- रवीश कुमार
( दोस्तों,सहरसा,सुपौल और मधेपुरा से लौट आया हूं । मेरा अब भी मानना है कि बाढ़ प्राकृतिक नहीं है। ऐसे तर्को से सावधान रहने की ज़रूरत है कि कोई भी सरकार इतनी बड़ी तबाही में क्या कर सकती है। इस तर्क से दोषियों को चेहरा छुपाने के लिए पर्दा मिल जाता है। नितांत भाग्यवादी तर्कों से बचा जाना चाहिए। भ्रष्ट लोगों की वजह से बाढ़ आई है। इसलिए इस आपदा में कारण बड़ी खबर है राहत नहीं। मानवीय खबरें बड़ी खबर नहीं है न ही बचाव में लगे किसी नायक की खोज। बल्कि बड़ी ख़बर सिर्फ यही है कि जिनकी वजह से बाढ़ आई वो कहां हैं। मुझे जो कुछ भी दिखा, लगा मैं यहां आपके सामने रखूंगा। यह मेरा पहला लेख है।)
माइक और कैमरा बंद कर दिया है। अब आप सच बताइये। कहते ही कुशहा में तैनात इंजीनियर के चेहरे पर भय की रेखाएं निकल आईं। सच। हां,कैमरे पर कही गई बहुत बातें पर्दे में ही होती हैं। मैं ये अपने लिए जानना चाहता हूं। किसी को बताने के लिए नहीं। आपके बाल बच्चे होंगे। घर होगा। ईमान भी होगा। बता दीजिए कि कुशहा में जहां आप तटबंध का कटाव रोक रहे हैं वो काम पंद्रह दिन पहले हो सकता था या नहीं। इंजीनियर अब सच बोलना चाहता था। मुझे अकेले में ले गया। पत्रकार साहब,लोगों के शरीर में कीड़े पड़ेंगे। यहां जब हम आए तो लगा ही नहीं कि कुछ भी युद्ध स्तर पर किया जा रहा था। अगर बचाये जाने की कोशिश होती तो बचाया जा सकता था। कोई बड़ी बात नहीं थी। विभाग और सरकार से पाप हुआ है। लेकिन मेरा नाम मत छापियेगा। मेरी नौकरी चली जाएगी। मैं तो चौबीस तारीख के बाद पटना से आया हूं। मेरा कोई कसूर नहीं है। वो सच बोल चुका था। लेकिन बोलने के बाद भी उसका मन हल्का नहीं हुआ। क्योंकि उसके ठीक सामने से कोशी पूर्वी किनारे को तोड़ उन अधिकारियों,नेताओं और ठेकेदारों को ढूंढने पूर्णिया,सहरसा,अररिया,मधेपुरा,सुपौल तक जा चुकी थी। वो खेतो में,सड़कों पर,गांवों में,घरों की छत पर,हर तरफ ढूंढ रही थी।
कोसी का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। वो उस समाज को भी ढूंढने लगी जिसने ऐसी चोर व्यवस्था चुनी है। उस मतदाता को भी ढूंढने लगी जो भ्रष्ट राजनेता चुनती है,उस नागरिक को भी ढूंढने लगी जिसके बेखबर होने से अफसरशाही भ्रष्ट होती है। कोसी इन्हीं को लोगों को ढूंढते ढूंढते बर्बादी ला रही थी। कोसी ने चालीस पचास निकम्मे और चोर नेताओं और अफसरों की सजा उन लाखों लोगों को भी दी है जिनकी एक उंगली इन्हें चुनती है। कोशी को समाज की सड़न या उसकी मजबूरियों से मतलब नहीं था। वो इन मजबूरियों को तटबंध से निकल कर ढहा देना चाह रही है। कोशी ने लाखों मासूम लोगों को मासूम बने रहने की सज़ा दी है। इंजीनियर सच बोलकर भी हल्का नहीं हुआ तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि वह कोसी के इरादे को जान गया था।
बिहार सरकार और नीतीश कुमार रात दिन झूठ बोल रहे हैं। चेहरा गंभीर होता है लेकिन झूठ बोलते हैं। वे बाढ़ और राहत कार्य में व्यस्त होने के बहाने कारण पर बात नहीं करना चाहते। वे जानते हैं कि कारण पर चर्चा की तो गर्दन उनकी भी फंस जाएगी और कोशी ने जिन लाखों लोगों को उजाड़ा है वे कोसी का गुस्सा नीतीश कुमार पर उतार देंगे। हर मुख्यमंत्री राहत काम में व्यस्त होता है लेकिन किसकी वजह से टूटा ये क्या वो चार साल बाद बतायेगा। १७ अगस्त को कोसी प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर का तबादला किया जाता है। चीफ इंजीनियर एक बड़ा अफसर होता है। इसकी तैनाती या तबादला बिना मुख्यमंत्री की जानकारी या दस्तखत के नहीं होता। अगर जलसंसाधन मंत्री की कलम से भी होता है तो साफ हो जाता है कि बिजेंद्र यादव एक रुटीन तबादले में व्यस्त थे। वैसे चीफ इंजीनियर के तबादले की फाइल कैबिनेट में जाती है और मुख्यमंत्री मंजूरी देते हैं। ध्यान रहे कि चीफ इंजीनियर को किसी लापरवाही के चलते नहीं हटाया गया था बल्कि कोई और कारण रहे होंगे। साफ है कि किसी को मालूम नहीं था।
मालूम इसलिए नहीं था क्योंकि जिस जगह पर तटबंध टूटा है वहां जाकर साफ हो गया कि आने जाने का रास्ता ही नहीं है। जंगल देखकर और बुरी तरह से टूटे रास्ते से पता चल गया कि यहां कोई आया ही नहीं होगा। रास्ते की हालत बता रही थी कि यहां किसी भी प्रयास से युद्ध स्तर के प्रयास हो ही नहीं सकते थे।
किसी ने पूछा है कि निराशाजनक कहानी के बीच में कोई तो होगा जो अच्छा काम कर रहा होगा। ऐसे बहुत लोग है। लेकिन ये बाद की कहानी है। उनके अच्छा काम करने से से बाढ़ ग्रस्त इलाके की हकीकत में कोई बदलाव नहीं होता। जो अपने घरों में बैठे टीवी देख रहे हैं उन्हें शायद पोज़िटीव स्टोरी से राहत मिले लेकिन क्या जिनके घर उजड़ गए हैं उन्हें ह्यूमन या मानवीय या सकारात्मक स्टोरी से राहत मिलेगी। और इस जानकारी का क्या महत्व है। इस पर बहस अगले लेख में करूंगा।
मेरी राय में कोसी को पटना तक आना चाहिए। इस सड़े हुए प्रदेश को सिरे से उजाड़ देना चाहिए। किसी को बिहार की ऐसी छवि से परेशानी हो सकती है लेकिन कोसी जानती है कि बिहार को एक दिन नई छवि बनानी होगी तब तक के लिए वो तटबंधों को तोड़ ऐसे भ्रष्ट समाज और सरकार को ढूंढने के लिए तबाही लाती रहेगी।
-साभार, कस्बा
संशयात्मा
25 October, 2008
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- प्रमोद रंजन
- Patna, Bihar, India
- प्रमोद रंजन - 22 फरवरी, 1980 को बिहार में जन्म। हिमाचल तथा पंजाब में रहकर अमर उजाला, दैनिक भास्कर, पंजाब केसरी व दिव्य हिमाचल के लिए पत्रकारिता। ग्राम परिवेश व भारतेंदु शिखर नामक पत्रों के साहित्य परिशिष्ठों का संपादन। पटना से प्रकाशित मासिक वैचारिक मासिक 'जन विकल्प' का संपादन. इन दिनों पटना में रहकर आलोचनात्मक लेखन. email : pramodrnjn@gmail.com मोबाइल : 9234382621
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