को संदेश भेजा. इसी तरह का संदेश बिहार के जल संसाधन विभाग के सचिव सहित कुल ११ अधिकारियों को भेजा, किंतु सब चुपचाप बैठे रहे और बिहार सरकार का जल संसाधन विभाग १७ अगस्त तक प्रतिदिन प्रेस विज्ञप्ति जारी करता रहा कि राज्य भर के सभी बांध, बैराज और तटबंध पूरी तरह सुरक्षित हैं.

इंजीनियर सत्यनारायण ने त्राहिमाम संदेश में यह कहा था कि कुसहा के बनटप्पू इलाके में जो नेपाल के सुनसरी जिला का भाग है, नदी एफ्‌लक्स बांध को भयानक रूप से काट रही है और नेपाल के कस्टम विभाग के अधिकारी भारत की ओर से जा रही निर्माण सामग्री से भरे वाहनों को बेवजह काफी देर तक रोक रहे हैं, जिससे मरम्मत संभव नहीं हो पा रही है. साथ ही यह भी शिकायत की थी कि स्थानीय मजदूरों को कटाव में मरम्मत में लगने से रोका और भगाया जा रहा है. इसलिए इसमें भारत और नेपाल सरकार के उच्चाधिकारियों का तत्काल हस्तक्षेप आवश्‍यक है, ताकि एफ्‌लक्स को टूटने से बचाया जा सके. काठमांडू स्थित लायजन अफसर अरुण कुमार सिंह से अपेक्षित था कि वे काठमांडू में भारतीय राजदूत तथा नेपाल के विदेश मंत्री मंत्रालय को इन तथ्यों से अवगत कराते, किंतु राज्य सरकार बता रही है कि अरुण कुमार सिंह १८ अगस्त तक छुट्टी पर थे और इन त्राहिमाम संदेषों की सुधी लेने वाला कोई नहीं था. सत्यनारायण ने १४ और १५ अगस्त को भी त्राहिमाम संदेश दोहराया, तिहराया था. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

इसी कड़ी में काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के आधिकारिक प्रवक्ता गोपाल वागले ने कहा है कि भारतीय दूतावास को बाढ़ की आशंका की जानकारी १७ अगस्त को फैक्स से मिली. वागले और अरुण सिंह, दोनों सत्यनारायण से संदेश मिलने की बात से इंकार करते हैं. इधर सूचना मिली है कि इंजीनियर सत्यनारायण को बतौर सजा डिमोट कर दिया गया है. यह भी जानकारी मिली है कि कोसी परियोजना के एक सहायक अभियंता वीरपुर स्थित अपने कार्यालय में बैठ कर कनीय अभियंता और लेखपाल के साथ मापी पुस्तिका एवं अन्य अभिलेखों में हेराफेरी करने में १७ अगस्त को मशगूल थे तथा एक प्राइवेट जीप पर कार्यालय से आवास और बाजार की सैर कर रहे थे. सभी अभियंता कोसी परियोजना कॉलोनी, वीरपुर में आराम करते रहे. किसी ने वास्तविक कार्यस्थल पर जाने की जहमत नहीं उठायी. स्थानीय नेपाली मजदूर बतलाते हैं कि भारतीय ठेकेदार सरकार से ८९ भारतीय रुपये पाते हैं, मजदूरी के मद में और नेपाली मजदूरों से २० रुपये में मजदूरी करवाना चाहते हैं. इसलिए नेपाली मजदूर काम करने को तैयार नहीं हैं. ठेकेदारों और अभियंताओं को मारपीट कर भगाने की बात से वे इंकार करते हैं और कहते हैं कि उनलोगों ने नहीं, उनलोगों के साथ भारतीय अभियंताओं और ठेकेदारों ने बुरा बरताव किया है. लोग मानते हैं कि यह सब नेता-इंजीनियर-ठेकेदार व अफसर गिरोह की करतूत है. इस आशय की खबरें नेपाली के एक प्रमुख दैनिक कांतिपुर टाइम्स में छपी हैं.

राज्य सभा के सदस्य व साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक जाबिर हुसेन इस पूरे प्रकरण पर कहते हैं कि कोसी की तबाही से जुड़े जो तथ्य प्रकाश में आये हैं, उनसे लगता है कि राज्य के प्रशासन तंत्र में इस विकराल स्थिति से निपटने का सामर्थ्य नहीं बचा है. ऐसी स्थिति में केंद्रीय सरकार को राष्‍ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार अधिनियम के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए बचाव एवं राहत की और अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए. साथ ही उन्हें अपनी टीम को अगले कुछ महीने तक प्रभावित इलाकों में ठहर कर काम करने का निर्देश देना चाहिए।

02 October, 2008

सरकारी मिशनरी में उत्साह नहीं

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने लगभग १० दिनों तक बिहार के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया. इस दौरान ३ सितंबर को उनसे एक समाचारपत्र के लिए यह छोटी सी बातचीत की गयी :


- क्या आपको लगता है कि राज्य सरकार राहत कार्यों में विफल हुई है?

मेधा : जो काम हुआ है वह बहुत कम है. आपसी तालमेल, विभिन्न सरकार एजेंसियों के राहत कार्यों में तालमेल का अभाव साफ दिखता है. मैनेजमेंट की कमी है. प्रशासनिक अधिकारियों में राहत कार्यों को लेकर उत्साह नहीं है. न पानी में फंसे लोगों को निकालने में तत्परता दिखायी पड़ती है, न ही राहत सामग्रियों को पहुंचाने में. लाखों लोग बेघर हो गये हैं. हजारों अभी भी पानी में फंसे हैं. आज की स्थिति में लोगों को बाहर निकालने में जो देर हो रही है, वह अक्षम्य है. बिहार की मेहनतकश जनता पर जो गुजर रही है. उससे मेरा दिल दहल गया है. रानीगंज में सैकड़ों बहनें, बूढ़े-बच्चे केवल १०० मीटर की दूरी पार न करवाए जाने के कारण भूखे पडे रहे. मुरलीगंज से भी लोगों को निकालने का काम बहुत धीमी गति से चल रहा है. इन सब बातों को लेकर स्थानीय लोगों में काफी आक्रोश है. देश भर से अधिक से अधिक बोटें क्यों नहीं मंगवाई जा रहीं? जो बोटें हैं भी, उनका सही उपयोग नहीं किया जा रहा. राज्य सरकार द्वारा रेस्क्यू रही ऑपरेशन की सही दूरी, विस्तृत नक्षा व जानकार गाइड नहीं दिये जाने कारण नौसेना की उपलब्ध ४५ बोटों में सिर्फ १५ ही सक्रिय हैं. मुरलीगंज के दक्षिण और उत्तर दोनों छोरों को मिलाकर दिन भर में महज ४००-५०० लोगों को ही निकाला जा रहा है. ऐसे अनेक गांव हैं, जो पिछले १७-१८ दिनों से डूबे हैं लेकिन उन गांवों में आज तक एक बार भी बोट नहीं गयी है. मधेपुरा जिला के रमणी, गंगापुर, भेलाई, रतनपरी, भल्ली, हनुमानपट्टी, रधुनाथपुरा, लक्ष्मीपुर, भित्ताटोल, रहटा, सिकियन, मतनी, गांवों में अभी भी लोग फंसे हैं. अधिकारी बता नहीं पा रहे हैं कि इन्हें कब तक निकाला जाएगा. हालत भयावह है. बहुत सारे लोगों को कई दिनों से खाना नहीं मिला है. इसे राष्‍ट्रीय आपदा घोषित कर दिया गया है लेकिन नियमानुसार न तो आपदा प्रबंधन को लेकर केंद्रीय मंत्रीमंडल की बैठक हुई है, न ही राहत-पुनर्वास के लिए दीर्घकालीन नीतियां बनायी गयी हैं.

-ऐसे में आप सरकार को क्या सुझाव देंगी?

मेधा : तटबंध टूटने की घटना की जांच होनी चाहिए. राहत कार्यों में सरकार सामाजिक संगठनों की मदद लें. संगठन और सरकार के प्रतिनिधियों की ज्वाईंट कमिटि बननी चाहिए. देश भर के अनेक संगठन मदद के लिए तैयार हैं. वे मदद के लिए हाथ बढा रहे हैं. सरकार को उनका सहयोग स्वीकार करना चाहिए. कोसी और अन्य नदियों में काम करने वाले मल्लाहों को बुलाया जाए. यह जरूरी है. लेकिन साथ ही असामाजिक तत्वों से बचाव के लिए नावों में स्थानीय लोगों को भी रखने की भी व्यवस्था की जाए. रेस्क्यू के लिए जाने वाली बोटों में राहत सामग्री भी हो. सरकार सामाजिक संस्थाओं द्वारा खोले गये सभी शिविरों को बिना हिचकिचाए मदद करे

01 October, 2008

स्मृति-शून्यता के बीच जो याद रह पाया..

बाढ-2008

एक संवाददाता की डायरी


-प्रमोद रंजन

उस समय दस-ग्यारह साल का रहा होउंगा; जब कुछ शरारत करते छत से गिरकर हाथ टूटा था. कंपाउंड फ्रैक्चर. कुहनी के पास से हड्डी टूट कर मांस और चमड़ा चीरती बाहर निकल गयी थी. खून बलबला रहा था. लेकिन आंखों में आंसू नहीं थे. लोग जुटे. मुझे अस्पताल ले जाया गया...इस घटना ने मुझे 'बहादुर' बना दिया. गांव-घर के लोग आज भी याद करते हैं कि उतने छुटपन में, उतनी बड़ी चोट, उतने भयानक दर्द के बावजूद मैं नहीं रोया था. लेकिन वास्तव में उसमें कोई बहादुरी नहीं थी. मैं कुहनी चीर बाहर निकली हड्डी और हरहर बहता खून देख रहा था, लेकिन दर्द का कोई अहसास नहीं था. आज इसका कारण जानता हूं, बहुत बड़ी चोट दर्द का अहसास मस्तिष्क तक पहुंचाने वाली शिराओं को संवेदनहीन बना देती हैं.

२ सितंबर,२००८ की सुबह सहरसा स्टेशन पर उतरते बचपन में गुजरे इस वाकये की सच्चाई का भान शिददत से हुआ. सामान्य तौर पर देखने पर वहां भयावह बाढ़ का संकेत मौजूद नहीं दिख रहा था. सिवाय इसके कि दो प्लेटफार्मों पर 'बाढ़ स्पेशल' ट्रेन लगी थी. एक शायद सुपौल जा रही थी, दूसरी अमृतसर. जिस तरह की खबरों को पढ़-देख कर वहां पहुंचा था, उसके अनुसार, स्टेशन पर भारी विलाप होने का अनुमान कर रहा था. 'खबर' की तलाश में वहां टहलने लगा तो सिर्फ एक बुढ़िया रोती दिखायी दी. बाढ़ स्पेशल टेनों पर सवार होने वाले अधिकांश मजदूर वर्ग के लग रहे थे. जैसे वे सहज भाव से 'कमाने' बाहर जा रहे हों, या कमा कर लौट रहे हों. औरतें टोलियों में यहां-वहां पसरी थीं. उस बूढ़ी महिला से बात की तो मालूम चला कि उसका परिवार सकुशल निकल आया है पर सारा सामान बह गया. उससे बात करते देख दो नवयुवक पास आ गये. उनसे मालूम हुआ कि बाढ़ की हालत अब भी कितनी भयावह है. लेकिन मेरे अनुमान के अनुसार, रोते-कलपते लोग क्यों नहीं दिख रहे? बाढ़ को तबाही मचाते लगभग एक पखबाड़ा बीत चुका है. इस बीच इन्होंने जो मुसीबतें झेली हैं, जिस तरह जान की बाजी लगाकर यहां तक पहुंचे हैं, वह मेरे उस कुहनी टूटने के दर्द से सैकड़ों गुणा अधिक भयानक है. विलाप इनके लिए बहुत छोटी चीज हो गयी है. ७ दिन के दौरे में कई दर्जन भुग्तभोगियों की दिल दहला देने वाली व्यथाएं सुनीं. उन सबमें एक बात समान थी कि 'विलाप' कहीं न था. जिसके साथ, जितना ज्यादा भयानक हादसा हुआ था, उसकी 'स्मृति शून्यता उतनी ही ज्यादा थी. सुपौल के छुरछुरिया धार के पास मिले हशमत को तो यह भी याद करने में भी दिक्कत आ रही थी कि सेना के जवानों की क्रूरता की वजह से उसके परिवार के छह लोग मरे कि सात लोग. इस रोज मैंने जो रिपोर्ट अपने अखबार को भेजी वह यह थी :

बाढ़ ने सुखाया आंखों का

सहरसा: कहां हैं बाढ़ पीड़ित ? खचाखच भरे स्टेशन परिसर में न कोई चीख, न विलाप. एक जगह खूब लंबी लाइन लगी है, रेलवे मुफ्त खाना बांट रहा है. बाकी सबकुछ तो सामान्य लग रहा है! वास्तव में यह दृश्य ज्वालामुखी का है. कौन जानता है, कितना और कैसा लावा भीतर ही भीतर खौल रहा है. सैलाब से किसी तरह जान बचा कर सहरसा स्टेशन पहुंच रहे अधिकांश मधेपुरा के मुरलीगंज व बिहारीगंज के हैं. इसके अलावा सुपौल और सहरसा के भी लोग पहुंच रहे हैं. कुछ टोलियां पूर्णियां जिला की भी हैं. मधेपुरा जिला की आर्थिक रीढ़ कहे जाने वाले मुरलीगंज और कभी 'मिनी कलकत्ता' के नाम से चर्चित बिहारीगंज व इनके आसपास के गांवों में भारी तबाही हुई है. माल-जाल सब गया, कितने लोग मारे गये, इसके बारे में सरकार द्वारा दी जा रही सूचनाएं भयावह रूप से अविश्वसनीय हैं. मुरलीगंज के निकट बसे रहठा गांव से आई बाढ़ पीड़ितों की एक टोली में मलिया देवी, दायजी देवी, रीना देवी, अनीता देवी और मुकेश कुमार है. गांव से लगभग ५० लोगों का जत्था चला था. सहरसा स्टेशन बस यही पांच पहुंच सके हैं. बाकी कब-कहां बिछड़ गये, इन्हें पता भी नहीं चला. मलिया देवी बताती हैं कि रहठा से कंठ भर पानी में लगभग छह घंटे का पैदल सफर कर हम जानकीनगर पहुंचे. जानकीनगर से तीन बार टेन बदलनी पड़ी. पूर्णिया कोर्ट, कटिहार और मानसी होते हुए तीन दिनों में सहरसा पहुंच सके हैं. आगे कहां जाना है, इसकी कोई योजना नहीं है. जहां यह फूटी किस्मत ले जाए! मलिया की टोली बताती है कि रहठा से जानकीनगर का पैदल सफर बेहद भयावह था. आठ फुट लंबे बांस से पानी की थाह लेते हम किसी तरह चलते रहे. रास्ते में तैरती लगभग आधा दर्जन लाशें देखीं. एक केला बगान का दृश्य तो रोंगटे खडा करने वाला था. केले के पेडों से अटकी थीं २००-३०० लाशें. यह केला बगान दीनापट्टी रेलवे स्टेशन से महज एक-डेढ़ किलोमीटर पहले है. बाढ़ पीडितों की टोलियां सहज भाव से अपनी व्यथाएं सुनाती हैं. आंखों की कोरों तक कुछ बूदें आती हैं. लेकिन बाहर नहीं टपकती. मौत का तांडव देखते इन्होंने १५ दिन बिता दिये हैं. लाइन में लगकर रेलवे से मिल रहा मुफ्त खाना खाते, स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बांटे जा रहे पुराने कपड़ों के लिए छीना-झपटी करते हुए आखिर बच भी कैसे सकता है आंखों में पानी?

हर वाक्य में खबर

सहरसा के राहत शिविरों, अस्पतालों में घूमता रहा. बाढ़ पीड़ितों द्वारा कहा गया हर वाक्य 'खबर' है. कितना लिखता? किसी ने केले के थम के सहारे प्रलय को पार करते हुए पत्नी को खो दिया तो किसी ने अपने बच्चों को. कोई किसी पड़ोसी की छत पर सैकड़ों लोगों के साथ १० दिनों तक भूखा रहा था तो किसी ने डायरिया से मरे अपने जिगर के टुकड़े को छत से नीचे पानी में फेंक दिया था. अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं की भीड़ थी. किसी के गर्भ से हाथ निकाले बच्चा चार दिनों से पड़ा था तो कोई खून से लथपथ अस्पताल के फर्श पर पड़ी थी. न उन्हें बिस्तर मिल रहा था, न ही दवाएं. नवजात बच्चे दम तोड़ रहे थे. जगह-जगह लगे राहत शिविरों में जिंदा रहने भर भोजन पाने के लिए लंबी लाइनें लगीं थीं. सहरसा शहर के व्यापारी राहत कार्यों में खुलकर सहयोग कर थे. इसके मुकाबले में 'सरकार' कहीं नहीं थी.जिन-जिन से मिला, उनमें से कम से कम आधे लोगों का कोई न कोई गायब था. अधिकांश जान हथेली पर रख कर यहां तक पहुंचे थे. निजी नाव वालों ने किसी से ५०० रुपये प्रति आदमी वसूले थे तो किसी की बची-खुची सारी संपत्ति पानी में नाव पलट देने का भय दिखा कर ऐंठ ली थी. रहठा की रीना बेगम के बच्चे और पति को नाव वाले ने नदी में फेंक दिया. नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मुवमेंट के विजय कुमार बातते हैं कि यह अभागी महिला अभी पूर्णिया के खुश्कीबाग धर्मशाला में चल रहे राहत शिविर में रह रही है. सरकारी नाव वाले भी तेल के लिए पैसे ऐंठ रहे थे. हर किसी के गांव में अब भी सैकड़ो लोग नाव के इंतजार में फंसे थे. राहत सामग्री के नाम पर उन तक कुछ नहीं पहुंच रहा था. एयर ड्रापिंग से कहीं-कहीं कुछ गिरा था, लेकिन वह एकदम नाकाफी था. कई वाकये ऐसे मिले कि हेलीकॉप्टर से पानी में गिरा चूड़ा का पैकेट उठाने के लिए, जो धारा में उतरा, उसे उफनती कोसी अपने साथ ले गयी.

हिंदुत्ववादी संगठनों की सक्रियता


सहरसा में हिंदुत्ववादी संगठनों के सक्रियता साफ दिख रही है. विभिन्न नामों से इनके कई राहत शिविर चल रहे हैं. आपदा प्रबंधन की सहरसा शाखा के रेकर्ड के अनुसार शहहर में कुल २३ राहत शिविर चल रहे हैं. इनमें से ८ जिला प्रशासन द्वारा संचालित हैं जबकि ९ हिंदुत्वादी संगठनों सेवा भारती, विद्यार्थी परिषद आदि द्वारा. हत्या के आरोप में जेल में बंद पूर्व सांसद आनंद मोहन तथा निर्दलीय विधायक किशोर कुमार मुन्ना द्वारा एक-एक शिविर चलाया जा रहा है. इसके अलावा मारवाड़ी युवा मंच, ड्रग एसोसिएन आदि के शिविर हैं. जिला स्कूल में सेवा भारती द्वारा चलाये जा रहे राहत शिविर में भाजपा के स्थानीय विधायक संजीव कुमार झा मिलते हैं. उनके साथ पटना से आये भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप भी हैं. बातचीत शुरू होती है तो हरेंद्र कहते हैं कि यहां ईसाई मिशनरियों की दाल नहीं गलने दी जाएगी. आरएसएस की पहल पर बाबा रामदेव से बात हो गयी है. जितने भी बच्चे अनाथ हुए हैं, वह सबको गोद लेंगे. पटना में सभी अखबारों को यह सूचना भेज दी गयी है. इस शिविर में मौजूद लोग बताते हैं कि अन्य शिविरों के मुकाबले यहां व्यवस्था अच्छी है. खाना ठीक मिल रहा. नाश्ता और दूध भी. कपड़े भी बांटे गये हैं. यह सब सुनकर मुझे हैरत नहीं होती. आखिर आएएसएस जिंदा ही है इन्हीं हथकंडों के कारण. मेरा ध्यान तो रामदेव पर अटका है. बाबा रामदेव माने रामदेव यादव. वैसे ही जैसे लालू प्रसाद माने लालू यादव? सब जानते हैं यह इलाका यादव बहुल है. जाति इस देश की कितनी बड़ी सच्चाई है? स्थानीय लोग बताते हैं भाजपा और जदयू के अधिकांश विधायक अपने घरों में दुबके हैं. राहत कार्यो के दौरान उन्हें भारी विरोध झेलना पड़ सकता है. और कहीं जल संसाधन मंत्री विजेंद्र यादव किसी भीड़ में पकड़े गये तो पूछिये मत कि क्या होगा. चाहे पुलिस कितनी भी गोलियां चलाए, लोग उन्हें छोड़ेंगे नहीं. दो निर्दलीय विधायकों-सहरसा के सोनबरसा क्षेत्र में किशोर कुमार मुन्ना और सुपौल के राघोपुर में नीरज कुमार बब्लू के राहत कार्यों की लोग तारीफ करते हैं. ये दोनों विधायक 'बाहुबली' हैं.

रामपुर टपरा

इस सबके बीच मेधा पाटकर मिलीं. उनकी सादगी, मेहनत और सेवा भाव का मुझ पर जो प्रभाव पड़ा उसका जिक्र करने का समय यह नही हैं. मेधाजी के साथ मेरी पहली यात्रा पानी और बाढ़ पर लंबे समय से काम करते रहे रंजीवजी के सौजन्य से मधेपुरा होते हुए रामपुर टपरा तक की रही. जिस जीप से हम दौरा करते रहे वह वीपी मंडल के परिवार के तीसरे पीढ़ी के सदस्य (पौत्र) आनंद मंडल की थी. बाढ़ से इनका परिवार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है. घर डूबा हुआ है. आनंद सारथी की तरह लगातार हमारे साथ बने रहे. मधेपुरा शहर में पानी भरा था. हमें बताया गया कि कई मोहल्लों में नावें चल रही हैं. अधिकांष दुकानें बंद थीं. बंद दुकानों के बीच शराब की दुकानों को खुला देखना हममें से कुछ को आश्चर्यचकित कर रहा था. लेकिन मुझे नहीं. पता नहीं क्यों उस समय मुझे गालिब याद आ रहे थे 'हुआ जब गम से यों बेहिस तो गम क्या सर के कटने का !' कोई सीधा प्रसंग न था, पर गालिब और उनके साथ-साथ नागार्जुन भी याद आते रहे. '९८ झोपड़ियों के बीच दो मकान'- इसी भाव की एक पंक्ति है उनकी. इसी मिथिलांचल में रचे-बसे थे बाबा. और रेणु की परती परिकथा भी. पूर्णियां की तरफ भी जाने की इच्छा हुई. अररिया में बहुत बर्बादी हुई है. रामपुर टपरा पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया. इसके आगे पानी का साम्राज्य है. यहीं से सेना और राज्य सरकार द्वारा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा था. वहां एक जगह थी, जिसे वे लोग 'नहर' कह रहे थे. शायद यह नहर का तटबंध है. हजारों परिवार उस तटबंध पर आश्रय लिये थे. उन्हें न खाना मिल रहा था, न पीने का पानी. कोसी के पानी में सांप बहुत रहते हैं. रात में रोशनी की कोई व्यवस्था न थी. नाव वालों द्वारा लूट-पाट किये जाने की अनेक शिकायतें थीं. आगे कई गांव थे, जहां कोसी की तेज धारा के कारण नाव जा ही नहीं सकती. उन गांवों में दसियों हजार लोग भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे. सेना के जवानों ने बताया कि उन गांवों से लोगों को निकालने के लिए एयर लिफ्टिंग के अलावा कोई चारा नहीं है. लेकिन एयर लिफ्टिंग के लिए हेलीकॉप्टर उपलब्ध नहीं हैं. लोग मेधा पाटकर को पहचान नहीं रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि यह कोई महिला पत्रकार है. थोड़ी देर बाद वहां मधेपुरा के स्पेशल डीएम और एसपी पहुंचे. स्पेशल डीएम युवा और संवेदनशील हैं. लेकिन एसपी एक नंबर का काईंया. वह और उसके सिपाही हमसे शिकायत करने वालों को हमारे सामने ही धमकाते रहे. मेधा रामपुर टपरा दूसरे दिन भी गयीं. चूड़ा और चीनी का पैकेट लेकर. मैं अपनी रिपोर्टें भेजने के लिए बेस कैंप (खादी ग्रामोद्योग भवन, सहरसा) में ही रूक गया. शाम को लौटीं तो मालूम चला कि बाढ़-पीड़ितों ने आज उन्हें पत्रकार की बजाए 'सरकारी आदमी' समझा. चूड़ा-चीनी कम पड़ा तो वे भूख से तड़पते लोगों द्वारा घेर ली गयीं. ' जब तक हमें नहीं मिलेगा, जाने नहीं देंगे!'


रूबी यादव

इस बीच, सहरसा के सदर अस्पताल की भी याद आ रही है. मेधा के साथ हम वहां पहुंचे थे तो रूबी यादव नाम की एक सद्यप्रसूता खून से लथपथ कराह रही थी. हमारे आने से थोड़ी देर पहले ही उसे बेड दिया था. उससे पहले की दो रातें उसने अपने ही खून में सने अस्पताल के फर्श पर बितायी थी. नवजात बच्चा मर चुका था. पति बाहर कमाने गया हुआ था. टीवी के मरीज ससुर उसे किसी तरह पानी से घिरे गांव से बाहर निकाल लाये थे. अस्पताल प्रशासन न उसे दवाएं दे रहा था, न अन्य सुविधाएं. मेधा ने वहां सिविल सर्जन से हुज्जत करते करीब दो घंटे गुजारे. इस दो घंटे का नतीजा यह निकला कि अस्पताल प्रशासन ने उसके द्वारा खरीदी गयी १७०० रुपये की दवाओं में से ३०० रुपये का भुगतान रोगी कल्याण समिति से कर दिया. द्योच्च राषि की रसीदें उसे दुकान वाले ने दी ही नहीं थी. मेधा की सिविल सर्जन से कही बात भी याद रह गयी है. मेधा ने कहा था 'शर्म नहीं आती आप लोगों को. आप इनकी सेवा के लिए ही इतनी मोटी पगार लेते है. मैंने आज तक किसी ससुर को अपनी पतोहु की ऐसी सेवा करते नहीं देखा, आपने देखा है? कम से कम इन्हें देख तो आप लोगों की इंसानियत जागनी चाहिए.' अस्पताल प्रशासन ने रूबी को पटना रेफर करने का वायदा किया था. बाद में उसका क्या हुआ, मैं जान नहीं पाया. मेधा लगातार उसकी चिंता कर रही थीं.


छुरछुरिया धार


५ सितंबर को छुरछुरिया धार पहुंचने पर मालूम हुआ कि मेरी अधिकतम कल्पना भी तबाही का जो अनुमान कर रही थी, वह वास्तविकता से बहुत कम था. निर्माणाधीन एनएच (संख्या संभवतः १०६) के किनारे-किनारे कई किलोमीटर तक दलित बांस की फट्टियां बांध रहे थे. कोई उस पर चादर लपेट रहा था तो कोई फटे पोलिथिन बैगों को एक-दूसरे से जोड़ कर अपने आषियाने को ढंकने का प्रयास कर रहा था. 'यह दलित राहत शिविरों में क्यों नहीं जाते?' मेधा के साथ जीप मे बैठे एक 'क्रांतिकारी' साथी ने जबाव दिया 'इनमें एक साथ रहने की प्रवृति होती है. ये यहीं रहेंगे. राहत शिविरों में जाना ही नहीं चाहेंगे.' मैं उनकी समझ पर तरस ही खा सकता था. यहां बारिष में, कोसी के सांपों के बीच रहना इनकी 'प्रवृत्ति' है? यही प्रवृति यादव व अन्य ओबीसी जातियों में या खुद आपकी जाति में क्यों नहीं है? वास्तविकता यह थी कि इनमें से अधिकांश को न राहत शिविरों की जानकारी थी, न यह विश्वास कि ऐसी कोई जगह हो सकती है, जहां उन्हें गैर अछूत जातियों के साथ रहने दिया जा सकता है. (बाद में मैंने सहरसा के एक राहत शिविर में रात गुजारी तो वहां अनेक दलित परिवार भी मिले) छुरछुरिया धार का माजरा रूह कंपा देने वाला था. सेना का रेस्क्यू आपरेशन चल रहा है. कोसी की बलखाती धारा के बीच से औरत-मर्दों से पटी नावें चली आ रहीं हैं. हर नाव में ५०-६० लोग हैं. हाहाकार मचा है. वहां से निकटतम राहत शिविर करीब २० किलोमीटर दूर है. १४-१५ दिनों से भूखे लोगों को वहां पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं. न ही उस रूट में बसें चल रही हैं. सेना की हर नाव से उतरने वाला कोई न कोई बेहोश हो जा रहा है. किसी को डायरिया तो किसी को पीलिया. असली बीमारी तो भूख है. कुछ स्वयंसेवी संगठन राहत सामग्री बांट रहे हैं. मेधा प्लास्टिक शीट्स ले कर आयी हैं. इन सबके लिए गिड़गिड़ता सैकड़ों लोगों का हुजूम. एक महिला मिलती है. कुछ बोल नहीं पा रही है. क्या हुआ? 'बउआ पलर..' माने? मालूम चलता है वह उस पतियाही गांव के पास से, केले के थम की 'नाव' बना निकली थी, जहां इतनी तेज धारा है कि सेना के नावों को भी नाकों चने चबाने पड़ते हैं. रास्ते में केले का थम कई बार पलटा. मां ने खुद को और बच्चों को रस्सी से बांध रखा था. बार-बार पलटने से रस्सी के बंधन ढीले होते गये. इस बार केले का थम पलटा तो चार और छह साल के उसके लालों को रस्सी रोके न रख सकी. मां की गोद से छूटते कोसी की लपलपाती जीभ उन्हें निगल गई. लेकिन इस मां को अपनी आंखों देखी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा है. वह उस केले के थम को खोजने की बात करती है. उसे लग रहा है, उसके बच्चे अभी भी उससे बंधे होंगे. इस महिला का पति कमाने परदेश गया हुआ है. यह आदमी बहुत बेचैन है. हमारी सक्रियता देख वह नजदीक आता है. १७ लोग मरे हैं सर, १७ लोग. कोई मेरी बात का विश्वास ही नहीं करता. १२ गांव में मरे,जबकि ५ ने पानी के पार आकर अस्पताल ले जाने के रास्ते में दम तोड़ दिया. यह भी पतियाही के पास के ही किसी गांव का है. अपने टोले में नाव भिजवाने की गुहार लगा रहा है. जो लोग पानी में फंसे हैं गांवों में, भूख बीमारी और भय से मर रहे हैं, उनकी लाशों को वहीं पानी में बहा दिया जा रहा है. यह बात, अपने परिजनों की लाशों को बहाने वाले कई लोगों ने बतायी. साफ है इसके अलावा चारों ओर से जानलेवा धाराओं से घिरे गांवों में कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है. इसी छुरछुरिया धार के पास हशमत मिला. जिसके बारे में एक रिपोर्ट मैंने भेजी :

व्यथाएं, जो शब्दों में नहीं समातीं

सुपौल : कोसी के बाढ़ पीडितों की कथा वहां से षुरू होती है जहां से शब्दों की अभिव्यक्ति की क्षमता चूकने लगती है. न ही अपने परिवार के छह सदस्यों को खो देने वाले मोहम्मद हशमत की व्यथा के लिए 'व्यथा' शब्द पर्याप्त लगता है. न ही नाव पलटने के बाद गर्भवती पत्नी-बच्चों के लिए बिलखते हशमत को पीटने के बाद कोसी की अथाह धारा के बीच छोड़ देने वाले सैनिकों की क्रूरता के लिए 'क्रूरता'. छुरछुरिया धार की चपेट आये ललितग्राम टेंगरी में १२-१३ दिन भूखे रहने के बाद २ सितंबर को मोहम्मद हशमत के परिवार को गांव के कुछ अन्य लोगों के साथ सेना की दो नाव नसीब हो सकी. अफरातफरी के महौल में सैनिकों ने हशमत को एक नाव पर सवार किया, जबकि उसकी गर्भवती पत्नी शहरा खातून, विधवा भाभी अलेरून व उनकी दो किशोर उम्र की बेटियां जन्नत, तब्बसुम व बेटा दिलशाद, एक और भाभी साबिया को उनके बेटे इमाम तथा साला जफरूद्दीन को चार माह के बेटे मस्तकीन के साथ दूसरी नाव पर चढ़ा दिया. नाव तेज धारा में पहुंची तो इलाके के भूगोल से अपरिचित सैनिक नावों को वहां से गुजरती रेलवे लाइन के पास बने कलभर्ट की ओर ले कर चले गये. हषमत ने चिल्ला-चिल्ला कर उन्हें उस ओर जाने से मना किया, लेकिन उन्होंने उसे डांट कर चुप करवा दिया. कलभर्ट से टकराते ही आगे चल रही हशमत की पत्नी वाली नाव पलट गयी. पत्नी, दोनों भाभियां, साला उनके बच्चे सबके-सब डूबने लगे. सैनिकों ने उन्हें बचाने की कोई कोशिश न की. हशमत की ही कोषिषों से बह कर दूसरी नाव के पास आयी भाभी साबिया और दिलशाद को किसी तरह बचाया जा सका. घटना में हशमत के परिवार के छह लोगों के अलावा ललितग्राम टेंगरी गांव के ही दो बच्चों (कुल-८ लोगों) की मौत हो गयी. कथा के इस बिंदु तक तो हम हशमत के साथ हुई घटना को 'त्रासदी' और सैनिकों के कृत्य को 'क्रूरता' कह सकते हैं. लेकिन इसके आगे की घटनाओं को क्या कहेंगे? अपनों की लाशों को कोसी में बहते देख बौखलाए हषमत ने जब इसके लिए सैनिकों को कोसा तो उन्होंने उसे इतना मारा कि उसके मुंह से खून निकलने लगा. लात-घूसों से जमकर पिटाई करने के बाद सैनिकों ने हशमत, जफरूद्दीन व दिलाशाद को कोसी की हहराती धारा के बीच लक्ष्मीपुर लाइन के पास ही भूखों मरने के लिए नाव से उतार दिया. हशमत किनारे कैसे पहुंचा, यह बताने में कथा बहुत लंबी हो जाएगी. यहां सिर्फ इतना बताना आवश्यक है कि सैनिकों ने लौट कर ८ लोगों की मौत की इस घटना की रिपोर्ट तक नहीं की. शुक्रवार (५ सितंबर) को छुरछुरिया धार पर चल रहे बचाव कार्य का समाजिक कार्यकर्ता मेघा पाटकर के साथ जायजा लेने गये इस संवाददाता को हशमत पथराई आंखों से धार के किनारे-किनारे अपने परिजनों की लाशें ढूंढ़ता मिला. उसने बताया कि वे सैनिक यहीं हैं. हमने खोजना शुरू किया तो वे सैनिक गायब हो गये. वहां मौजूद सेना के उच्चाधिकारियों ने इस बारे में कोई जानकारी देने से इंकार कर दिया. बचाव कार्य पर तैनात एसडीपीओ शैशव यादव ने शनिवार (६ सितंबर) को हशमत का पूरी घटना का ब्योरा देता बयान तो राघोपुर थाना में दर्ज करवा दिया है. लेकिन क्या इससे हशमत को न्याय मिल पाएगा.? और हशमत एक हों तब न! कोसी धार में पिछले लगभग २० दिनों से ऐसे हजारों हशमतों की कथाएं तैर रहीं हैं, जिनके मर्म तक शब्दों के सहारे नहीं पहुंचा जा सकता.

कीड़े-मकोड़ों की तरह बहे दलित

छुछुरिया धार पर उस रोज तैनात एसडीपीओ शैशव यादव की इंसानियत अद्भुत थी. मेधा के साथ-साथ बाढ़ क्षेत्र का दौरा कर रहे एक स्वतंत्र पत्रकार पुच्च्पराज ने अनुसार, शैशव ने उन्हें बताया कि उनके उच्चाधिकारी ने उन्हें बाढ़ ड्यूटी में भेजते हुए सावधान किया था कि बच कर रहना, बौखलायी भीड़ कभी भी हमला कर सकती है. लेकिन शैशव तो किसी और ही मिट्टी के बने थे. उनके जमीर को यह गवारा नहीं था कि वह भूखों की भीड़ में राहत कार्य के लिए सर्विस रिवाल्वर लेकर जाएं. वह आज भी बिना सर्विस रिवाल्वर के ही ड्यूटी कर रहे थे. और पूरी तन्मया के साथ लोगों के दुःख-दर्द में द्याामिल थे. भ्रच्च्टाचारी, उचक्के और पत्थरदिल दर्जनों अधिकारियों से मिलने के बाद द्यौषव को देखना सुखद था. वहीं हमें यह भी मालूम हुआ कि तटबंध टूटने के बाद पानी कितने वेग से आया था. पक्के मकान वाले तो किसी तरह बच गये, लेकिन कच्चे मकान वालों को कोसी की नयी धारा मकान के साथ बहा ले गयी. पक्के मकान वाले एक प्रत्यक्षदर्शी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पानी आया तो वे छत पर भागे. उनके घर के एक ओर ७०-८० घरों का दलित टोला था. छत से देखा, ७-८ फुट उंची विशाल जलराशि में दलितों की झोपडियां, ढोर, आदमी सब के सब कीड़े-मकौड़ों की तरह बहे जा रहे हैं. महज कुछ ही पलों में उस दलित टोला का नामो-निशान खत्म हो गया.

राहत शिविर की रात

८ सितंबर की रात किसी राहत शिविर गुजारने का फैसला कर करीब १०.३० बजे जिला प्रशासन द्वारा अल्पसंख्यक छात्रावास, सहरसा में चलाए जा रहे शिविर में पहुंचा. अधिकांश का भोजन हो चुका है. सब सोने की तैयारी में हैं. यह शिविर खाली-खाली
सा है. सब सरकारी शिविरों का यही हाल है. संस्थाओं, संगठनों, व्यवसायियों द्वारा चलाये जा रहे शिविरों में लोग ठसाठस भरे हैं. धबौली से आयी सरिता देवी कहती हैं वहां खाना अच्छा मिलता है, लेकिन जगह नहीं है. यहां हम मर्द-औरत (पति-पत्नी) को यह
कमरा मिल गया है. जयपाल पट्टी की समतोलिया देवी, गुड़िया देवी समेत मड़वाहा, पचगछिया आदि से आयी लगभग सभी महिलाएं शिकायत करती हैं कि पिछले दस दिनों से यहां सिर्फ भात मिल रहा है. दाल पानी सी होती है. सब्जी नहीं मिलती.
कभी चोखा तो कभी चटनी मिलती है. सब्जी नहीं. वे रोटी के लिए तरस रही हैं. मधेपुरा के कुमारखंड प्रखंड के बरकुड़वा की बबिता देवी बताती हैं कि उनका पूरा गांव खत्म हो गया. परिवार के लोगों का कुछ पता नहीं लग रहा. जब पानी आया तो बबिता अपने पति सुरेश यादव व बच्चों के साथ कुमारखंड में थी. सुरेश डाक विभाग विभाग के चतुर्थवर्गीय कर्मचारी हैं. पानी कुमारखंड में भी आया, लेकिन ये किसी तरह बच निकले. बरकुड़वा कुमारखंड से चार किलोमीटर पष्चिम रउता पुल के पास है. उसके आसपास के हरिबोला, टेंगराहा (पूर्वी) और राउत गांव भी पूरी तरह साफ हो गये हैं. यादव, मुसहर, मोची, बांतर आदि जातियों की बहुलता वाले इन गांवों में ९५ फीसदी मकान कच्चे-झोपड़ीनुमा थे. बबिता रूंआसा होकर कहती हैं-सब जगह से सूचना मिल रही है कि इन गांवों में कोई नहीं बचा है. २० दिन से ज्यादा होने को आए, कोई बचता तो कहीं न कहीं किसी न किसी राहत शिविर में किसी को तो मिलता. शिविर के और लोग मिलते हैं, सबकी बेचैनी एक सी है. अपनों का अता-पता नहीं लग रहा. एक महिला अचानक आकर जोर-जोर से कुछ कहने लगती है. वह और उसके बच्चे तो निकल आए हैं लेकिन चारों
बकरियां बह गयीं. वह पूछ रही है कि क्या सरकार इसका कुछ देगी. जोर-जोर से बोलने से मना करने पर वह सिसकने लगती है.कई बच्चे बीमार हैं. कई महिलाएं गर्भवती हैं. एक महिला की तो आवाज ही गायब हो गयी है. डॉक्टर आते हैं. दवाईयां भी
मिलती हैं. लेकिन कई दिन की भूख झेल कर यहां तक पहुंची गर्भवती महिलाओं को न तो पौष्िटक आहर, न ही किसी प्रकार के टॉनिक देने का प्रावधान किया गया है. रात गहराती जा रही है. मैं कमरा-दर कमरा झांकता चल रहा हूं. अधिकांष कमरों में
बल्व नहीं है. तीन चार छोटे कमरों में पति-पत्नी सोये मिलते हैं. बड़े हॉलों में बच्चे, महिलाएं, किशोरियां भरी हैं. एक किशोरी का अधोभाग निर्वस्त्र है. वह शायद बोरी ओढ़ कर सोयी थी. बोरी हट गयी है. कुछ महिलाएं इससे भी बुरी अवस्था में दिखती हैं.
शिविर दो होमगार्डों के हवाले है. बुजुर्ग गार्ड लखन मंडल बताता है कि अधिकांश महिलाओं के पास बदन पर पहने कपड़ों के अलावा दूसरा वस्त्र नहीं है. शायद उन्होंने रात में सोने से पहले उन्हें धो दिया है. सुबह पहनेंगी. आगे के कमरों में झांकने की
हिम्मत नहीं होती.यहां महिलाएं ही महिलाएं हैं. पुरुष कहां गये? बाढ़ के बाद अधिकांश कमाने के लिए पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, दमन आदि की ओर निकल गये हैं. कुछ संपत्ति की रक्षा के लिए पानी में डूबे गांवो में लौट गये हैं. सिर्फ इस शिविर में ही नहीं,
जिन-जिन शिविरों में मैं गया वहां ७०-७५ प्रतिषत संख्या महिलाओं और बच्चों की थी. पुरुषों के अभाव में बूढ़ी-पुरनियों पर कई परिवारों की युवा महिलाओं की 'देखरेख' की जिम्मेवारी है. वे जानती हैं कि विपदा के इस समय में तरह-तरह के सौदागर घूम
रहे हैं.यह कहना शि कठिन है कि इन्हें कब तक राहत शिविरों में रहना होगा. या यह भी कि सरकार कब तक राहत शि‍वर ‍ चलाएगी. कच्चे घर बालों का तो सब कुछ तबाह हो गया है. पानी उतरने के बाद खेत भी बालू से भरे होंगे. गार्ड कहता है आपके लिए मसहरी और दरी की व्यवस्था कर सकता हूं. चाहें तो सो जाएं. वह मुझे भला आदमी लगता है. बताता है कि इन महिलाओं की सुरक्षा के लिए वह पूरी रात नहीं सोता. कहता है जब से यहां आया हूं नींद ही नहीं आती. छात्रावास परिसर में शौचालय नहीं है. पेट खराब होने की शिकायतें आम हैं. महिलाएं रात भर बाहर खुले में शौच के लिए जाती रहती हैं. ऐसे में मेन गेट बंद करना संभव नहीं है और असमाजिक तत्वों के भय से इसे खुला छोड़ नहीं सकता. वह मसहरी लाने जाता है तो मैं भी पीछे हो लेता हूं. यह शिविर का अस्थाई किचेन है. एक कोने में तीन रजिस्टर रखे हैं. ये शिविर में भोजन आदि पर होने वाले खर्च का हिसाब रखने के लिए हैं. तीनों की पृष्ठ संख्या अंचलाधिकारी द्वारा अभिप्रमाणित की गयी है. लेकिन शिविर शुरू होने के ८-१० दिन बीतने के बाद भी इसके पृष्ठ सादे हैं. सामानों की खरीद का हिसाब वहीं रखी एक दूसरी डायरी में लिखा गया है. बाद में इसे 'हिसाब-किताब' लगाकर अभिप्रमाणित रजिस्टरों में दर्ज कर दिया जाएगा. दरी बिछ गयी है. थोड़ी देर लेटता हूं. सो कर क्या करूंगा...बस एक घंटा बाकी है. सुबह की पहली टेन से उस पटना नगरी में लौटना है, जहां सत्ताधीश बाढ़-पीड़ितों के e राहत-शिविर चलने नहीं देना चाहते.

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प्रमोद रंजन
Patna, Bihar, India
प्रमोद रंजन - 22 फरवरी, 1980 को बिहार में जन्‍म। हिमाचल तथा पंजाब में रहकर अमर उजाला, दैनिक भास्‍कर, पंजाब केसरी व दिव्‍य हिमाचल के लिए पत्रकारिता। ग्राम परिवेश व भारतेंदु शिखर नामक पत्रों के साहित्‍य परिशिष्‍ठों का संपादन। पटना से प्रकाशित मासिक वैचारिक मासिक 'जन विकल्‍प' का संपादन. इन दिनों पटना में रहकर आलोचनात्‍मक लेखन. email : pramodrnjn@gmail.com मोबाइल : 9234382621
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