
आज सुबह मधुकर सिंह का फोन आया। 'पांच मिनट के लिए आ जाते, बस पांच मिनट'। उनकी आवाज भर्रायी और आशंका से भरी थी।
दफतर जाने से पहले उनके यहां पहुंचा। उन्होंने कोई बात न की सिर्फ दो आवेदन अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढा दिये। 'इन पर दस्तख्त कर दीजिए।' मैं समझ गया। बिहार के शिक्षा मंत्री के नाम आर्थिक मदद का आवेदन होगा। उन्होंने इस आशय के आवेदन पर जून में ही मेरा हस्ताक्षर लिया था। तो वह आवेदन अभी तक दिया नहीं गया...
वह मेरी ओर टकटकी लगाये देख रहे थे। वह एक अजीब नजर थी। उनकी आंखों की पुतलियां थरथरा रहीं थीं। दस्तख्त करने से पहले उन आवेदनों को पढने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। दस्तख्त कर दिये। मधुकर जी ने कहा- अपने अखबार का नाम भी लिख दें तो शायद अच्छा रहेगा। तब मैंने आवेदनों का उपरी हिस्सा देखा। मैं समझ रहा था कि यह शिक्षा मंत्री के नाम लिखे एक ही आवेदन की दो प्रतिलिपियां हैं। लेकिन इनमें से एक शिक्षा मंत्री के नाम लिखा गया जबकि दूसरा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम।
मैंने अभी डेढ महीने पहले ही कोसी मे आयी बाढ पर कुछ लेख लिखे हैं। एक पुस्तिका भी जारी की है। कई जगहों से मुझे सूचनाएं मिल रही हैं कि मेरा यह सारा काम मुख्यमंत्री को बेहद नागवार गुजरा है। जैसे-जैसे इस पुस्तिका के रिप्रिंट आ रहे हैं, सत्ताधारी दल के खास लोगों का गुस्सा बढता जा रहा है। ...ऐसे में शिक्षा मंत्री वाले आवेदन पर तो नहीं लेकिन मुख्यमंत्री वाले आवेदन पर मेरा हस्ताक्षर (और साथ में अखबार का नाम भी, जिसके बाद पहचानने में कोई दुविधा ही नहीं रहेगी) राज्य सरकार द्वारा संभावित आर्थिक मदद मे रोडा बन सकता है। दस्तख्त तो मैं कर चुका था, मधुकर जी का ध्यान इस ओर दिलाया और कहा कि कम से कम मुख्यमंत्री वाले दरख्वास्त से मेरा हस्ताक्षर हटा देना चाहिए।
हिंदी कथा साहित्य के पुरोधाओं में एक मधुकर का जबाब था - 'उन्ंहें मदद न देना हो तो मत दें, लेकिन सिर्फ आप अपना हस्ताक्षर रहने दें'। यह है रोगशैया पर पडे मधुकर सिंह की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्वता।
क्या 40 करोड हिंदी भाषी जनता के लिए इस प्रतिबद्वता का कोई मोल नहीं है।
मधुकर जी को लकवा है। अप्रैल के अंतिम सप्ताह से ही वह रोगशैया पर पडे हैं। इधर कुछ हालत सुधरी है। शारीरिक हालत में तो थोडा ही सुधार आया है लेकिन आर्थिक हालत उसके कई गुणा बदतर हो गयी है। फिजियोथेरेपी वाला रोज सौ रूपये लेता है। सौ-दो सौ की रोज दवाइयां। दत्तक पुत्री व अन्य परिजनों के साथ रहने खाने पीने का खर्च अलग। पटना में जिस मकान में है उसका किराया भी उनकी आर्थिक हैसयित से काफी ज्यादा है। पर उपाय ही क्या है, पटना छोड कर अपने पैतक गांव चले जाएं तो इलाज कैसे हो।
मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के नाम पटना के लेखकों की ओर से दयाद्र भाव से लिखे आवेदनों के साथ मधुकर सिंह का बायोडाटा लगा है। इसके तीन पन्नों में उनकी किताबों, पुरस्कारों, उनपर हुए शोंधों, उनके द्वारा बिहार में करवाए गये साहित्यिक आयोजनों का जिक्र है। यह बायाडाटा क्या हमें शर्म से डुबो देने के लिए काफी नहीं है। मधुकर सिंह जैसे हिंदी के दिग्गज लेखक को अपना बायोडाटा बताना होगा.... मित्रों क्या यह शर्म .....
मधुकर सिंह मार्क्सवाद की सामाजिक न्याय के धारा के लेखक रहे हैं। मुझे यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं लगती कि इस 76 वर्षीय लेखक के साहित्य को पढकर हजारों युवक सामाजिक न्याय की अवधारणा मे दीक्षित हुए हैं। हजारों ने जनवाद को अपनाया है।
बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोंनों कथित्त रूप से सामाजिक न्याय का हिमायती है। तब भी ...
मैं नहीं जानता कि मधुकर सिंह का यह बायोडाटा सत्ताधीशों तक पहुंच पाएगा या नहीं। अगर पहुंच भी गया तो उसका हश्र क्या होगा, यह भी मुझे नहीं पता।
मित्रों, सरकार से मधुकर सिंह को चाहे जितनी आशा हो, न हो, मेरी अपेक्षा बस इतनी है कि हिंदी समाज उन्हें इस हालत में इस कदर अकेला न छोडें।
मैं नहीं जानता की उनके लिए सार्वजनिक रूप से आर्थिक मदद करने की अपील पर भी कितने लोग सामने आएंगे लेकिन तब भी, इस बार यह काम कर रहा हूं।
मधुकर सिंह का फोन नं है - 9334821919
डाक का पता है - श्री मधुकर सिंह, द्वारा - श्री अशोक कुमार, बी-20, इंदिरापुरी कॉलोनी, पो-बी भी कॉलेज, पटना-800014
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